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डॉ राकेश कुमार आर्य की लेखनी से भयानक राजनीतिक षडयंत्र राजनीति

राष्ट्र भाषा हिन्दी की दुर्गति, भाग-2

 जिस देश की अपनी कोई भाषा नहीं होती- वह बैसाखियों पर चलता है। ऐसे देश की स्वाधीनता उधार होती है, उसकी आस्थायें उधार होती हैं, उसकी मान्यतायें और परम्परायें भी उधार होती हैं। जब ऐसी परिस्थितियां किसी देश के समाज में बन जाया करती हैं तब इस देश का सांस्कृतिक पतन होने लगता है। आज रक्षाबंधन पर बहन राखी का थाल सजाए खड़ी रह सकती है, किंतु ‘वेलेन्टाइन डे’ पर प्रेमिका के साथ ऐसा नहीं हो सकता। क्योंकि हमारी मान्यतायें उधार हो गयी हैं, आस्थायें और परम्परायें भी उधार हो गयी हैं। 

हमने विदेशी मान्यताओं को अपनाकर ‘स्वदेशी’ को छोड़ दिया है। आज रक्षाबंधन पर बहन का ध्यान रखने की हमारी मौलिक परम्परा हमारी उधारी मान्यताओं, आस्थाओं और परम्पराओं की बाढ़ में बह गयी है। भारत की आदर्श सामाजिक परम्पराओं, मान्यताओं और आस्थाओं की पीड़ा भरी पुकार सुनने का अवकाश आज किसी को नहीं है।
पश्चिम की उपभोक्तावादी संस्कृति भारत की मानवतावादी संस्कृति के समक्ष कहीं नहीं टिक सकती। पश्चिम का भोगवाद भारत के वैराग्यवाद के समक्ष नितांत बौना ही नहीं अपितु सर्वथा विपरीत क्रिया है। हमारा अध्यात्म पश्चिम के लिए सर्वथा कौतूहल और आश्चर्य का विषय रहा है। जबकि हमारे ब्रह्म विज्ञान से तो पश्चिम आंख मिलाकर देखने तक का साहस नहीं कर सकता।
आज पश्चिम का भौतिकवाद हमारे यहां आकर पैर पसार रहा है। फिर भी हम सचेत और जागरूक नहीं हैं। यह स्थिति सचमुच अशोभनीय है। पश्चिम का उपभोक्तावाद, उसका भौतिकवाद और भोगवाद भारत में अंग्रेजी भाषा की देन है। इससे भारत के सामाजिक मूल्यों में भारी परिवर्तन आया है।
आज व्यक्ति बिना स्वार्थ के किसी के पास बैठना भी पसन्द नहीं करता। तभी तो अपने पास किसी व्यक्ति के आने पर कोई भी उससे यह पूछ लेता है कि – ‘सुनाइये, तो आज कैसे आना हुआ?’
इसका अर्थ है कि बिना स्वार्थ के आना-जाना ही मना है। जब व्यक्ति इतना स्वार्थी हो जाए कि बिना स्वार्थ के किसी के पास बैठना और उठना तक उसे अच्छा न लगे तब उस समाज की स्थिति क्या होगी? यह सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है। अपनी भाषा-राष्ट्रभाषा से विमुख होकर जो मूल्य हमें मिल रहे हैं या दिये जा रहे हैं वह भारत के भयावह भविष्य का ही चित्र प्रस्तुत करते हैं। सन् 1965 को बीते अब लगभग चालीस वर्ष का समय होने को आया। पंद्रह वर्ष वह भी निकल गये जब इस राष्ट्रभाषा का विधिवत सिंहासनारोहण हो जाना था और उसके पश्चात केे लगभग 40 वर्ष और भी बात गये। सिंहासनारोहण न होना था और न हुआ। यह हमारी मानसिक पराधीनता का प्रमाण है कि इसके विरूद्घ कोई संघर्ष की भावना भी हमारे भीतर नहीं है।
राष्ट्रभाषा जननायकों के लिए राजनीति का विषय बन गयी है। यह अनुभव का विषय है कि जो वस्तु राजनीति का विषय बनकर राजनीतिज्ञों के पाले में चली जाती है, वह स्वयं अपनी निजता को भी खो बैठती है। स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात भारत में प्रान्तों का गठन भाषायी आधार पर किया गया-यह अदूरदर्शिता थी, क्योंकि इससे राष्ट्रभाषा का विकास अवरूद्घ होना था।
आवश्यकता उस समय यह थी कि देश को एक मुख्यधारा में लाया जाए। इस मुख्यधारा में जो-जो अवरोध थे-उन्हें समाप्त किया जाये। भारत पराधीन इसलिए हुआ था कि हमारे कई क्षेत्रीय शासकों ने राष्ट्र की परिभाषा अपने-अपने राज्यों की सीमाओं के भीतर देखनी आरम्भ कर दीं। विविधताओं के रूप में वह इतना बह गये कि एकता का रंग बिल्कुल ही क्षीण हो गया। स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात इतिहास केे इस विविधता के भूत को भगाने की आवश्यकता थी। किंतु ऐसा नहीं किया गया, अपितु एक नारा गढ़ लिया गया कि-”विविधता में एकता ही भारत की पहचान है उसकी सांस्कृतिक धरोहर है।”
इस मूर्खतापूर्ण नीति का दण्ड राष्ट्र आज तक भुगत रहा है। आज राष्ट्र में अपनी-अपनी विविधताओं को अक्षुण्ण रखने की चिंता तो सबको है, लेकिन राष्ट्र की एकता की चिंता कितनों को है?
(लेखक की पुस्तक ‘वर्तमान भारत में भयानक राजनीतिक षडय़ंत्र : दोषी कौन?’ से)

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