आज भी मुस्लिम जगत और ईसाई जगत के नाम पर विश्व दो खेमों में बंट चुका है, और हम देख रहे हैं कि ये दोनों खेमे विश्व को कलह-कटुता परोस रहे हैं। इसके बीच ना तो कोई वैदिक जगत है और ना ही कोई हिंदू जगत है। इसका न होने का कारण यही है कि वैदिक संस्कृति विश्व को खेमों में नही बांटती, वह तो वसुधा को ही एक परिवार मानती है। हिंदू उसी विश्व परिवार की उपासक एक जीवन शैली है। इसी जीवन शैली को अपाकर हमें वास्तविक विश्वशांति प्राप्त हो सकती है। यह हमारे लिए गौरव की बात है कि हमने शांति की इस अवधारणा की युगों पूर्व खोज कर लिया था। आत्मशांति से विश्वशांति की ओर हम बढ़े और आत्मशांति को विश्वशांति का आधार बनाकर उसकी पूजा की। यह जीवन का सत्य था, जिसे धर्म ने विचार दिया तो राजनीति ने उसे प्रचार दिया। आत्मशांति के लिए शेष विश्व आज भी भटक रहा है, यही कारण है कि विश्व में शांति भी कहीं दिखायी नहीं देती। कुल मिलाकर विश्व को आज भी भारत के नेतृत्व की आवश्यकता है।
भारत में शांति की अवधारणा वेदों की देन है
शांति का अभिप्राय व्यवस्था है। परमपिता परमात्मा ने अपनी ऐसी व्यवस्था बनाई है कि उसकी बनायी हर वस्तु गृहादि, सूर्य, चांद-सितारे सबके सब एक व्यवस्था के भीतर रहकर व्यवस्थित और मर्यादित होकर कार्य कर रहे हैं। जिससे कहीं भी किसी भी लोक में अव्यवस्था या अशांति अर्थात उपद्रव नहीं है। मर्यादा से भटकाव होते ही व्यक्ति अथवा कोई भी वस्तु गृह-उपग्रह आदि अपनी पंक्ति तोड़ देते हैं, जिससे सर्वत्र अशांति व्याप्त हो जाती है, भारत ने व्यक्ति को मर्यादा का पाठ पढ़ाया और उससे अपेक्षा की कि तुझे मर्यादा की अपनी पंक्ति को नहीं तोडऩा है। वैदिक संस्कृति ने हर वर्ण के व्यक्ति की मर्यादाएं स्थापित कीं और उनसे अपेक्षा की कि इन मर्यादाओं को बनाये रखो। यदि मर्यादा भंग की तो तुम्हें अशांति का शिकार बनना पड़ जाएगा।
वेद ने कहा कि-‘स्वस्ति पंथामनुचरेम् सूर्याचन्द्र मसाविव।’ अर्थात हे मनुष्य तुझे वैसे ही मर्यादा-पथ में रहना है जैसे मर्यादा पथ में सूर्य-चंद्रमा रहते हैं। कभी भी कोई सा अपने मर्यादा पथ का उल्लंघन कर दूसरे के मर्यादा क्षेत्र में प्रविष्टï नहीं होता। यही शांति है। उपद्रवशून्यता की स्थिति में सकारात्मक व्यवस्था का नाम शांति है। हर व्यक्ति जब एक दूसरे का हाथ में हाथ डालकर आगे बढ़े और किसी को भी विकास या उन्नति की रफ्तार में पीछे ना छोडऩे की पवित्रतम भावना से प्रेरित हो, तब उस स्थिति को शांति की स्थिति कहा जा जाता है परमगति की स्थिति कहा जाता है। उन्नति और विकास के लिए समर्पित ऐसे लोगों के समुदाय को ही सभ्य समाज कहा जाता है।
वेद कहता है कि-
ओ३म् द्यौ: शान्तिरन्तरिक्षं शान्ति:पृथिवी शान्तिराप: शांतिरोषधय: शांति:। वनस्पतय: शांतिर्विश्वे देवा: शान्तिब्र्रहम शान्ति: सर्व शान्ति: शान्तिरेव शांति: सा मा शान्तिरेधि।। ओ३म् शान्ति: शान्ति: शान्ति:।
वेद के ऋषि ने देखा कि द्युलोक में सब कुछ व्यवस्थित है, शांत है, मर्यादित है। इसी प्रकार अंतरिक्ष में सब कुछ नियमबद्घ और व्यवस्थित है, पृथ्वी पर सब कुछ ऋतु चक्र के अनुसार नियमबद्घ होकर घटित हो रहा है अर्थात वैज्ञानिक सत्य नियमों के अनुसार सारा संसार चक्र चल रहा है। जल में शांति है, औषधियों में शांति है वे सब एक वैज्ञानिक प्रक्रिया और नियमों के अनुसार मानव जीवन के लिए उपयोगी बन रही हैं। इसी प्रकार वनस्पतियों में शांति है, विश्वचक्र में शांति है, ब्रह्मï में शांति है अर्थात सर्वत्र शांति है, इतना ही नहीं शांति स्वयं में भी शांत है। अंत में ईश्वर से प्रार्थना की गयी है कि जो शान्ति सर्वत्र व्याप्त है-आप कृपा करके मुझे भी वही शान्ति उपलब्ध करायें, अर्थात मुझे भी मर्यादा और नियमों में इस प्रकार नियमबद्घ और मर्यादित कीजिए कि मेरे भीतर आत्मानुशासन का भाव जागृत हो और मैं किसी भी प्रकार के उपद्रव या अशान्ति का शिकार न बनूं।
वेद के ऋषि का कितना सकारात्मक दृष्टिïकोण है-इस मंत्र में? उसे सर्वत्र शान्ति ही शान्ति दिखायी दे रही है। सब कुछ व्यवस्थित दिख रहा है। कहीं पर भी उपद्रव नहीं है। गिलास आधा खाली है या आधा भरा है-यह बहस ही समाप्त हो जाती है-ऋषि के इस चिंतन को समझ लेने से। उसने सर्वत्र ऋत-सत्य के नियमों के अनुकूल अपने-अपने मर्यादा पथ में रहकर कार्य होते रहने का चित्रण किया है।
इसी चित्रण से वह मनुष्य को संदेश दे रहा है कि तुझे आत्मानुशासन के माध्यम से ऐसी ही शान्ति का उपासक होना चाहिए। इसे पाते ही संसार के कलह-क्लेश मिट जाएंगे और मनुष्य को बांटने की अनेकों दीवारें गिर जाएंगी। यहां तक कि मनुष्य की स्वतंत्रता को बाधित करने वाली देशों की सीमाएं भी नष्टï हो जाएंगी। संपूर्ण भूमंडल सबके उपभोग के लिए उपलब्ध हो जाएगा। ये जो देशों की सीमाओं पर अनेकों सैनिक खड़े होकर पहरा दे रहे हैं और प्रत्येक देश को उन सैनिकों पर प्रतिवर्ष हजारों करोड़ रूपया व्यय करना पड़ रहा है युद्घ आदि के लिए और अपने देश की सुरक्षा के लिए आर्थिक संसाधन न होते हुए भी उन्हें सेना रखनी पड़ रही है, शासक वर्ग पर और उनकी सुख-सुविधाओं पर हर देश को प्रतिवर्ष हजारों करोड़ रूपया व्यय करना पड़ रहा है-यह सब नहीं करना पड़ेगा। तब यह सारा धन विश्व से अज्ञान, अशिक्षा भय और भूख जैसे राक्षसों को मिटाने पर व्यय होगा। जिससे संसार वास्तविक विश्वशांति का अनुभव करेगा। धर्माधीशों ने विश्व के लोगों के अज्ञान और अशिक्षा का लाभ उठाकर जहां निहित स्वार्थ पूर्ण किये हैं-न्यूनाधिक यही स्थिति विश्व के सत्ताधीशों की है, उन्होंने भी लोगों के अज्ञान और अशिक्षा का लाभ उठाकर निजी सुख सुविधाओं के लिए अपने देश के कोष का दुरूपयोग किया।
विश्वशान्ति के लिए माना कि उपरोक्त स्थिति लाना कठिन है, परंतु असंभव नहीं। इसे संभव बनाया जा सकता है-विश्वगुरू भारत के आत्मानुशासन के संस्कार को विश्व संस्कार बना देने से। जिस दिन यह वैश्विक संस्कार हमारा मार्गदर्शन करने लगेगा उस दिन संसार स्वर्ग बन जाएगा। विश्व शान्ति के लिए भटक रहे संसार को भारत से यह संस्कार सीखना ही होगा और उसे विश्वगुरू मानना ही होगा।
महाभारत ‘उद्योगपर्व’ में आत्मानुशासन की ओर संकेत करते हुए कहा गया है :-
यत् पृथिव्यां ब्रीहिमवौ हिरण्यं पशव: स्त्रिय:
नालमेकेन तत् सर्वमिति मत्वा शमं व्रजेत।।
(महा. उद्योग 39/69)
महाभारतकार कहता है कि -”पृथिवी पर चावल जौ से लेकर सोना, पशु और स्त्रियां तक जितना भी धन-जन अन्न है, वह सब एक मनुष्य की इच्छा (तृष्णा) की पूत्र्ति भी नहीं कर सकता, इस तथ्य को हृदयंगम करके संयम और शांति से अर्थात आत्मानुशासन से ही कार्य लेना चाहिए।”
कहने का अभिप्राय है कि महाभारतकार भी संसार में शांति की स्थापना के लिए आत्मानुशासन को अनिवार्य मान रहा है। उसका कहना है कि संसार के ऐश्वर्यों के लिए या इसकी नाशवान संपदा के लिए लडऩा झगडऩा व्यर्थ है। अत: संसार के लोगो! यदि तुम वास्तव में शांति चाहते हो तो नि:स्वार्थभाव को अपनाओ और इसी भाव से संसार के ऐश्वर्यों को भोगो। यदि तुमने इस सारे संसार की सारी संपदा पर अपना अधिकार करने की अंतहीन प्रतियोगिता को आरंभ कर दिया तो यह संसार नरक बन जाएगा।
संसार का इतिहास इस बात की साक्षी दे रहा है कि संसार के संसाधनों पर एकाधिकार करने की अंतहीन प्रतियोगिता ने ही संसार को विनाशकारी युद्घों से अपरिमित क्षति पहुंचाई है। साथ ही आज भी यदि यह संसार अशांत है तो इसके पीछे भी संसार के आर्थिक संसाधनों पर व्यक्ति की या किन्ही देशों की एकाधिकार करने की अंतहीन प्रतियोगिता ही उत्तरदायी है। लोकतंत्र की बात करने वाले विश्व नेता यह नहीं समझ पा रहे हैं कि लोकतंत्र सर्व समाज के लोगों के मौलिक अधिकारों का सम्मान करना सिखाता है। अत: लोकतंत्र संसार के आर्थिक संसाधनों पर प्रत्येक मनुष्य का समान अधिकार मानता है। यदि संसार के राजनीतिज्ञ या अन्य प्रभावी लोग इन संसाधनों पर अपना एकाधिकार स्थापित कर रहे हैं तो मानना पड़ेगा कि वे संसार को नरक बना रहे हैं। उन्हें भारत से सीखना होगा कि विश्वशांति के लिए यह आत्मानुशासन का पाठ कितना महत्वपूर्ण है? कहने का अभिप्राय है कि भारत के लिए वैश्विक नेतृत्व की आज भी पूर्ण संभावनाएं हैं।
हम सबकी एक ही मानव जाति है
यह भी भारत का ही चिंतन है कि हम सबकी एक ही मानव जाति है। इस चराचर जगत को बनाने के लिए विधाता ने एक ही विधान (वेद) रचा, एक ही व्यवस्था दी, तो हमारी एक ही जाति (मानव) भी बनायी। संसार में विखण्डनवाद फैलाने वाली शक्तियां उठीं तो उन्होंने स्वयं को ईश्वर के पुत्र के रूप में या उसके संदेश को फैलाने के लिए सर्वोत्तम जाति के रूप में प्रचारित-प्रसारित किया। आर्यों का या हम भारतीयों के पूर्वजों का संदेश इन लोगों के संदेश से कुछ अलग था, पर उस ‘कुछ अलग’ के सच को समझने की आवश्यकता है। हमारे पूर्वजों ने यह नहीं कहा कि हम ही ईश्वर के पुत्र हैं या हम ही उसके संदेश को सर्वोत्तम ढंग से फैलाने का सामथ्र्य रखते हैं, इसके विपरीत उन्होंने कहा कि हम सब ईश्वर के अमृत पुत्र हैं और हमारा सबका सामूहिक उत्तरदायित्व है कि इस धरती को स्वर्ग बनायें, सबके सब एक दूसरे के साथ ऐसे समन्वय से जुड़े हों कि उनका आत्मीय भाव उन्हें परस्पर प्रेम करने की शिक्षा देता रहे।
भारत के इस चिंतन में विशालता है और सबको उत्तम मानने का प्रशंसनीय भाव है। उसने यह नहीं कहा कि भारत के लोग ही उत्तम हैं और ईश्वर ने उन्हें ही संसार पर शासन करने के लिए तथा संसार के लोगों को अपना ‘गुलाम’ बनाने के लिए धरती पर भेजा है। जैसा कि अंग्रेजों ने या यूरोपियन लोगों ने विशेष रूप से ऐसा कहा कि ईश्वर ने हमें ही सर्वोत्तम जाति बनाकर भेजा है और इसलिए हमें सारे संसार के लोगों पर राज करने का व उन्हें अपना गुलाम बनाने का अधिकार है। क्रमश:

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