हर युग में और हर स्थिति-परिस्थिति में भारत के महान लोगों ने मानवतावाद को पुष्ट करने वाले चिंतन को प्रस्तुत किया और उसी के आधार पर लोगों को जीवन जीने के लिए प्रेरित किया। जब तक भारत की ऐसी शिक्षा प्रणाली विश्व का मार्गदर्शन करती रही तब तक संसार में किसी भी प्रकार का वितण्डावाद नहीं फैला। भारत ने अपने वेदमत के एक मत को एकमत होकर अपना आदर्श माना। उसे वैदिक धर्म के नाम से पुकारा और उसी वैदिक धर्म के अनुसार अपनी जीवनशैली को विकसित किया।


पंथ भिन्नता और भारतीय शिक्षा नीति
पूजा पद्घति की भिन्नता मानकर भी या कभी-कभी अलग-अलग धार्मिक परम्पराओं को सहन करके भी भारत के लोगों ने अपनी राष्ट्रीय एकता को बनाये रखने में सफलता प्राप्त की। भारत की शिक्षानीति और उसके नीतिकारों की दृष्टि में यह तथ्य सदा रहा है कि पंथ भिन्नता अर्थात मजहबपरस्ती व्यक्ति को अलग सोचने और अलग बोलने के लिए प्रेरित करती है। इस अलगाव से बचने के लिए भारत की एक ही संस्कृति अर्थात वैदिक संस्कृति एक धर्म अर्थात वैदिक धर्म को प्राथमिकता और वरीयता देकर मान्यता दी गयी। कहने का अभिप्राय है कि किसी भी मत या पंथ को अपनी अलग पहचान बनाने की छूट नहीं दी गयी। हमने वर्तमान भारत में सबकी पहचान अलग-अलग बनाने का अतार्किक प्रयास करके भारत की संस्कृति को मिली-जुली संस्कृति या सांझा-संस्कृति कहना क्या आरंभ किया देश में अलगाववादी शक्तियां खड़ी होने लगीं। ऐसी परिस्थितियों में हमारे पास एक ही विकल्प है कि हमें अपने पूर्वजों के शिक्षा-विज्ञान का अनुकरण करना ही होगा कि मत स्वतंत्र होकर भी मर्यादित रहेंगे, और एक झण्डा एक एजेंडा और एकमत के अधीन रहकर अनिवार्यत: कार्य करेंगे। यह वैसे ही होगा जैसे देश की केन्द्रीय सत्ता के अधीन देश के सभी राज्य अपनी स्वतंत्रता बनाये रखकर भी उसके आधीन रहने के लिए मर्यादित बाध्यता से बंधे हैं। हमने केन्द्र और राज्यों के संबंधों के निर्धारण में तो इस तथ्य को ध्यान में रखा है-परंतु मैकाले ही विघटनकारी शिक्षा नीति ने देश के एक मत के नीचे सभी मतों की मर्यादित स्वतंत्रता के संदर्भ में इस तथ्य की उपेक्षा की है। यह तथ्य हमें ध्यान रखना ही होगा कि विदेशी शिक्षा नीति कभी भी देश का भला नहीं कर सकती। इसका एक कारण यह भी है कि विदेशी शिक्षानीति अपने देश की परिस्थितियों, संदर्भों, देश के महानायकों के चिंतन, देश की संस्कृति और अपने राष्ट्रीय हितों के दृष्टिगत हमारे बारे में सोचती है। यह आवश्यक नहीं थी उसका हमारे बारे में ऐसा चिंतन पूर्णत: न्यायपरक, वस्तुपरक और स्थितिपरक हो। उसमें अन्याय, उपेक्षा और तथ्यों के विपरीत आचरण करने की पूर्ण संभावना रहती है।
हमें अपने महान शिक्षाविद ऋषि पूर्वजों की शिक्षानीति पर गंभीर चिंतन करना चाहिए और उसकी वैज्ञानिक उपयोगिता को स्वीकार करते हुए राष्ट्रहित में उसे अपनाने में देरी नहीं करनी चाहिए। ‘विश्वगुरू’ के पद पर अपनी दावेदारी स्थापित करने की आकांक्षा रखने वाले भारत को तो अपना आपा अवश्य ही खोजना होगा। तभी इसका कल्याण संभव है।
पाठ का मनन करो रटो नहीं
आजकल की शिक्षानीति में विद्यार्थियों को पाठ रटाया जाता है। जबकि भारत की प्राचीन शिक्षण व्यवस्था में पाठ को श्रवण उपरांत विद्यार्थी उस पर मनन करते थे और फिर उसे व्यवहार में अपनाते थे। व्यवहार में अपनाने की प्रक्रिया का नाम निदिध्यासन कहा जाता है। ‘बृहदारण्यकोपनिषद’ का ऋषि कहता है-
श्रवणं तु गुरो: पूर्व मननं तदनन्तरम्।
निदिध्यासनमित्येतत्पूर्णबोधस्य कारणाम्।।
इस प्रकार श्रवण, मनन और निदिध्यासन विद्या ग्रहण की स्वभाविक प्रक्रिया है। इसे अपनाकर विद्यार्थी को महान बनने की साधना स्वयं ही सफल होने लगती है। यदि बच्चे को तो पढ़ाया गया परंतु उसने उस पर मनन नहीं किया-केवल उसे रट लिया तो ऐसा पाठ कोई उत्तम लाभ नहीं देगा। ‘सत्य बोलना चाहिए’ -यह एक पाठ हो सकता है, बच्चा इसे रट भी सकता है, परंतु इसे शिक्षा तभी कहेंगे जब बच्चा सत्य बोलना सीख भी जाए, अर्थात उसे अपने जीवन में उतार ले। जो शिक्षा पाठ को केवल रटाती है वह शिक्षा रोजगार दिला सकती है, या व्यक्ति को पढ़ा-लिखा कहलवा सकती है-पर उसे सुसंस्कारित नहीं कहलवा सकती।
श्रवण, मनन और निदिध्यासन से पूर्व शिष्य को अपने हृदय में श्रद्घा उत्पन्न करनी होती है। बिना श्रद्घा के ना तो भक्ति सफल होती है और ना ही साधना सफल होती है। ज्ञान श्रद्घा से ही पाया जाता है। शिष्य को अपने गुरू से कुतर्क नहीं करने चाहिएं और ना ही अनावश्यक वाद -विवाद करना चाहिए। उसे अपनी शंका के समाधान के लिए उचित तर्क-वितर्क तक सीमित रहना चाहिए और श्रद्घाभाव बनाये रखकर अपने गुरू का हृदय जीतने का हरसंभव प्रयास करना चाहिए। जैसे एक पक्षी गाय, बैल के कान में खुजलाते-खुजलाते उसे बैठा लेता है वैसे ही शिष्य को उसी भाव से गुरू के हृदय में अपना स्थान बना लेना चाहिए। श्रीकृष्ण जी कहते हैं:-
”भली प्रकार दण्डवत प्रणाम तथा सेवा और निष्कपट भाव से किये हुए प्रश्न द्वारा उस ज्ञान को प्राप्त कर वे मर्म को जानने वाले गुरूजन तुझे उस ज्ञान का उपदेश करेंगे।”
महर्षि मनु का कहना है-”ज्ञान की प्राप्ति हमें चार रूपों में होती है। किसी तत्व के ज्ञान का पहला चतुर्थ भाग छात्र अपने गुरू, आचार्य या शिक्षक से प्राप्त करता है, दूसरा चतुर्थ भाग वह स्वयं अपनी बुद्घि से प्राप्त करता है, तीसरा भाग अपने मित्रों से तथा सहपाठियों से और चौथा भाग अपने अनुभव से प्राप्त करता है।”
इस प्रकार शिक्षक का कार्य ज्ञान-ज्योति जलाना है। ज्ञान-ज्योति के जागरण होते ही विद्यार्थी की बुद्घि में प्रकाश हो जाता है। जिससे उसे कुछ-कुछ दिखने लगता है। तब विद्यार्थी अपने मित्रों से व सहपाठियों से विषय की गहराई में उतरने वाली चर्चाएं करने लगता है। इसे आजकल ‘ग्रुप डिस्कसन’ कहा जाता है। इन चर्चाओं से एक सर्व सम्मति का निर्माण होता है और विद्यार्थी के अपने अनुभव में वृद्घि होती है। कुछ कालोपरांत यह चर्चा भी छूट जाती है और तब अनुभवजन्य ज्ञान की उत्पत्ति होने लगती है। यह ज्ञान व्यक्ति के अपने काम तो आता ही है साथ ही समाज के अन्य लोगों को भी वह इसे बताता है तो उनके काम भी आता है। आजकल विद्यालयों में सेमिनारों का आयोजन होता है। यह भी भारत की प्राचीन शिक्षा पद्घति का ही परिवर्तित स्वरूप है।
भारत की प्राचीन शिक्षा पद्घति में जिसे ‘शास्त्रार्थ’ कहा जाता था वही आज की भाषा में सेमिनार कही जाती है। परंतु सेमिनारों से शास्त्रार्थ परम्परा में एक विचार पर एकमत होने के लिए ऋषि लोग सारे तर्क-वितर्क देते थे और अंत में किसी बुद्घिसंगत न्यायसंगत या तर्कसंगत निर्णय पर पहुंच जाते थे। जिसे सबके लिए स्वीकृत सिद्घांत मान लिया जाता था। उसके पश्चात उस पर कोई चर्चा या शास्त्रार्थ नहीं होता था, जबकि आजकल ऐसा नहीं है। आजकल चर्चा हो जाती है पर तर्कशांत नही होता। हमारे आचार्य लोग अपने शिक्षार्थी की परीक्षा के समय बस इसी बात का परीक्षण किया करते थे कि तुमने जो कुछ इसे आज तक पढ़ाया है-उसे इसने अंगीकार भी किया है या नहीं अर्थात उस पर निदिध्यासन भी किया या नहीं। यदि कोई विद्यार्थी निदिध्यासन से शून्य मिलता था तो आचार्य उसकी उच्च शिक्षा को भी यह कहकर नकार देता था कि यह तो तेरा शब्द ज्ञान मात्र है। इससे आगे तूने कुछ भी प्राप्त नहीं किया। इसके विपरीत आज की शिक्षा प्रणाली में विद्यार्थी स्वयं भी अपने प्राप्तांक देखकर अपनी प्रतिभा को नापता है और इसलिए अधिक से अधिक अंक प्राप्त करने का प्रयास करता है। इसके लिए चाहे उसे ‘पेपर लीक’ कराना पड़े या नकल करनी पड़े या अपने अध्यापक को खुश करना पड़े-वह कुछ भी कर सकता है। दु:ख की बात है कि गुरूजन वर्ग भी अधिक अंक वाले छात्र को ही प्रतिभावान सिद्घ करते हैं।
क्रमश:

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