भारत रूस और चीन के गठबंधन की तैयारी में पुतिन

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उमेश चतुर्वेदी

यूक्रेन के साथ युद्ध में जूझ रहे रूस पर पूरी दुनिया का दबाव है कि वह यूक्रेन से लड़ाई बंद करे। लेकिन रूस चाहता है कि एशिया की तीन महाशक्तियों- चीन और भारत के साथ रूस की दोस्ती बने और दुनिया के सामने एक नया गठबंधन बनकर उभरे। हाल ही में खत्म हुए जी-20 देशों के विदेश मंत्रियों के सम्मेलन में रूस के इस रुख का खुलासा हुआ। इसी बैठक में भारत के पारंपरिक सहयोगी और मित्र देश रूस ने सुझाव दिया कि भारत और चीन के बीच दोस्ती बढ़नी चाहिए। दिल्ली में हुए जी-20 विदेश मंत्रियों के सम्मेलन और उसके बाद रायसीना डायलॉग में रूस के विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव ने ऐसा कह कर अमेरिका को चौंका दिया। सर्गेई लावरोव को जब सम्मेलन में बोलने का मौका मिला, तो उन्होंने कहा कि रूस चाहता है कि चीन और भारत दोस्त बनें। सर्गेई ने कहा कि रूस का दोनों देशों से बेहतर रिश्ता है। लेकिन अब रूस चाहता है कि एशिया के दोनों पड़ोसी देश मित्र बनें।

सर्गेई लावरोव ने जब यह बात कही, उसके ठीक एक दिन पहले भारतीय विदेश मंत्री एस जयशंकर ने चीन और भारत के रिश्तों को लेकर जो कहा था, उस पर विवाद हो गया था। जयशंकर ने कहा था कि भारत के चीन से रिश्ते असामान्य हैं। जयशंकर ने यह बात चीन के विदेश मंत्री किन कांग के साथ हुई बैठक में कही थी। इस संदर्भ में रूसी विदेश मंत्री का सुझाव बेहद अहम हो जाता है। सर्गेई ने रायसीना डायलॉग में चीन-भारत और चीन-रूस संबंधों पर पूछे गए एक सवाल के जवाब में दोनों देशों को दोस्ती करने की सलाह दे डाली। सर्गेई ने कहा कि इस मित्रता में रूस की मौजूदगी भारत और चीन के लिए बेहतर हो सकती है। सर्गेई ने दोनों देशों के बीच दोस्ती को आगे बढ़ाने के लिए खुद का हाथ भी बढ़ाने का प्रस्ताव दिया। उन्होंने कहा कि रूस चीन और भारत को करीब लाने का हमेशा से पक्षधर रहा है।

यह सच है कि यूक्रेन संकट के बाद भारत ने रूस से सबसे ज्यादा कच्चा तेल खरीदा है। इसे लेकर शुरू में अमेरिका ने नाक भौं सिकोड़ा था। लेकिन बाद में अमेरिका ने तर्क दिया कि भारत ने अपने ढंग से अपनी अर्थव्यवस्था को देखते हुए कदम उठाया है। याद कीजिए, साल 1999। तत्कालीन वाजपेयी सरकार ने जब परमाणु परीक्षण किया था, तब अमेरिका समेत उसकी अगुआई वाली पश्चिमी दुनिया ने भारत पर कई प्रतिबंध लगाये थे। लेकिन अब भारत दुनिया की पांचवीं बड़ी अर्थव्यवस्था है और अब भारत को नकार पाना आसान नहीं है। इसीलिए भारत के रूस से सहयोगी संबंध को अमेरिका समेत दूसरे देश भी नकार नहीं पा रहे हैं। भारत ने इस दिशा में अपनी तरह से कोशिश भी की। उसने यूक्रेन पर रूस के रुख का समर्थन भी नहीं किया। चूंकि रूस भारत का पारंपरिक सहयोगी है, उसने अतीत में भारत को सैनिक साजोसामान से भी मदद की है। इस लिहाज से माना जा रहा था कि भारत कभी उसके खिलाफ कदम भी नहीं उठाएगा। लेकिन भारत ने इस मिथक को तोड़ा और रूस के रुख का समर्थन नहीं किया। अलबत्ता संयुक्त राष्ट्र संघ में जब भी रूस के खिलाफ अमेरिकी अगुआई में अभियान भी चला, उस वक्त भारत ने उस अभियान का भी समर्थन नहीं किया। युद्धग्रस्त रूस से कच्चे तेल की खरीददारी करके भारत भी एक तरह से रूस की मदद कर रहा है। वहीं भारत रणनीतिक तौर पर अपने लिए सस्ता तेल भी खरीदने में कामयाब रहा है। लेकिन अब रूस को लगने लगा है कि बदली हुई वैश्विक परिस्थिति में भारत और चीन को साथ आना चाहिए। वैसे अमेरिका जिस तरह चीन पर हमलावर है, वैसी स्थिति में चीन को भी ऐसा ही रुख अख्तियार करना पड़ सकता है। लेकिन भारत से रिश्ते सुधारने की दिशा में सबसे बड़ी बाधा उसका साम्राज्यवादी रुख है। सीमाओं पर अगर वह संयत और सौहार्द का रुख रखे तो हालात बदल सकते हैं। लेकिन चीन ऐसा नहीं करता। इसलिए सर्गेई को इस विषय में भी अपनी राय रखनी चाहिए। हालांकि उन्होंने ऐसा नहीं किया और सिर्फ दोस्ती की ही बात करके इतिश्री समझ ली।

सर्गेई लावरोव ने रूस और यूक्रेन युद्ध पर भी अपने विचार रखे। इस संदर्भ में पश्चिमी देशों के रुख की आलोचना करते हुए सर्गेई ने कहा कि सब चाहते हैं कि रूस ही बातचीत की पहल करे। लेकिन कोई यूक्रेन के रुख पर ध्यान नहीं दे रहा है। उन्होंने यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमीर जेलेंस्की के उस आदेश का हवाला दिया, जिसमें कहा गया है कि यूक्रेन से बातचीत देशद्रोह होगा। रूस के इस रुख से साफ है कि वह अमेरिका की अगुआई वाले पश्चिमी देशों के सामने झुकने नहीं जा रहा है। सर्गेई ने यह भी कहा कि यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमीर जेलेंस्की से कोई नहीं पूछ रहा कि वे कब बातचीत करने जा रहे हैं। दरअसल पिछले साल जेलेंस्की ने एक दस्तावेज़ पर हस्ताक्षर किया था, जिसमें कहा गया है कि जब तक रूस में व्लादिमीर पुतिन राष्ट्रपति के पद पर रहेंगे, तब तक रूस से बातचीत अपराध होगा। इस सम्मेलन में उन्होंने पश्चिमी देशों की बजाय भारत पर ही भरोसा करने की बात कही।

सर्गेई के बयान के बाद साफ है कि रूस एशिया की तीन बड़ी शक्तियों- भारत, चीन और खुद के साथ नयी साझेदारी विकसित करना चाहता है। इसमें वह पहल करने को भी तैयार है। इसका भविष्य क्या होगा, अभी कहना जल्दबाजी होगी। इसकी वजह है कि चीन का रुख अभी साफ नहीं है। वह भारत से अच्छे रिश्ते भी रखना चाहता है और सीमा पर तनाव की वजह भी बनता है।

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