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“सन् 1942 में सरकारी प्रतिबन्ध तोड़कर आर्यसमाज की शोभा यात्रा निकालने वाले प्रसिद्ध विद्वान पं. चन्द्रमणि विद्यालंकार”

ओ३म्

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प्रसिद्ध वैदिक विद्वान पं. चन्द्रमणि विद्यालंकार जी आर्यसमाज, देहरादून के गौरव थे। वह मूलतः जालन्धर निवासी थे। गुरुकुल कांगड़ी का स्नातक बनने के बाद से वह देहरादून में निवास करते थे। उनके परिवार के सदस्य वर्तमान में भी देहरादून में ही निवास करते हैं। पण्डित जी के एक पुत्र से हमारा निकट सम्बन्ध रहा है। वह देहरादून के पल्टन बाजार में ‘‘साहित्य सदन” नाम की हिन्दी पुस्तकों की एक दुकान चलाते थे। हम दो दशक पूर्व कार्य दिवसों में प्रतिदिन कार्यालय से अवकाश के बाद सायं आर्य विद्वान प्रा. अनूप सिंह जी के साथ उनकी दुकान पर जाते और वहां लगभग एक घंटे का समय व्यतीत करते थे। एक बार हम उनकी दुकान पर बैठे थे। तभी हमें वहां बाजार से गुजरते आर्यसमाज के प्रसिद्ध विद्वान कलकत्तावासी पं. उमाकान्त उपाध्याय जी मिले थे। वहां पंडित चन्द्रमणि जी के पुत्र एवं प्रा. अनूप सिंह जी आदि का उपाध्याय जी के साथ अनेक विषयों पर वार्तालाप हुआ था।

पं. चन्द्रमणित विद्यालंकार जी वेदों के प्रसिद्ध विद्वान, निरुक्त के भाष्यकार, पाली भाषा के मर्मज्ञ विद्वान तथा गुरुकुल कांगड़ी के प्रारम्भिक स्नातक थे। उन्होंने देहरादून के पल्टन बाजार में एक ट्रंक फैक्टरी व उनकी बिक्री का केन्द्र खोला था। आर्यसमाज देहरादून के पूर्व प्रधान श्री यशपाल आर्य जी ने लिखा है कि कहां वेद का पाण्डित्य और कहां सन्दूकों की फैक्टी की ठक-ठक? मेल बैठा नहीं। अन्ततः उन्होंने ‘‘भास्कर प्रेस” नाम से एक मुद्रणालय चलाना आरम्भ किया। उनके बाद यह छापाखाना उनके पुत्र श्री सुमेध कुमार जी चलाते थे। वह आर्यसमाज धामावाला, देहरादून के सदस्य रहे। पंडित चन्द्रमणि विद्यालंकार जी ने ‘‘दून” नाम से एक समाचार पत्र निकालना भी आरम्भ किया था। लम्बी अवधि तक पत्र प्रकाशित होता रहा और बाद में बन्द हो गया था।

पं. चन्द्रमणि जी ने बीस से अधिक ग्रन्थों की रचना की। उन्होंने बाल्मीकि रामायण के प्रक्षिप्त अंश निकालकर शुद्ध रामायण कई भागों में हिन्दी भाष्य सहित प्रकाशित की थी। आर्यसमाज की ओर से उन्होंने एक शास्त्रार्थ भी सोलन में किया था। वह गूढ़ विषयों पर खोजपूर्ण व्याख्यान दिया करते थे। वह वर्षों तक आर्यसमाज धामावाला, देहरादून के प्रधान व मंत्री रहे।

पंडित चन्द्रमणि विद्यालंकार जी कई बार अंग्रेजों के कोप भाजन बने और इस कारण उन्होंने जेल यात्रायें की। वह हैदराबाद सत्याग्रह में देहरादून से आर्यों का प्रथम जत्था लेकर गये थे। आचार्य जी साहसी, स्पष्ट-वक्ता एवं निडर व्यक्ति थे। वह सत्य से प्यार करते थे। श्री यशपाल आर्य, देहरादून ने यह जानकारी दी है कि सन् 1942 में जब अंग्रेज सरकार ने आर्यसमाज के वार्षिकोत्सव पर निकलने वाली शोभायात्रा को नियंत्रित करना चाहा तो पण्डित चन्द्रमणि विद्यालंकार जी ने घोषणा की थी-‘‘न जलूस का समय बदला जायगा, न जलूस का मार्ग बदला जायेगा। हम कोई प्रतिबन्ध स्वीकार नहीं करते। सरकार गोली चलाना चाहे तो शौक से चलाए। मैं सबसे आगे रहूंगा।“ यह ज्ञातव्य है कि धारा 144 तोड़कर यह जलूस निकाला गया था। यशपाल आर्य जी ने लिखा है कि यह जलूस वास्तव में जलूस था। वह स्वयं इस जलूस में शामिल हुए थे।

इसके साथ ही इस प्रसंग को हम विराम देते हैं। ओ३म् शम्।

-मनमोहन कुमार आर्य

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