Categories
आज का चिंतन

वैदिक साहित्य में सामाजिक समरसता

भारतीय साहित्य का जहाँ से उद्गम हुआ, वह स्रोत निर्विवाद रूप से वेद है। वेद आर्ष काव्य की श्रेणी में आते हैं। हमारे प्राचीन ऋषि मनुष्य थे, समाज के साथ थे। वे आपसी प्रेम और सद्भाव को सबसे अधिक मूल्यवान समझते थे। इसीलिए मनुष्य की जिजीविषा, उसके सामाजिक सरोकार और समाजिक जीवन की योजनाओं के सुंदर चित्र वेदों में से बार-बार झाँकते हुए दिखाई पड़ते हैं। सर्वप्रथम वैदिक ऋषियों ने ही उस सामाजिक समरसता की परिकल्पना की, जो परवर्तीकाल में हमें भारतीय साहित्य की आत्मा के रूप में पहचान में आती है। ऋग्वेद के सबसे अंत में जो समापन-गीत है, उस पर हमारा ध्यान जाता है। यह सामाजिक समरसता का पहला गीत है, जो सदियों से समवेत स्वर में गाया जाता है। गीत इस प्रकार है-

सं गच्छध्वं सं वदध्वं सं वो मनांसि जानताम्।
देवा भागं यथा पूर्वे संजानाना उपासते।।
समानो मन्त्र: समिति: समानी
समानं मनः सह चित्तमेषाम्।
समानं मन्त्रमभि मन्त्रये वः
समानेन वो हविषा जुहोमि।।
समानी व आकूति: समाना हृदयानि वः।
समानमस्तु वो मनो यथा वः सुसहासति।।

ऋषि चाहता है कि हम साथ-साथ आगे बढ़ें,आपस में संवाद बनाये रखें, मन में अच्छे विचारों को आने दें।आपसी समझ के साथ अपने-अपने कर्तव्य का पालन करते रहें। वह यहाँ पर यह भी चाहता है कि सबके लिये एक नियम हो, सबके लिये एक ही नीति हो। सबके मन, सबके चित्त एक हों, और हम संगठित हो कर रहें। सबसे अंत में ऋषि एक ही बात बहुत जोर देकर कहता है कि हम सबका संकल्प एक हो, हम सबके हृदय समान हों, हम सबका मन एक हो। आपस में कोई विरोध कभी न उपजने पाये।

मनुष्य आदिकाल से ही सामाजिक समरसता की भावनाओं को सींचते हुए यहाँ तक आया है। वह अंधकार और मृत्यु से घिरा होने के बाद भी सदैव मनुष्यता में जीने के संकल्प से भरा हुआ दिखाई देता है। ऋग्वेद में ऐसे सूक्तों की संख्या बहुत बड़ी है, जो हम सब में यह विश्वास जगाते हैं कि मनुष्य अपने समाज के साथ ही ऊपर उठना चाहता है। वह मनुष्यता के पक्ष में जब भी आवाज उठाता है, तब वह सामाजिक समरसता की ही बात कर रहा होता है। एक जगह ऋषि के उद्गार हैं-“मनुष्वत्वा नि धीमहि मनुष्वत् समिधीमहि।अग्ने मनुष्वदङ्गिरो देवान् देवयते यज।।(ऋग्वेद 5:21:1)” अर्थात् हम मनुष्य की तरह होना चाहते हैं, मनुष्य की तरह जीना चाहते हैं, मनुष्यता के विचार में बहते हुए ही हम जीवन का लक्ष्य पा लेना चाहते हैं। वैदिक ऋषि बार-बार मनुष्यता से ही प्रीति रखने की बात कहते हुए, मनुष्यता के लिये जीवित रहने का आह्वान करता है। वह चाहता है कि मनुष्य मनुष्यता से ही आगे बढ़े, मनुष्यता में ही रस ग्रहण करे।

वैदिक साहित्य के मूल में यह विचार काम करता है कि मनुष्यों में न तो कोई बड़ा है, न कोई छोटा। सब आपस में भाई-भाई हैं, और अपने कल्याण के लिये सब मिलकर प्रयत्न करते हैं। इस सम्बन्ध में ऋग्वेद में ऋषि का स्पष्ट कथन है-‘अज्येष्ठासो अकनिष्ठास एते सं भ्रातरा वावृधु: सौभगाय।'(ऋग्वेद:5:6:5) अथर्ववेद के पृथ्वीसूक्त का गायक ऋषि जब घोषणा करता है कि ‘माता भूमि: पुत्रोऽहं पृथिव्या:’, तब वहाँ सब मनुष्य समभाव से धरती के पुत्र है। इसी संकल्पना ने वैदिक समाजवाद की नींव रखी। यही भाव तब भी मुखर हुआ, जब यजुर्वेद के सुप्रसिद्ध राष्ट्रगान ‘आ ब्रह्मन् ब्राह्मणो ब्रह्मवर्चसी जायतामाराष्ट्रे राजन्यः शूर इषव्योऽति व्याधी महारथी जायताम्।……..’ में सामाजिक समरसता के लिये प्रार्थना की।

वैदिक ऋषियों का जीवन उच्चतर लक्ष्यों की ओर उठा हुआ है, लेकिन वह सामंजस्य और साहचर्य की नींव को बहुत मजबूती से पकड़कर रखना जानता है। वे समाज के दायित्वों से विमुख होकर जंगल की विरक्ति के पीछे नहीं भागते। वे जीवन से प्रेम करते हैं, और यह जानते हैं कि जीवन का सुखभाग समाज में घुल-मिल कर रहने में है। वैदिक वाङ्मय में जातिवाद के लिये कोई जगह नहीं। वर्णव्यवस्था का कोई आश्रम नहीं है वहाँ। वहाँ महत्व है मनुष्य के संघर्षों से उपजे उस विचार का, जो सामाजिक अभ्युदय का पथ प्रशस्त करता है। इसीलिए वेदों में जो महत्व वसिष्ठ, विश्वामित्र, वामदेव और अत्रि का है, वही महत्व जनकवि कहलाने वाले उस कवष ऐलूष का भी है, जिसने ऋग्वेद को वह अक्षसूक्त दिया, जो एक जुआरी का एकालाप है। करुणा से भरे हुए इस सूक्त की अंतिम ऋचा जुआरी को जुआ खेलने से छुड़ाकर समाज से जोड़ती है, कृषि से जोड़ती है, पशुपालन से जोड़ती है, समाज के अर्थतंत्र से जोड़ती है, और सुखी परिवार की सम्भावना से जोड़ती है। कितनी समृद्ध है यह ऋचा, देखिए-

अक्षैर्मा दीव्यः कृषिमित्कृषस्व।
वित्ते रमस्व बहुमन्यमानः।
तत्र गावः कितव तत्र जाया
तन्मे विचष्टे सवितायमर्यः।।

वैदिक साहित्य को देखने की दृष्टि बदलना होगी। वह भारतीय समाज की आँखों से देखे गये भारतीय समाज का उज्ज्वल चित्र सामने लेकर आता है। वहाँ समाज का विद्रूप भी है, लेकिन वहाँ मनुष्य के वे प्रयास भी हैं, जो सामाजिक शान्ति से चलकर विश्व शान्ति की ओर जाते परिलक्षित होते हैं। परस्पर प्रेम और सौहार्द, परस्पर रक्षा का सद्भाव, परस्पर सहयोग और साहचर्य से जीवन का भोग, एक-दूसरे को अपनी शक्ति से सींच कर मजबूत सामाजिक संगठन खड़ा करने के ही विचार से वैदिक साहित्य का वह नवनीत निकल कर आया, जिसकी ध्वनि वेदोत्तरकाल में और उसके बाद भी गूंजती रही है। वह नवनीत है-‘सह नाववतु सह नौ भुनक्तु सह वीर्यङ्करवावहै। तेजस्विनावधीतमस्तु मा विद्विषावहै।।’ इस मंत्र में सम्पूर्ण सामाजिक समरसता का गहरा संदेश छिपा हुआ है। इसे अनदेखा कर भारतीय समाज आगे नहीं बढ़ सकता।

ऋग्वेद में ही वह सूक्त भी है, जिसमें ‘केवलाघो भवति केवलादी’ जैसी पंक्ति भी आती है। जो अकेला खाता है, वह केवल पाप खाता है। इतना उत्तेजक वाक्य देने वाला दान सूक्त ऋग्वेद के महासागर में अलग से पहचान में आता है। इस सूक्त में भिक्षु ऋषि ने उन धनी मित्रों की जम कर भर्त्सना की, जो कभी अपनी सुख सुविधाओं से बाहर निकलने का कष्ट भी नहीं उठाते। ऋषि प्रशंसा करता है उनकी, जो अपना यत्किञ्चित् धन भी लुटा देते हैं उन पर, जो भूखे हैं, याचक हैं, असहाय हैं। भारतीय साहित्य में, सामाजिक समरसता का इससे बड़ा उदाहरण कहाँ मिलेगा? इस सूक्त की पहली ऋचा देखिए-

न वा देवा: क्षुधमिद्वधं ददुरु-
ताशितमुप गच्छन्ति मृत्यव:।
उतो रयि: पृणतो नोप दस्यत्यु-
तापृणन्मर्डितारं न विन्दते।।
(ऋग्वेद.10:117:1)

ऋषि कहता है कि ‘भूखे ही नहीं मरते संसार में। मरते तो वे भी हैं, मित्र! जो पेट भर जीमते हैं अकेले। बाँट कर खाते-पीते , तो ठीक था। अकेले पेट भरते रहे अपना तो हुआ क्या? मर तो वे भी रहे हैं। द्वार पर खड़ा हुआ भूखा मांग रहा दो रोटियाँ। तुम अनदेखा कर बैठे घर में अपनी थाली सजा कर। मुँह में निवाला लेते हुए मन में हुआ नहीं कुछ। व्यर्थ हैं अन्न के भंडार। सच कहता हूँ,जमाखोरी ही तुम्हारी मृत्यु है। अकेले खाने वाले तुम पाप ही खाते रहे जीवन भर।’ यह है वेद की भाषा। इसकी सम्प्रेषणीयता ने आर्यों का चरित्र बदला, उसे नयी ऊँचाई दी। सदियों ने सामाजिक समरसता का पाठ हमें घुट्टी में पिलाया गया, जिसके आश्चर्यजनक परिणामों के रूप भारतीयता का उज्ज्वल चरित्र सामने आया।

यह सच है, कि वेद प्रार्थनाओं का विशाल संग्रह है। इतना बड़ा प्राचीन संग्रह भारतीय साहित्य को छोड़ किसी दूसरे साहित्य के पास नहीं है। ये जो वैदिक प्रार्थनाएँ हैं, किसी एक व्यक्ति के कुशल-क्षेम के लिये नहीं है, समाज की कुशलता के लिये है, समाजिक उत्कर्ष की लम्बी आयु के लिये है। केवल ऋग्वेद ही नहीं, यजुर्वेद भी सामाजिक अभ्युदय के मनोरथों से भरा हुआ है। वहाँ भले ही कर्मकाण्ड को एक यज्ञीय विधिशास्त्र के रूप में मान्यता मिली हुई है, लेकिन विनियोग के मंत्रों की बृहत् शृंखला हमें सीधे-सीधे हमारे समाज के सुख-दुःख से जोड़ती है। इस ओर से हम आँखें बंद किये बैठे हैं। वेद की भाषा और उसके अर्थ पर जायेंगे, तो हम भारतीयों मस्तक ऊँचा हो जायेगा। क्या सोचते थे हमारे ऋषि। उदाहरण के लिये प्रसिद्ध रुद्र सूक्त के केवल इस एक मंत्र पर दृष्टि डालिए-

मा नो महान्तमुत मा नो अर्भकं
मा न उक्षन्तमुत मा न उक्षितम्।
मा नो वधी: पितरं मोत मातरं
मा नः प्रियास्तन्वो रुद्र रीरिषः।।

हे रुद्र! मनुष्य समाज के वृद्धजनों को मत मारो। हमारे बच्चों को मत मारो।तरुणों को मत मारो।गर्भस्थ शिशु को मत मारो। पिता को मत मारो। माता को मत मारो। हमारे प्रिय जनों को मत मारो।

यह है भारतीय साहित्य में सामाजिक समरसता का निकष। कितनी अपार संवेदना? परदु:खकातरता की कैसी मार्मिक अभिव्यक्ति? कितनी उदात्त दृष्टि? इसी ने वेदों को सर्वोच्च गरिमा दी। मानवता की इस उच्चतम अभिलाषा ने ही वैदिक ऋषियों को चरितार्थता दी।

सहयोग और सामञ्जस्य, परस्पर प्रेम और भ्रातृत्व, एक मन और एक हृदय, एक चित्त और एक ध्यान, ये ही तो वे मधुर अभीप्साएँ हैं, जो वैदिक मंत्रों में सर्वत्र ही किसी न किसी रूप में परिलक्षित होती हैं अथर्ववेद में एक सांमनस्य सूक्त मिलता है, जिसमें आपके और हमारे परिवारों की वह प्रार्थना है, जो हमें आपस में जोड़ती है, सामाजिक समरसता का आश्वासन देती है। इस सूक्त के जो भाव हैं, वे द्रष्टव्य हैं-

ओ मेरे प्यारे भाई-बहन!
आओ, हम द्वेष का जंगल जला डालें।
आपस में मिल बैठ हँसें-बोलें,
साथ-साथ चल पड़ें ,
साथ-साथ काम करें।

हम सब साथ-साथ होंगे
तो सब देवता भी हमारे साथ होंगे।
हम सबमें समन्वय होगा
तो सब देवता भी हमारे निमित्त
आपस में सुसमञ्जस होंगे।।4।।

आओ सब,
कंधे से कंधा मिला कर आओ।
साथ-साथ आपस में हँसते-गाते आओ।
एकचित्त हो कर ऊपर उठो,
हम सबके मन की भी एक दिशा हो।

अथर्ववेद के इस सूक्त की सामाजिक उपादेयता सहस्रों सदियाँ बीत जाने के बाद भी ज्यों की त्यों बनी हुई है, तो इसकी एक यही वजह है कि भारतीय मन सामाजिक समरसता के आग्रह से अब भी भरा हुआ है। वह जानता है कि वेदोत्तरकाल और उसके बाद रामायणकाल और महाभारतकाल में भी भारतीय साहित्य का मूल स्वर सामाजिक समरसता ही है। इस सूक्त के अंतिम दो मंत्रों का मूल पाठ यहाँ भावार्थ के साथ देकर अपने कथ्य का समापन कर रहा हूँ।

समानी प्रपा सह वोन्नभागः
समाने योक्त्रे सह वो युनज्मि।
सम्ञ्चोऽग्निं सपर्यतारा
नाभिमिवाभितः।।

एक जगह बैठ कर जलपान करें हम,
एक जगह बैठ कर भोजन करें हम,
एक जगह मिलें, जुड़ें आपस में ऐसे,
रथचक्र की धुरी में तीलियाँ हों जैसे।

सध्रीचीनान् वः संमनसस्कृणो-
म्येकश्नुष्टीन्त्संवननेन सर्वान्।
देवा इवामृतं रक्षमाणा:सायं-
प्रातः सौमनसो वो अस्तु।।

बहुत कठिन है जीना यहाँ अकेले में,
मिल जाना श्रेयस्कर अपने मेले में।
अमृत की रक्षा सहज नहीं हो जाती,
यदि देवों की मति एक नहीं हो पाती।
✍🏻मुरलीधर चाँदनीवाला

RV9.104 समरसता
6 पर्वतनारदौ काण्वौ, काश्यप्यौ शिखण्डिन्यावप्सरसौ वा । पवमान: सोम: । उष्णिक् ।
सामुहिक गायन सत्संग का महत्व
1.सखाय आ नि षीदत पुनानाय प्र गायत ।
शिशुं न यज्ञै: परि भूषत श्रिये ।। RV 9.104.1
व्यावहारिक अर्थ:-हे मित्रो ! आओ संगठित हो कर बैठो, सब के कल्याण के लिए पवित्र करने वाले ज्ञान को शिषु की तरह से बढ़ाने के लिए उत्तम गायन सतसन्ग करो.
2. समी वत्सं न मातृभि: सृजता गयसाधनम् ।
देवाव्यं1 मदमभि द्विशवसम् ।। RV 9.104.2
व्यावहारिक अर्थ:-जिस प्रकार बछड़े का गौ के साथ रह कर विकास होता है,उसी प्रकार दिव्यगुणों के रक्षक उल्लास, मानसिक और शारीरिक चेतना को बल देनेवाले (इस प्रकार सामुहिक सत्‌संग और गायन से ) मातृभूमि के प्रति जाग्रित होवो.
3. पुनाता दक्षसाधनं यथा शर्धाय वीतये ।
यथा मित्राय वरुणाय शन्तम: ।। RV 9.104.3
व्यावहारिक अर्थ:-सुख शांतिके लिए इस साधन से अपनी चेतना को पवित्र द्वारा सब स्थानों पर मैत्री पूर्ण वातावरण के बनाने की शक्ति और क्षमता प्राप्त करो
4. अस्मभ्यं त्वा वसुविदमभि वाणीरनूषत ।
गोभिष्टे वर्णमभि वासयामसि ।। RV 9.104.4
व्यावहारिक अर्थ:-हमारी स्तुतियां और वाणियों के प्रभाव से सब साधनों की प्राप्ति के लिए गौओं के प्रताप से सब के जीवन को समृद्ध करें
5. स नो मदानां पत इन्दो देवप्सरा असि ।
सखेव सख्ये गातुवित्तमो भव ।। RV 9.104.5
व्यावहारिक अर्थ:-इस (संगठन की) मानसिकता हमें शक्तिशाली, हमारे उत्साह और उल्लास की रक्षा करने वाली देवता स्वरूप है, सब लोग सब एक मित्र हो कर श्रेष्ठ मार्ग दर्शन करते हैं जिस के द्वारा सुरक्षा प्राप्त जीवन दिव्य गुणों वाला हो कर सब जनों को देवरूप बनाता है .
6. सनेमि कृध्यस्मदा रक्षसं कं चिदत्रिणम् ।
अपादेवं द्वयुमंहो युयोधि न: ।। RV 9.104.6
व्यावहारिक अर्थ:-इस प्रकार कुटिलता से दो भांति के व्यवहार करने वाले आसुरी राक्षसी वृत्ति द्वारा हमारा अहित ( देश को खा जाने वालों से ) करने वालों के सत्य असत्य व्यवहार को पृथक करने का सामर्थ्य स्थापित होता है.

AV1.15 देवता:- सिन्ध्वादयो मन्त्रोक्ता -ऐश्वर्यप्राप्त्युदेश
संगठित रूप से कार्य करने का महत्व
1. सं सं स्रवन्तु सिन्धवः सं वाताः सं पतत्रिणः ।
इमं यज्ञं प्रदिवो मे जुषन्तां संस्राव्येण हविषा जुहोमि । ।अथर्व 1.15.1 । ।
(सिन्धव: संसंस्रवन्तु) सब नदियां संगठित रूप से हमारे अनुकूल हो कर बहें अर्थात्‌ अनुकूल रूप से विशाल जल का स्रोत ही राष्ट्र की उन्नति में सहायक हो सकता है, यदि वह प्रतिकूल होगा तो राष्ट्र के लिए बाढ़ जैसे विध्वंश कारी परिणाम लाएगा । (वाता: सम्‌ पतत्रिण: सम्‌) विविध प्रकार के पवन और पक्षी भी सब बहुत संगठित रूप से अनुकूल हो कर बहें, अर्थात्‌ नौका आदि से समुद्र यात्रा और विमान अदि से वायुमण्डल मंह जाने वाले यान अनुकूल पवन का लाभ लें और पक्षी इत्यादि जीव भी अनुकूल रूप से राष्ट्र सुरक्षा में योगदान करें, जैसे एक टिड्डि दल प्रतिकूल रूप से वनस्पतियों को नष्ट कर देता है। (प्रदिव:इमम्‌ यज्ञम्‌) मेरे इस व्यावहारिक व्यापारिक सङ्गतिकरण यज्ञ में (संस्राव्येण हविषा) सब साधनों के प्रयोग से (उषन्ताम्‌ जुहोमि) हम लोग प्रीति पूर्वक राष्ट्र की समृद्धि को प्राप्त करें ।

व्यापार और उद्योग संघ अधिवेशन Chamber of Commerce & Industry

  1. इहैव हवं आ यात म इह संस्रावणा उतेमं वर्धयता गिरः ।
    इहैतु सर्वो यः पशुरस्मिन्तिष्ठतु या रयिः । । अथर्व 1.15.2 । ।
    हे व्यापारियो! (इह एव) इस संघ के अधिवेशन में (मे हवम आ यात ) हमारे अह्वान पर पधारो । (इह) इस अधिवेशन में (संस्रावणा:) प्रतिवेदन सब मिले हैं ( उत गिर: इमम्‌ वर्धयत इह एतु ) आप के आने पर उन्हें अपने अपने वक्तव्य से इस संघ के अनुमोदन से अपने लक्ष्य की ओर हम अग्रसर हों। (य: सर्वा: पशु: या रयि: अस्मिन्‌ तिष्ठतु) और व्यापार और उद्योग के सब श्रमिक इत्यादि कार्य कर्ता के प्रयत्न से बढ़ती लक्ष्मी हमारे राष्ट्र में स्थित रहे।

  2. ये नदीनां संस्रवन्त्युत्सासः सदं अक्षिताः ।
    तेभिर्मे सर्वैः संस्रावैर्धनं सं स्रावयामसि । । अथर्व 1.15.3 । ।
    (नदीनाम्‌ ) नदियों को (संस्रावै:) प्रवाहों द्वारा जो (उत्सास:) उनके उद्‌गम के स्रोत (सदम्‌)सदा (अक्षिता:) बिना क्षीण हुए (संस्रवन्ति) प्रवाहित होती रहती हैं, (तेभिर्मे सर्वै:) उसी प्रकार मुझ व्यापाराध्यक्ष द्वारा सदैव (संस्रावै धनम्‌) राष्ट्र में स्मृद्धि के प्रवाह को ( सं संस्रावयामसि) हम मिल कर प्रवाहित करते हैं।

  3. ये सर्पिषः संस्रवन्ति क्षीरस्य चोदकस्य च।
    तेभिर्मे सर्वैः संस्रावैर्धनं सं स्रावयामसि । । अथर्व 1.15.4 । ।
    (ये सर्पिष: क्षीरस्य च उदकस्य च संस्रवन्ति:) जैसे गौ के घी दूध राष्ट्र की प्रगति को बढ़ाते है और गौ के भूमि पर विचरण करने से वर्षा की भूमि से आर्द्रता पुन: ऊपर जाकर वर्षा बनती है, (तेभिर्मे सर्वै:) उसी प्रकार मुझ व्यापाराध्यक्ष द्वारा सदैव (संस्रावै धनम्‌) राष्ट्र में स्मृद्धि के प्रवाह को ( सं संस्रावयामसि) हम मिल कर प्रवाहित करते हैं।
    ✍🏻सुबोध कुमार

Comment:Cancel reply

Exit mobile version
kolaybet giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
grandpashabet giriş
safirbet giriş
safirbet giriş
imajbet giriş
imajbet giriş
savoybetting giriş
rekorbet giriş
rekorbet giriş
betnano giriş
betpark giriş
betpark giriş
kolaybet giriş
kolaybet giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
madridbet giriş
madridbet giriş
betnano giriş
casinofast giriş
casinofast giriş
betpipo giriş
ikimisli giriş
betpipo giriş
ikimisli giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
timebet giriş
timebet giriş
safirbet giriş
safirbet giriş
betpark giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
grandpashabet giriş
timebet giriş
betyap giriş
betyap giriş
safirbet giriş
safirbet giriş
timebet giriş
vaycasino giriş
milbet giriş
imajbet giriş
imajbet giriş
milbet giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
madridbet giriş
madridbet giriş
timebet giriş
timebet giriş
artemisbet giriş
romabet giriş
artemisbet giriş
betpas giriş
milanobet giriş
grandpashabet giriş
vaycasino giriş
betnano giriş
rekorbet giriş
rekorbet giriş
betgaranti giriş
hititbet giriş
betgaranti giriş
winxbet giriş
winxbet giriş
parmabet giriş
parmabet giriş
artemisbet giriş
betvole giriş
betvole giriş
pusulabet giriş
betnano giriş
pusulabet giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
betnano giriş
betnano giriş
betnano giriş
superbet giriş
vaycasino giriş
betparibu giriş
betparibu giriş
betgaranti giriş
kolaybet giriş
parmabet giriş
parmabet giriş
betpark giriş
milanobet giriş
milanobet giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş