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आज का चिंतन

न्याय दर्शन के अनुसार किससे करनी चाहिए वार्ता?

न्यायदर्शन में चार प्रकार के प्रमाण दिए हुए हैं प्रत्यक्ष ,अनुमान उपमान, शब्द प्रमाण।
वेद सृष्टि का शब्द प्रमाण है। विश्व का ज्ञान कराने वाला शब्द रूप ब्रह्म वेद ही है। वेद सृष्टि का संविधान एवं नियमावली है ।वेद ईश्वर की वाणी है। वेद ईश्वर की वाणी होने के कारण‌ भ्रांति विहीन, शुद्ध बुद्ध एवं पवित्र ज्ञान है। वेद का अर्थ ज्ञान है ।विद ज्ञाने धातु से यह शब्द बनता है । अतः वेद अनंत ज्ञान राशि है। यही ज्ञान राशि हमारे मनन चिंतन आदि का विषय होनी चाहिए ।तभी विद विचारणे धातु का वेद शब्द अपना कार्य करने लगता है। वेद का प्रत्यक्ष रूप से दर्शन यही विश्व है। वेद ज्ञान का अथाह सागर है। इससे अपनी शक्ति में परिधि के अनुसार अपने ज्ञान की झोली भर लेनी चाहिए। वेद से ही अनंत काल से वेद रूपी आंतरिक ज्ञान कोष से असंख्य मणिमुक्ता ऋषि गण प्राप्त करते चले आ रहे हैं।
ईश्वर गलती नहीं करता है,क्योंकि ईश्वर सर्वज्ञ है ।मनुष्य अल्पज्ञ है। अल्पज्ञता के कारण गलती करता है ।विश्व में यदि वेदों के अनुकूल विचार ,आचार,व्यवहार मनुष्य करने लगे तो सभी प्रकार के ईर्ष्या भाव ,विवाद, ऊंचा नीचा दिखाना, छल, कपट, धोखा, अपराध ,जल्प,वितन्डा समाप्त हो जाएंगे। यह सभी दोष अल्पज्ञता के कारण उत्पन्न होते हैं। जब सत्य ज्ञान नहीं होता है तब यह स्थिति संसार में उत्पन्न होती है। परंतु वेद की विद्या के विरुद्ध आचार्विचार करने से ही संसार में भिन्न-भिन्न मत विचारधाराएं उत्पन्न हुई है।
न्याय दर्शन में जिस तरीके से बताया गया है कि हमें परस्पर वाद अर्थात वार्ता करनी चाहिए लेकिन वार्ता करते समय वेद की शिक्षा के अनुकूल ही समकक्ष बौद्धिक स्तर के लोगों में वार्ता हो। न्याय दर्शन के अनुसार ही हेतु आभास उचित होना चाहिए। जैसे एक पक्ष कहता है कि ईश्वर न्यायकारी है, ईश्वर सर्वज्ञ है, ईश्वर निराकार है, ईश्वर शरीर धारण नहीं करता है, ईश्वर सर्वशक्तिमान है ,ईश्वर सर्वव्यापक है ,ब्रह्मा, विष्णु ,महेश ये सभी ईश्वर के गौणिक नाम हैं। मंत्रों में अगाध ज्ञान राशि है। इस जीवन में मानव को बुद्धि द्वारा वेद की साधना करनी चाहिए। जीवात्मा को ज्ञानवान एवं आनंदमय स्थिति प्राप्त करने के लिए प्रयत्न करना चाहिए। ज्ञान का असीमित क्षेत्र केवल परमात्मा है क्योंकि ईश्वर निरतिशय है। ईश्वर अधिष्ठाता है। ब्रह्मांड ज्ञान का सीमित क्षेत्र है। चार वेद ,छह शास्त्र, 11 उपनिषद ही ज्ञान के स्रोत है।
लेकिन इसके विपरीत ब्रह्मा, विष्णु और महेश को अलग-अलग अवतार बताने वाले और ईश्वर को साकार बताने वाले
दूसरे पक्ष के लोग भी हैं।
ऐसे लोगों को सत्य ज्ञान कराने में भी संसार में असुविधा होती है।
ईश्वर ने सृष्टि के प्रारंभ में वेद की विद्या की स्थापना के लिए ब्रह्मा के द्वारा चार ऋषि अग्नि, वायु, आदित्य, अंगीरा को वेद का ज्ञान दिया। इसी वेद ज्ञान को समय-समय पर अनेक ऋषियों ने उदाहरण के तौर पर कपिल, कणाद ,गौतम ,श्रंग, पिप्पलाद, मनु ,जैमिनी ,वेदव्यास, पतंजलि, वशिष्ठ, विश्वामित्र, भारद्वाज, अगस्त्य,दयानंद आदि ने प्रचार प्रसार किया। ऋषियों में किसी विषय को लेकर गंभीर चर्चाएं, वार्ताऐं हमारे यहां प्राचीन काल से होती रही हैं। लेकिन वह चर्चा सत्य ज्ञान की प्राप्ति के लिए होती थी वहां जल्प और वितन्डा नहीं होता था।लेकिन जब ऋषियों की बात न सुनकर कुरान और पुराण की बात की जाती है तो वेद की विद्या लुप्त होती है। जल्प और वितंडा आ जाते हैं। विवाद और झगड़े होते हैं।जिसके कारण समाज का पतन होता है।

वाद अर्थात वार्ता करते समय
उन्हीं लोगों से वार्ता करनी चाहिए जिनकी बुद्धि समकक्ष हो और जो इमानदारी से सत्य विद्या का ग्रहण कर सकें। जो वैदिक विद्या को अपना सकें और वैदिक विद्या का स्थापन करने में सहयोगी हो सके। अन्यथा निरर्थक विवाद से बचे रहें।
इसलिए महर्षि दयानंद ने कहा कि वेद सब सत्य विद्याओं की पुस्तक है ।वेद का पढ़ना- पढ़ाना सभी आर्यों का परम धर्म है।
इसी कारण महर्षि दयानंद ने उद्घोष किया कि” आओ वेदों की ओर लौटो”।
देवेंद्र सिंह आर्य एडवोकेट
चेयरमैन उगता भारत समाचार पत्र

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