आर्य मान्यतऐं—— जिनके अपनाने से होता है हमारे जीवन का श्रंगार

आर्य मान्यतऐं——
जिनके अपनाने से होता है हमारे जीवन का श्रंगार

भारत के आर्य ऋषियों की मान्यताएं वास्तव में वैश्विक मान्यताएं हैं। यह ऐसी मान्यताएं हैं जिनसे विश्व समाज सृष्टि के पहले दिन से लाभान्वित होता आ रहा है।
वैदिक मान्यताओं के अनुसार नारी व शूद्र को भी विद्या का समान अधिकार है। जहां तक शूद्र की बात है तो हम सभी शूद्र हैं। जब हम अपने जीवन में कहीं किसी न किसी की कोई सेवा करते हैं अथवा अपनी ही सेवा अर्थात स्वयं के कार्य करते हैं तो उस समय हम शूद्र होते हैं। उदाहरण के तौर पर जब हम अपने स्नानागार में अपना स्वयं का कच्छा धोते हैं तो हम शुद्र होते हैं। इसलिए सभी शूद्र हैं। आर्य मान्यता है कि जन्म के आधार पर सभी शूद्र हैं।
कर्म के आधार पर समाज में ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, और शुद्र वर्ण बनाये गए हैं। ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र को द्विज कहा जाता है अर्थात द्विज वह है जिसका दूसरा जन्म होता है। एक जन्म हमारा मां के गर्भ से होता है तो दूसरा आचार्य के गुरुकुल रूपी गर्भ से होता है अर्थात जब हम पढ़ लिख कर विद्वान बनकर गुरुकुल से बाहर निकलते हैं तो वह हमारा दूसरा जन्म कहलाता है।
शूद्र भी वेद पढ़कर विद्वान हो सकता है। अतीत के अनेक उदाहरण इस विषय में हैं। जब शूद्र कुल में उत्पन्न हुआ कोई व्यक्ति विद्वान होकर ब्राह्मण व ऋषि हुआ है। उसी प्रकार नारी के भी वेद का विद्वान होने के ,विदुषी होने के अनेक प्रमाण हैं। जब तक नारी और शूद्र को शिक्षा का समान अधिकार दिया गया तब तक भारतवर्ष विश्व गुरु बना रहा। लेकिन जब समाज के एक वर्ग ने अपनी शिथिलता, प्रमाद और जाति अहंकार का परिचय देते हुए नारी और शूद्र से वेद पढ़ने का अधिकार छीना तो सारी व्यवस्था शीर्षासन कर गई।

वेदों की मान्यता है कि ईश्वर एक है ,अनेक नहीं है।
ईश्वर सर्वव्यापक है ,सर्वशक्तिमान है। सर्वत्र व्यापक होने के कारण उसकी कोई प्रतिमा अथवा मूर्ति नहीं हो सकती। ईश्वर दयालु है। ईश्वर सर्वज्ञ है , परंतु जीव अल्पज्ञ है। ईश्वर और जीव दोनों चेतन हैं। गुण कर्म स्वभाव के आधार पर ईश्वर के अनेक नाम हो सकते हैं ,परंतु इसका अभिप्राय उसका “अनेक” हो जाना नहीं है।
जीव चेतन होते हुए भी अल्पज्ञ होने के कारण दु:खी होता है। एक कारण यह भी है कि जीव स्वयं में आनंद स्वरूप नहीं है।
सत, चित और आनंद केवल ईश्वर के पास ही है। इसलिए ईश्वर को सच्चिदानंद भी कहते हैं। जीव का आनंद स्वरूप परमात्मा के निकट जाना और उसके आनंद में लीन हो जाना उस का ध्येय है। इसीलिए उसके लिए आवश्यक किया गया है कि वह मोक्ष की साधना करे और प्रकृति में से निकल कर आनंद स्वरूप परमपिता परमेश्वर के स्वरूप का ध्यान करे।
वेदों का संदेश है कि ईश्वर दु:खी नहीं होता। जीव ईश्वर का अंश नहीं है। ईश्वर, जीव, प्रकृति तीनों की सत्ता पृथक है। प्रकृति जड़ होने के कारण हमें विभिन्न स्वरूपों में दिखाई देती है और ईश्वर और जीव द्रव्य होकर भी हमें दिखाई नहीं देते। इसका कारण केवल एक है कि ईश्वर व जीव का भौतिक शरीर नहीं है। इसलिए ईश्वर तथा जीव न तो जलते हैं, ना गलते हैं। ईश्वर साक्षी है। जीव कर्ता ,भोक्ता है।
मूर्ति पूजा नहीं होनी चाहिए, केवल ईश्वर की ही पूजा हो।
एक ईश्वर की ही उपासना करनी योग्य है। मूर्ति पूजा करने से बुद्धि जड़ हो जाती है । अत्यधिक शुभ कर्म करने के पश्चात बड़ी कठिनाई से मिले दुर्लभ मानव चोले को मूर्ति पूजा के धंधे में फंसा कर जीवन को नष्ट करना है। ईश्वर व जीव के प्रति कोई मध्यस्थ नहीं है, अर्थात कोई पंडा पुजारी नहीं है। जो ईश्वर के दर्शन करा दे अथवा ईश्वर के दर्शनों से वंचित कर दे। ईश्वर सब के समीप है ।ईश्वर सबको सुगमता पूर्वक ज्ञान चक्षु से लभ्य है।
ईश्वर अवतार नहीं लेता। राम, कृष्ण ,शिव ,विष्णु ,ब्रह्मा ,महेश यह ईश्वर के अवतार नहीं हैं।
मर्यादा पुरुषोत्तम राम भारतीय संस्कृति की सबसे सुंदर परिभाषा हैं, सबसे सुंदर व्याख्या हैं ,उनका व्यक्तित्व और कृतित्व भारतीय संस्कृति का विस्तार है, इसलिए उनके चित्र की नहीं चरित्र की पूजा होनी चाहिए । राम वेदों के विद्वान थे। राम महाबलशाली थे।राम मर्यादा पुरुषोत्तम थे। जिन्होंने अपनी मर्यादा को किसी भी आपद्धकाल में छोड़ा नहीं था। वे विष्णु के अवतार नहीं थे बल्कि जो विष्णु के गुण होते हैं, वह श्रीराम के अंदर थे। विष्णु जैसे गुणों के होने के कारण लोगों को भ्रांति हो गई और उन्होंने विष्णु का अवतार अज्ञानता वश मान लिया राम को।
श्री कृष्ण योगीराज थे। जो 16 कलाओं के ज्ञाता थे। चारों वेदों में लगभग ₹16000 ऋचाएं हैं। चारों वेदों की ऋचाऐं योगीराज श्री कृष्ण जी को कंठस्थ थीं। उनकी 16000 रानियां अथवा प्रेमिका या गोपियां नहीं थी।
बल्कि श्री कृष्ण जी 16000 वेदों की विचारों में रमण करते थे। इसलिए उनकी 16000 गोपीकाओं का कथन निराधार एवं गलत है।
शिव ,विष्णु और ब्रह्मा ईश्वर के गौणिक नाम हैं। ईश्वर कल्याण करता है ,इसलिए शिव है ।ईश्वर पालन करता है ,भरण पोषण करता है ,सर्वत्र व्याप्त है , ईश्वर विभु है,इसलिए विष्णु है ।ईश्वर ज्ञान का आदि स्रोत है इसलिए ब्रह्मा है। ईश्वर देवताओं का भी देवता है ,इसलिए महादेव है ,महेश है।
ईश्वर जीव और प्रकृति तीनों अनादि है ।प्रकृति के सत, रजस, और तमस तीन तत्वों से पूरे ब्रह्मांड की रचना ईश्वर ने महत् प्रदान करके की है। इन्हीं तीन तत्वों में विकार आता है। मूल प्रकृति अविकारिणी है। मूल प्रकृति भी नष्ट नहीं होती है। इसी प्रकार पुरुष अर्थात ईश्वर तथा जीव भी अनादि हैं। इसी को त्रैत वाद का सिद्धांत कहा जाता है।

मांस मनुष्य का भोजन नहीं है। परमपिता परमेश्वर ने मनुष्य के शरीर की आकृति दी शाकाहारी जीव की ही बनाई है। मांस भक्षी होना ईश्वर की आज्ञा का उल्लंघन करना है। शराब,पान ,गुटखा ,तंबाकू आदि नशा कारक पदार्थों का सेवन वर्जित है। क्योंकि ये मन को प्रतिकूलात्मक रूप से प्रभावित करते हैं। इस प्रकार के अभक्ष्य पदार्थों का भक्षण करने से बुद्धि नष्ट होती है और मनुष्य इस चोले को पाकर जिस पवित्र साधना में लगना चाहता है उसमें मन नहीं लग पाता।
द्यूत अर्थात जुआ नहीं खेलना चाहिए।
धन कमाने का साधन उचित धर्म युक्त हो। पाप से धन एकत्र नहीं करना चाहिए। अनुचित साधनों से कमाया गया धन अपने साथ रोग, शोक , विपत्ति और दुःख लेकर आता है।

मुक्ति में पांच क्लेश क्रमश: अस्मिता, अविद्या, राग ,द्वेष और अभिनिवेश बाधक है ,बंध है । इन्हीं के कारण से मनुष्य मुक्ति को प्राप्त नहीं कर पाता है। मानव जीवन का उद्देश्य मुक्ति प्राप्त करना है। जब तक मुक्ति ना हो जाए तब तक मिलने वाले बार-बार के मनुष्य जीवन व्यर्थ का यही मानना चाहिए। मनुष्य वही है जो संसार में आने के अपने उद्देश्य को समझ लेता है। ऋषि और चिंतनशील लोग कभी संसार के झगड़ों में नहीं फंसते हैं। इसीलिए कहा जाता है कि संसार में आकर वैर पालना अनार्यों का कार्य है। आर्य वही है जो संसार में आकर किसी से अनावश्यक बैर नहीं पालता और वैर उत्पन्न होने की परिस्थितियों से भी बचता है।
लेकिन परिवार ,राष्ट्र और संसार के उपकार के लिए अपने प्राणों की बाजी लगाने में भी पीछे नहीं रहता है।
पुरुषार्थ प्रारब्ध से बड़ा होता है।

हमारा नाम आर्य है हिंदू नहीं।

प्राचीन ग्रंथों में केवल आर्य शब्द है।
हमारा अभिवादन नमस्ते है ।नमस्ते के अतिरिक्त अन्य नहीं है।

आर्य भारत के मूल निवासी हैं। अर्थात कहीं बाहर से नहीं आए हैं।
सृष्टि का प्रारंभ त्रिविष्टप पर्वत पर हुआ था, जिसे आज तिब्बत कहते हैं ।वहीं से सर्वप्रथम आर्यावर्त में (भारतवर्ष में )आर्य लोगों का निवास हुआ। इसी लिए इस देश का नाम प्राचीन में आर्यावर्त था।

यह भी आर्य वैदिक मान्यता है कि मुर्दा जलाना चाहिए ,गाडना नहीं चाहिए।
बाल विवाह अनुमन्य न हों।
सती प्रथा अनुमन्य न हों।
विधवा विवाह अनुमन्य हों। गुण,कर्म और स्वभाव मिलाकर विवाह अथवा अन्य मित्रता जैसे संबंध करने चाहिए।
वेद सभी सत्य विद्याओं का पुस्तक है।
गुरु केवल परमेश्वर है। ईश्वर अलौकिक गुरु है। ईश्वर पारलौकिक विद्याओं का एकमात्र स्रोत है। इसलिए ईश्वर गुरुओं का भी गुरु है। वह महागुरु है ।वह देवगुरु है।
लौकिक गुरु माता-पिता आचार्य हैं। इन्हीं के सानिध्य में रहकर और उचित शिक्षा प्राप्त कर हम महागुरु का परिचय प्राप्त करते हैं। जब एक बार उस महागुरु से परिचय करा दिया जाए तो फिर उसी की शरण में चलने की तैयारी करनी चाहिए।
वेद सृष्टि के प्रारंभ में प्राकृत भाषा में थे जो संस्कृत से मिलती जुलती है। कुछ काल पश्चात संस्कृत का प्रचलन बना। संस्कृत पूरे आर्यवर्त में बोलचाल की साधारण सी भाषा थी। आर्यावर्त से ही पूरे विश्व में लोग जहां जहां बसते रहे वहां वहां आर्यों की सभ्यता संस्कृति विकसित होती रही। एक ही भाषा से ,संस्कृत भाषा से पूरा विश्व जुड़ा रहा। पूरा ज्ञान- विज्ञान संस्कृत भाषा में था। महाभारत के समय में अमेरिका से बबरीक ,इंग्लैंड से विडालाकच्छ, चीन के शल्य भगदत्त , कंधार वर्तमान के अफगानिस्तान के नरेश शकुनी आदि अन्य देशों से आने वाले राजा भी संस्कृत बोलते थे। महाभारत के पश्चात भारतवर्ष का ही नहीं बल्कि विश्व का पतन हुआ। इसलिए आर्य भाषा संस्कृत सभी भाषाओं की जननी है।
व्रत एवं तीर्थ करने से कर्माशय एवं कर्मफल समाप्त नहीं होते हैं। प्रायश्चित करने से पाप नहीं धुलते हैं। हां इतना अवश्य होता है कि प्रायश्चित करने से मन ,बुद्धि, चित्त पवित्र होते हैं और पवित्र कार्यों में हमारी वृत्ति लगने लगती है। जिससे पापों की निवृत्ति होने लगती है पर जो आज तक कर लिया है उसका फल नहीं मिलेगा, ऐसा कभी नहीं हो सकता।
वैदिक मान्यताओं के अनुसार तीर्थ एवं व्रत करना अनुचित है। व्रत अच्छे गुणों को धारण करना होता है। व्रत का तात्पर्य है कदापि उपवास करने से नहीं है।
इस प्रकार की वैदिक मान्यताओं को अपनाकर हमें देखना चाहिए कि हम स्वयं इन पर कितना अमल कर रहे हैं ? यदि हमारे परिवार का या पड़ोस का कोई भी व्यक्ति हमें इन वैदिक मान्यताओं के विपरीत आचरण करता हुआ मिलता है तो हम उसका भी उद्धार करने का प्रयास करें। अपनी वैदिक मान्यताओं के संबंध में हमें यह जानना चाहिए कि इनको अपनाने से ही जीवन का उद्धार होता है।

देवेंद्र सिंह आर्य एडवोकेट
चेयरमैन” उगता भारत समाचारपत्र

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