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भारतीय संविधान के प्रारूपकार सर बी. एन. राऊ

डॉ. राधे श्याम द्विवेदी
भारत का संविधान विश्व का सबसे बड़ा लिखित संविधान है। देश का कानून और संसद इसके द्वारा ही संचालित होती है। देश में जब जब कोई संकट आता या राजनीतिक विवाद होते हैं, तब-तब संविधान का ही हवाला देकर उस विवाद और संकट को हल करने की बात की जाती है। आजादी के 75वें साल में आते-आते और अपने लागू होने की 71वीं सालगिरह तक अपने देश में संविधान किसी धर्मग्रंथ से भी ज्यादा पूजनीय और पवित्र बन चुका है। लेकिन इसके निर्माण से जुड़े कई ऐसे तथ्य हैं, जिसे बहुत कम ही लोग जानते हैं।
संविधान सभा सदस्यों का जनता से सीधे चुनाव नहीं :-
जिस संविधान सभा ने संविधान तैयार किया, एक दौर तक उसका विरोध वामपंथी विचारधारा करती रही। उनका तर्क था कि संविधान सभा के सभी 389 सदस्यों का चुनाव तो हुआ था, लेकिन उनका निर्वाचन प्रत्यक्ष नहीं था। यानी जिस जनता के लिए वह सभा संविधान का निर्माण करने वाली थी, उसका निर्वाचन उस जनता ने नहीं किया था।
संविधान सभा के सभी सदस्यों को या तो तब के अंग्रेज शासित राज्यों के विधान मंडलों और रियासतों के सीमित मतदाता वर्ग ने चुना था। संविधान सभा के कई सदस्य बेशक भारत की आजादी के आंदोलन के सेनानी रहे थे, लेकिन जिस प्रारूप समिति ने इसे तैयार किया, उसका कोई सदस्य आजादी के आंदोलन में शामिल ही नहीं था। संविधान सभा की प्रारूप समिति के सातों सदस्यों में से एक कन्हैया लाल मणिक लाल मुंशी स्वाधीनता सेनानी तो थे, लेकिन भारत की आजादी के लिए हुई निर्णायक जंग यानी भारत छोड़ो के वक्त वे चुप थे। आजाद भारत के पहले भारतीय गवर्नर जनरल चक्रवर्ती राजगोपालाचारी भी भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान चुप रहे। बाबा साहब भीमराव आंबेडकर इस प्रारूप समिति के अध्यक्ष थे। लेकिन वे भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान ब्रिटिश वायसराय की काउंसिल के सदस्य थे। यानी आजादी के आंदोलन में उनकी सीधी भागीदारी नहीं थी, बल्कि उस दौरान वह ब्रिटिश सरकार के मंत्री की हैसियत से काम कर रहे थे। संविधान सभा का गठन छह दिसंबर 1946 को हुआ था। इसके तहत संविधान निर्माण की समिति बनी, जिसे ड्राफ्ट कमेटी भी कहा जाता है। उसके जिम्मे संविधान के तब तक तैयार संविधान के प्रारूप पर बहस करके उसे 389 सदस्यीय संविधान सभा में प्रस्तुत करना था, जो उसे अंतिम रूप देगी।
बी.एन. राऊ विधिक सलाहकार का होम वर्क:-
देश के भावी सरकार के लिए तत्कालीन अंतरिम सरकार के प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और उप-प्रधानमंत्री सरदार पटेल ने कर्नाटक के जाने माने विधिवेत्ता बेनेगल नरसिम्ह राव को विधि सलाहकार का पद देकर संविधान के प्रारूप पर काम करने के लिए 1946 में ही जिम्मेदारी दे दी थी। बी एन राऊ ने मद्रास और कैंब्रिज विश्वविद्यालय से पढ़ाई की थी। वर्ष 1910 में वे भारतीय सिविल सेवा के लिए चुने गए। वर्ष 1939 में उन्हें कलकत्ता हाई कोर्ट का न्यायाधीश बनाया गया। जम्मू-कश्मीर के महाराजा हरि सिंह ने 1944 में उन्हें अपना प्रधानमंत्री नियुक्त किया था। इन्हीं राऊ साहब को संविधान का मूल प्रारूप तैयार करने की जिम्मेदारी दी गई थी। भारत सरकार के संविधान सलाहकार के नाते उन्होंने वर्ष 1945 से 1948 तक अमेरिका, कनाडा, ब्रिटेन आदि देशों की यात्र की और तमाम देशों के संविधानों का अध्ययन किया। राऊ सर अन्तरराष्ट्रीय न्यायालय के न्यायाधीश थे। ।वह 1950 से 1952 तक संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषदमें भारत के प्रतिनिधि भी थे। उनके भाई भारतीय रिजर्व बैंक के गवर्नर बेनेगल रामा राऊ, पत्रकार और राजनीतिज्ञ बी शिव राऊ थे। भारतीय संविधान का प्रारूप बी एन राऊ सर ने ही तैयार किया था। सच्चिदानंद सिन्हा ने भी सहयोग किया था। बी एन राऊ को 1946 मेंभारतीय संविधान केनिर्माण में संविधान सभा की संवैधानिक सलाहकार नियुक्त किया गया था। वे संविधान के लोकतांत्रिक ढांचे की सामान्य संरचना के लिए जिम्मेदार थे और उन्होंने फरवरी 1948 में इसका शुरुआती मसौदा तैयार किया था। उन्होंने 395 अनुच्छेद वाले संविधान का पहला प्रारूप तैयार करके संविधान की प्रारूप समिति के अध्यक्ष डा. आंबेडकर को सौंप दिया था।
भीमराव आंबेडकर उनके कार्यों को सराहे भी थे:-
अगस्त 1947 को प्रारूप समिति की बैठक में कहा गया कि संविधान सलाहकार बी एन राऊ द्वारा तैयार प्रारूप पर विचार कर उसे संविधान सभा में पारित करने हेतु प्रेषित किया जाए। संविधान सभा में संविधान का अंतिम प्रारूप प्रस्तुत करते हुए 26 नवंबर 1949 को भीमराव आंबेडकर ने जो भाषण दिया था, उसमें उन्होंने संविधान निर्माण का श्रेय बी एन राऊ को भी दिया है। संविधान सभा की प्रारूप समिति के अध्यक्ष आंबेडकर थे। उसके दूसरे सदस्य थे अल्लादि कृष्णास्वामी अय्यर, जो मद्रास प्रांत के महाधिवक्ता रहे। इसके तीसरे सदस्य थे, कन्हैया लाल मणिक लाल मुंशी। मुंशी की ख्याति गुजराती और हिंदी लेखक के साथ ही जाने-माने वकील के रूप में भी रही है। मुंशी ने भी 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में हिस्सा नहीं लिया था। तब उनका मानना था कि गृह युद्ध के जरिये भारत अखंड रह सकता है। वे पाकिस्तान के निर्माण के विरोध में इसी विचार को सहयोगी पाते थे। इसके चौथे सदस्य थे, असम के मोहम्मद सादुल्ला। वैसे तो उन्होंने मुस्लिम लीग के साथ राजनीति की, लेकिन वे भारत में ही रहे। पांचवें सदस्य थे आंध्र प्रदेश के मछलीपत्तनम निवासी एन माधवराव, जो मैसूर राज्य के दीवान यानी प्रधान मंत्री भी रहे। वे तेलुगूभाषी थे और दिलचस्प है कि हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाने के विरोधी रहे। छठे सदस्य को लोग नेहरू सरकार में वित्त मंत्री रहे टीटी कृष्णमाचारी के रूप में जानते हैं। सातवें सदस्य एन गोपालास्वामी अयंगर थे। वे बीएन राऊ से पहले कश्मीर के प्रधान मंत्री रहे।
लगभग तीन साल में तैयार हुआ था संविधान:-
भारत के संविधान का निर्माण 26 नवम्बर 1949 को हुआ था इस संविधान का निर्माण एक संविधान सभा द्वारा किया गया था इसके निर्माण में 2 वर्ष 11 माह और 18 दिन का समय लगा था. संविधान सभा के निर्माण का प्रस्ताव सर्वप्रथम वर्ष 1934 में एम.एन. राऊ द्वारा रखा गया था. जबकि संविधान सभा के गठन के लिए चुनाव वर्ष 1946 में कैबिनेट मिशन योजना के तहत हुए थे.
संविधान सभा के सदस्यों की कुल संख्या 389 निश्चित की गई थी. जिसमें 292 प्रतिनिधि ब्रिटिश प्रान्तों के, 4 चीफ कमिश्नर और 93 प्रतिनिधि देशी रियासतों के थे. कुल 389 सदस्यों में से प्रांतों के लिए निर्धारित 296 सदस्यों के लिय चुनाव हुए जिसमें कांग्रेस को 208 वोट, मुस्लिम लीग को 73 वोट और 15 वोट अन्य दलों को और स्वतंत्र उम्‍मीदवार को मिले थे.
सच्चीदानंद सिन्हा अस्थाई और डा.राजेंद्र प्रसाद अध्यक्ष :-
संविधान सभा की प्रथम बैठक का आयोजन 9 दिसंबर 1946 को दिल्ली स्थित काउंसिल चैम्बर के पुस्तकालय भवन में हुआ था , और इसकी अध्यक्षता सभा के सबसे बुजुर्ग सदस्य सच्चीदानंद सिन्हा ने की थी वो सभा के अस्थाई अध्यक्ष चुने गए थे. संविधान सभा के स्थाई अध्यक्ष डॉ राजेंद्र प्रसाद थे. संविधान सभा में 12 महिला, 33 अनुसूचित जाति, 213 सामान्य, 4 सिख और 79 मुस्लिम सदस्य थे.
अनेक समितियों ने इसे सजाया संवारा:-
संविधान सभा की कार्यवाही 13 दिसम्बर 1946 ई. को शुरू हुई थी. संविधान सभा की 13 समितियां थी. जो संविधान सभा के विभिन्न कार्यों से निपटने के लिए गठित की गईं थी. इन समितियों में 8 समितियां प्रमुख थीं, नीचे उन समितियों के नाम और उनके अध्यक्ष के नाम दिए गयें हैं-
समिति : अध्यक्ष
मसौदा समिति : बी.आर. अंबेडकर
संघ शक्ति समिति : जवाहरलाल नेहरू
केंद्रीय संविधान समिति : जवाहरलाल नेहरू
प्रांतीय संविधान समिति : वल्लभभाई पटेल
मौलिक अधिकारों, अल्पसंख्यकों और जनजातीय तथा बहिष्कृत क्षेत्रों पर सलाहकार समिति : वल्लभभाई पटेल
प्रक्रिया समिति के नियम : राजेंद्र प्रसाद
राज्य समिति : जवाहरलाल नेहरू
संचालन समिति : राजेंद्र प्रसाद
अनेक देशों के संविधान से अच्छी चीजें ली गई:-
संविधान सभा के संवैधानिक सलाहकार बी. एन राव थे. राऊ ने दुनिया के बहुत सारे संविधानों का अध्ययन किया और यूके, आयरलैंड, कनाडा, अमेरिका जाकर वहां के विधि विद्वानों से इसके विषय में विस्तृत चर्चा की। फिर अक्टूबर 1947 में उन्होंने संविधान का पहला ड्राफ्ट तैयार किया और इस ड्राफ्ट को भीमराव अंबेडकर की अध्यक्षता वाली 7 सदस्यीय ड्राफ्टिंग कमेटी को सौंपा गया। इस ड्राफ्ट पर विचार करने के बाद कमेटी ने एक नया ड्राफ्ट तैयार किया और उसे पर संविधान सभा के सुझाव मांगे। दिए गए सुझावों के आधार पर ड्राफ्ट में कई बदलाव किये गए और बदले हुए ड्राफ्ट के सभी प्रावधानों पर एक वर्ष तक चर्चा हुई. जिसके बाद संविधान को 26 नवंबर, 1949 ई० को संविधान सभा द्वारा अंगीकृत किया गया ।
संविधान और उसके विदेशी स्त्रोत:-
1935 भारत सरकार अधिनियम मूलतः अनुप्राणित :-
भारतीय संविधान के 70 प्रतिशत भाग को 1935 के भारत सरकार अधिनियम से लिया गया है । इसलिए अंग्रेजों द्वारा लागू गुलामी के कानून “इन्डियन गवर्नमेंट एक्ट 1935” की 256 धारायें समलित की गई। 30 प्रतिशत भाग के प्रावधानों को 124 धाराओं के रूप में अलग-अलग देशों से लिए गया है । इस प्रकार 256 + 124 +15=395 कुल धाराएं बनीं। इनमे 15 धाराएं नेहरू जी ने जबरदस्ती डलवाई थी।
संयुक्त राज्य अमेरिका के संविधान से मौलिक अधिकार, न्यायिक पुनरावलोकन, संविधान की सर्वोच्चता, न्यायपालिका की स्वतंत्रता, निर्वाचित राष्ट्रपति एवं उस पर महाभियोग, उपराष्ट्रपति उच्चतम एवं उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों को हटाने की विधि एवं वित्तीय आपात आदि अमेरिका संविधान से 35 धारायें समलित की गई।
ब्रिटेन के संविधान से संसदात्मक शासन-प्रणाली, एकल नागरिकता एवं विधि निर्माण प्रक्रिया आदि ब्रिटेन से 22 धारायें समलित की गई।
आयरलैंड के संविधान से नीति निर्देशक सिद्धांत, राष्ट्रपति के निर्वाचक-मंडल की व्यवस्था, राष्ट्रपति द्वारा राज्य सभा में साहित्य, कला, विज्ञान तथा समाज-सेवा इत्यादि के क्षेत्र में ख्यातिप्राप्त व्यक्तियों का मनोनयन, आपातकालीन आपातकालीन उपबंध आदि आयरलैंड की 18 धाराएं समलित की गई।
ऑस्ट्रेलिया के संविधान से प्रस्तावना की भाषा, समवर्ती सूची का प्रावधान, केंद्र एवं राज्य के बीच संबंध तथा शक्तियों का विभाजन आदि आस्ट्रेलिया से 16 धारायें समलित की गई।
जर्मनी के संविधान से आपातकाल के प्रवर्तन के दौरान राष्ट्रपति को मौलिक अधिकार संबंधी शक्तियां आदि जर्मनी से 8 धारायें समलित की गई।
कनाडा के संविधान से संघात्‍मक विशेषताएं अवशिष्‍ट शक्तियां केंद्र के पास आदि कनाडा से 24 धारायें समलित की गई।
दक्षिण अफ्रीका के संविधान से संविधान संशोधन की प्रक्रिया प्रावधान नामक सिर्फ से 1 धारा समलित की गई।
कुल मिलाकर 124 धरायें विदेशी संविधान से ली गई हैं।
इसके अलावा रूस के संविधान से मौलिक कर्तव्यों का प्रावधान और जापान के संविधान से विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया का भी अपनाया गया है।
बड़े समूह द्वारा बना बड़ा संविधान:-
26 जनवरी 1950 को संविधान देश में पूरी तरह से लागू हो गया, मूल संविधान में कुल 22 भाग, 395 अनुच्छेद और 8 अनुसूचियां थीं. जबकि वर्तमान में इसमें 470 अनुच्छेद, 25 भाग, और 12 अनुसूचियां हैं। भारत के लिखित “संविधान” का निर्माण तो “संविधान सभा” के सारे 389 सदस्यों ने एक साथ मिलकर किया था! जिसके अध्यक्ष – डॉ राजेन्द्र प्रसाद, उपाध्यक्ष… एच. मुखर्जी और संवैधानिक सलाहकार – बी.एन. राव साहब थे। कुल 13 समितियां थी! उसमें से केवल एक समिति के 7वें सदस्य भीमराव अम्बेडकर थे।भारत के “संविधान” में 124 धारायें विदेशी संविधानों से और 256 धारायें वही पुरानी हैं, जो अंग्रेजों ने गुलाम भारत के नागरिकों पर शासन करने के लिये लागू की थी। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भी भारत के संविधान में उक्त 256 धारायें लागू की गयी ।इस तरह से भारत के संविधान में टोटल 395 धाराओं में मात्र 15 नई धारायें शेष बची। इसमें अधिकतर धारायें,जो जवाहरलाल नेहरू ने जबरदस्ती लागू करायी हैं। वो पूरी तरह से केवल हिन्दुओं, सिखों, बौद्धों और जैनियों को मुसलमानों / ईसाईयों का गुलाम बनाने के षड़यंत्र में लिखवाई हैं!
उदाहरण 1. धर्मनिरपेक्ष भारत देश में धारा 30 मुसलमानों और ईसाइयों को अपनी धार्मिक शिक्षा देने हेतु मदरसा और कान्वेंट स्कूल खोलने की कानूनी अनुमति एवं संरक्षण देता है! धारा 30ए हिन्दुओं को धार्मिक आधार पर शिक्षा देने पर कानूनन रोक लगाता है!
उदाहरण 2 : क्या धारायें 370 तथा 35ए काश्मीर में गजवा-ए -हिन्द के लिये, फिर धीरे-धीरे भारत से पूरी तरह से हिन्दुओं को समाप्त करने की नीयत से लागू थी ।
इसीलिये भारत के संविधान से दु:खी होकर डॉ.भीमराव आम्बेडकर ने 2 सितम्बर 1953 को राज्य सभा में कहा, कि भारत के संविधान में भारत के नागरिकों के लिये कुछ भी नहीं है! यह संविधान भारत के नागरिकों के साथ न्याय और भला नहीं करेगा!
एक विलक्षण प्रतिभा वाले रहे बी एन राऊ:-
बी एन राव ने भी संविधान में निर्देशक सिद्धांतों को शामिल करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी. उन्होंने भारत सरकार और संविधान सभा के संवैधानिक सलाहकार के रूप में अपने काम के लिए किसी भी पारिश्रमिक को स्वीकार करने से इंकार कर दिया। अपने अंतिम वर्षों में, जब उन्होंने संयुक्त राष्ट्र में भारत का प्रतिनिधित्व किया और अंतरराष्ट्रीय न्यायालय में न्यायाधीश के रूप में कार्य किया, तो उन्होंने एक वैश्विक कद पाया. बी आर अम्बेडकर ने संविधान सभा में अपने समापन भाषण में बी एन राव के योगदान को याद करने हुए कहा था, “मुझे जो श्रेय दिया जाता है वह वास्तव में मेरा नहीं है. यह आंशिक रूप से संविधान सभा के संवैधानिक सलाहकार सर बी एन राव का है, जिन्होंने मसौदा समिति के विचार के लिए संविधान का एक मोटा मसौदा तैयार किया था।” संविधान सभा के अध्यक्ष डॉ राजेंद्र प्रसाद ने राव के बारे में कहा “(बी एन राव) वह व्यक्ति था जिसने भारतीय संविधान की योजना की कल्पना की और इसकी नींव रखी।” 30 नवंबर 1953 को राऊ की ज्यूरिख में आंतों के कैंसर से मौत हो गई। भारत के प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने उनकी मृत्यु के बारे में संसदमें बात की और सदन ने एक पल का मौन अनुश्रवण दी गई है। 1988 में, उनकी जन्म जयंती के अवसरों पर, सरकार भारत सरकार ने बीएन राव के सम्मान में एक डाक टिकट जारी किया , जबकि उन्हें भारत रत्न या अन्य किसी उच्च नागरिक सम्मान से भी सम्मानित किया जाना चाहिए।

(लेखक पुस्तकालय एवं सूचनाधिकारी पद पर कार्य कर चुका हैं। वर्तमान में साहित्य, इतिहास, पुरातत्व और अध्यात्म विषयों पर अपनी राय देता रहता हैं।)

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