भारत की विदेश : नेहरू से मोदी तक

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भारत ने अपनी स्वाधीनता के आंदोलन को उपनिवेशवाद और साम्राज्यवाद के विरुद्ध लड़ा था। भारत जैसे विशाल देश में चल रहे इस आंदोलन का दुनिया के अन्य देशों पर व्यापक प्रभाव पड़ा और इसी का परिणाम था कि द्वितीय विश्वयुद्ध की समाप्ति के पश्चात ब्रिटेन सहित उन सभी देशों को अपने – अपने सभी उपनिवेशों को समेटने के लिए बाध्य होना पड़ा जो किसी न किसी देश में जाकर उनका शोषण कर रहे थे। भारत के क्रांतिकारी आंदोलन ने तो अलसाई हुई दुनिया को को पूर्णतया झकझोर दिया था। जिसके परिणाम स्वरूप कई देशों को उपनिवेशवादी व्यवस्था के विरुद्ध लड़ने की प्रेरणा मिली।श्यामजी कृष्ण वर्मा ,लाला हरदयाल, भाई परमानंद जी, रासबिहारी बोस, नेताजी सुभाष चंद्र बोस जैसे कितने ही क्रांतिकारी थे, जिन्होंने भारत के क्रांतिकारी संदेश को दुनिया के कोने – कोने में फैलाया।
भारत के विशाल आकार, अवस्थिति और शक्ति-संभावना को भांपकर , नेहरू ने विश्व मामलों में, विशेष रूप से एशियाई मामलों में भारत के लिए एक प्रमुख भूमिका निभाने का निर्णय लिया। उन्होंने कई क्षेत्रों में देश को बड़ा प्रभावशाली नेतृत्व दिया। उनकी इच्छा थी कि सभी एशियाई देश विभिन्न क्षेत्रों में परस्पर ऐसे सहयोग का आदर्श स्थापित करें, जिससे इन सबकी एकता से सारा विश्व प्रभावित हो। अपने इसी लक्ष्य के प्रति समर्पित होकर उन्होंने भारतीय उपमहाद्वीप की अवधारणा को अधिक से अधिक प्रसारित किया।
स्वाधीनता से पूर्व पंडित जवाहरलाल नेहरु जब अंतरिम सरकार का नेतृत्व कर रहे थे तो मार्च 1947 में अर्थात आजादी से 5 महीने पहले उनके नेतृत्व में भारत ने नई दिल्ली में एशियाई सम्पर्क सम्मेलन की बैठक की। नेहरू जी ने 1949 में एक अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन बुलाकर डच औपनिवेशिक शासन से स्वतंत्रता के लिए इंडोनेशियाई संघर्ष का समर्थन किया। उन्होंने नस्लवाद और रंगवाद के विरुद्ध भी आवाज उठाई और भारत की सनातन संस्कृति की इस विचारधारा को विश्व मंच पर स्थापित करने का अथक प्रयास किया कि संसार में सभी मनुष्यों को जीने का अधिकार है ,इसलिए उनके सभी के समान अधिकार होने ही चाहिए। उन्होंने अपने मत अथवा विचार को विश्व मंच पर बहुत ही सफलता के साथ रखने का कई बार शानदार प्रदर्शन किया। यद्यपि कई बार ऐसा भी हुआ कि आदर्शवाद की ऊंची उड़ान के भंवर जाल में पड़ कर वे राष्ट्रहितों को उपेक्षित अथवा गौण कर गए, चीन जैसे देशों के संबंध में उनकी विदेश नीति की इसी प्रकार समीक्षा करने की आवश्यकता है।
नेहरू जी ने अपने उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए 1961 में स्थापित, बेलग्रेड, यूगोस्लाविया (अब सर्बिया) में गुटनिरपेक्ष आंदोलन की स्थापना की। जिसका मुख्यालय उन्होंने मध्य जकार्ता (इंडोनेशिया) में रखा था। नेहरू जी द्वारा स्थापित गुटनिरपेक्ष आंदोलन में बड़ी संख्या में विकासशील देशों ने अपनी सहभागिता दर्ज कराई थी। नेहरू जी ने इस बात को बड़ी गहराई से अनुभव किया था कि विश्व युद्ध के समय दुनिया दो खेमों में बंटकर भारी विनाश का शिकार बनी थी। अब बड़े सांडों की टक्कर में फिर ऐसे विनाश का तांडव विश्व समाज ना देखे, इसके लिए उन्होंने उन परिस्थितियों में संसार के अधिकांश देशों को अपने साथ लेकर गुटनिरपेक्ष आंदोलन आरंभ किया।
नेहरू जी द्वारा स्थापित किए गए गुटनिरपेक्ष आंदोलन में अप्रैल 2018 तक अफ्रीका के 53 देश, एशिया के 39, लैटिन अमेरिका और कैरेबियाई के 26 और यूरोप (बेलारूस, अजर बैजान) के 2 सदस्य देश सम्मिलित हैं। इसमें 17 देश और 10 अंतरराष्ट्रीय संगठन हैं जिसे गुटनिरपेक्ष आंदोलन में पर्यवेक्षक का दर्जा प्राप्त है।
जिस समय नेहरु जी देश को नेतृत्व दे रहे थे, उस समय देश की आर्थिक स्थिति बड़ी ही दयनीय थी। विकास के नाम पर देश के पास कुछ भी नहीं था, क्योंकि अंग्रेज सारे देश को खोखला कर गए थे। उस समय हमारे देश की आवाज को सुनने के लिए लोग अधिक उत्सुक नहीं रहते थे। इसके उपरांत भी नेहरू जी ने बड़ी सावधानी से देश की विदेश नीति का निर्धारण किया था। यही कारण है कि उनके द्वारा निर्धारित की गई विदेश नीति पर आगे की सरकारें भी काम करती रही हैं।
अब देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को जी-20 समूह की अध्यक्षता का दायित्व मिला है। कई क्षेत्रों में नेहरू जी की विदेश नीति में उल्लेखनीय सुधार या परिवर्तन करते हुए पी0एम0 मोदी ने देश के सम्मान को बढ़ाने का ऐतिहासिक काम किया है।
नेहरू जी अपने शासनकाल में जहां विश्व मंचों पर एक विशेष सम्मान प्राप्त करने में सफल हुए थे, वहीं मोदी जी इस सम्मान से आगे बढ़कर संसार को यह आभास कराने में भी सफल हुए हैं कि उनके रहते वह सुरक्षित है। विश्व के तनाव को बहुत सीमा तक नियंत्रण में लेने में मोदी जी की विदेश नीति सफल रही है। नेहरू जी या उनके बाद इंदिरा जी आदि के शासनकाल में विश्व के 5 बड़े देश विध्वंसकारी गतिविधियों में लगे रहकर भारत की ओर तनिक भी ध्यान नहीं देते थे पर अब वह प्रत्येक निर्णय पर भारत की राय लेना आवश्यक समझने लगे हैं। विनाशकारी नीतियों को बनाने अर्थात एक दूसरे के देश में आतंकी घटनाओं के माध्यम से आग लगाने की घटनाओं में विश्व स्तर पर सुधार आया है । उसके पीछे कारण यही है कि आज के सशक्त और नैतिक रूप से मजबूत भारत की उपस्थिति से संसार के आतंकी देश ऐसा कुछ करने से पहले कई बार सोचते हैं। इसका कारण केवल एक है कि व्यक्ति अथवा राष्ट्र का चरित्र बोलता है और आज भारत का चरित्र बोल रहा है । जो बड़ी ईमानदारी से विश्वशांति के प्रति प्रतिबद्ध है। उसकी यह प्रतिबद्धता संसार के आतंकी राजनीतिज्ञों को आतंक करने से नैतिक रूप से रोकती है।
  देश के लिए यह बहुत ही गर्व और गौरव का विषय है कि इस समय यूरोपीय परिषद के अध्यक्ष चार्ल्स मिशेल के साथ साथ अमेरिका के राष्ट्रपति बाइडेन,फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुअल मैक्रों भी मोदी जी को जी-20 की अध्यक्षता प्राप्त होने से उत्साहित हैं। उन्हें यह विश्वास है कि मोदी जी के नेतृत्व में विश्व अपने सांझा उद्देश्यों को प्राप्त करने में सफल होगा। इस समय चीन और पाकिस्तान के लिए जलने के कई कारण हैं वे नहीं चाहते कि मोदी जी को विश्व स्तर पर इतना सम्मान मिले और उनके नेतृत्व में भारत एक शक्तिशाली राष्ट्र के रूप में उभरे। पर नियति को कोई रोक नहीं सकता। मोदी जी जैसे जैसे अपने लक्ष्यों को प्राप्त करते जा रहे हैं और यश एवं प्रसिद्धि को प्राप्त होते जा रहे हैं, त्यों – त्यों देश के विरोधी राजनीतिक दलों को भी कष्ट होता जा रहा है। 2024 के आम चुनाव निकट हैं। उससे पहले देश के राजनीतिक दल मोदी विरोध का वातावरण बनाने का हर संभव प्रयास करेंगे । अपने इस प्रकार के प्रयास में वह कितने सफल होंगे ? – यह तो समय ही बताएगा, पर इस समय के राजनीतिक विश्लेषकों की मान्यता तो यही है कि मोदी 2024 में भी सत्ता में वापसी करेंगे।
बीबीसी डॉक्युमेंट्री के विवाद को पैदा करने के साथ-साथ कांग्रेस की ओर से मचाया जा रहा अडानी अदानी का शोर मोदी के बढ़ते रथ को रोकने का ही एक ओच्छा प्रयास है। कांग्रेस के नेता राहुल गांधी को चाहिए कि वह ओच्छी राजनीति से ऊपर उठकर अपने संगठन को मजबूत करने की दिशा में काम करें। केवल सत्तापक्ष को कोसते रहने से सत्ता प्राप्त नहीं होती। हमें यह समझ लेना चाहिए कि किसी भी लोकतांत्रिक देश में एक सशक्त विपक्ष की महती आवश्यकता होती है। विपक्ष शोर मचाने को ही अपनी महत्वपूर्ण उपस्थिति मान रहा है ,जबकि देश के लिए आवश्यक है कि उसका संख्या बल भी पर्याप्त हो। इसके लिए राहुल गांधी सहित सारे विपक्ष को जन विश्वास जीतने की आवश्यकता है।

डॉ राकेश कुमार आर्य
(लेखक “भारत को समझो” अभियान के राष्ट्रीय प्रणेता एवं जाने-माने इतिहासकार हैं। )

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