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बागेश्वर धाम बाबा* – 2

बागेश्वर धाम बाबा

डॉ डी के गर्ग -Bhag-2

ये लेख दो भागो में है। कृपया अपने विचार बताये। बाबा की शास्त्रीय योग्यता : आज की तिथि में धीरेन्द्र की उम्र केवल २४ वर्ष है कोई संन्यास आदि की दीक्षा नहीं ली है ,धर्म प्रचारक का कार्य करते है और स्वयं को बाबा और शास्त्री कहलवाना सुरु कर दिया है। जो गलत है।
शास्त्री किसे कहते है ?
बाबा स्वयं को शास्त्री लिखते है जबकि मुश्किल से BA पास किया है। कोई शाश्त्र ,वैदिक ग्रन्थ भी नहीं पढ़ा इसलिए बाबा के प्रवचन भटके हुए होते है जिनमे तुक्का बजी ,हंसी मजाक भरपूर लेकिन शास्त्रीय ज्ञान दूर दूर तक नहीं होता।
शास्त्री किसे कहते है?
शास्त्र का ज्ञाता; शास्त्रज्ञ।
शास्त्री कैसे बनते है?
“शास्त्री” की उपाधि स्नातक स्तर (Graduate) और “आचार्य” की उपाधि (Post Graduate) परास्नातक स्तर की होती है।
चार वर्षीय शास्त्री कोर्स में दाखिला लेने वाले विद्यार्थियों को चार वर्ष तक अध्ययन करना आवश्यक नहीं होगा। एक साल की परीक्षा उत्तीर्ण करने पर विद्यार्थियों को सर्टिफिकेट, दो वर्ष में डिप्लोमा, तीन साल में डिग्री व चौथे साल रिसर्च के साथ बैचलर की डिग्री दी जाती है ।
पाखंड लीला करने में माहिर : वागेश्वरधाम का ये कथा वाचक पाखंड लीला करने में माहिर है| हनुमान जी से बडी़ बडी सिद्धियाँ प्राप्त करने, रावण से टैलीफोन पर बातें करने व असाध्य रोगों को ठीक करने का दावा करता है, कई बार तो पागलों जैसी हरकते भी करने लगता है..भोली भाली जनता व अन्धभक्त उसकी सब बातों पर विश्वास भी कर लेते हैं |!! झूठ छल कपट घमंड पाखंड व अन्धविश्वास में लिप्त चाहे पण्डा हो, चाहे मौलवी हो,चाहे पादरी हो, चाहे कोई और हो सभी निन्दनीय है|
देश की दुर्दशा

अज्ञानी लोग वैद्यक शास्त्र वा पदार्थविद्या के पढ़ने, सुनने और विचार से रहित होकर सन्निपातज्वरादि शारीरिक और उन्मादादि मानस रोगों का नाम भूत प्रेतादि धरते हैं। उन का औषधसेवन और पथ्यादि उचित व्यवहार न करके पाखण्डी, स्वार्थी, पर भी विश्वासी होकर अनेक प्रकार से ढोंग, छल, कपट और उच्छिष्ट भोजन, डोरा, धागा आदि मिथ्या मन्त्र यन्त्र बांधते-बंधवाते फिरते हैं। अपने धन का नाश, सन्तान आदि की दुर्दशा और रोगों को बढ़ा कर दुःख देते फिरते हैं।
जब आंख के अन्धे और गांठ के पूरे उन दुर्बुद्धि पापी स्वार्थियों के पास जाकर पूछते हैं कि—‘महाराज! इस लड़का, लड़की, स्त्री और पुरुष को न जाने क्या हो गया है?’ तब वे बोलते हैं कि ‘इस के शरीर में बड़ा भूत, प्रेत, भैरव, शीतला आदि देवी आ गई है, जब तक तुम इस का उपाय न करोगे तब तक ये न छूटेंगे और प्राण भी ले लेंगे। जो तुम मलीदा वा इतनी भेंट दो तो मन्त्र जप पुरश्चरण से झाड़ के इन को निकाल दें। तब वे अन्धे और उन के सम्बन्धी बोलते हैं कि ‘महाराज! चाहे हमारा सर्वस्व जाओ परन्तु इन को अच्छा कर दीजिए। ’ तब तो उन की बन पड़ती है। वे धूर्त्त कहते हैं—‘अच्छा लाओ इतनी सामग्री, इतनी दक्षिणा, देवता को भेंट और ग्रहदान कराओ।
भक्त कहता है -बाबा जी आप चाहें सो लीजिये इस को बचाइये। ’ तब वह बोलता है मैं हनुमान् हूँ, लाओ पक्की मिठाई, तेल, सिन्दूर, सवा मन का रोट और लाल लंगोट। मैं देवी वा भैरव हूं, लाओ , मिठाई और वस्त्र। ’ जब वे कहते हैं कि—‘जो चाहो सो लो’
वह उन का केवल धनादि हरण करने के प्रयोजनार्थ ढोंग है।
और जब किसी ग्रहग्रस्त ग्रहरूप ज्योतिर्विदाभास के पास जाके वे कहते हैं—‘हे महाराज! इस को क्या है?’ तब वे कहते हैं कि इस पर सूर्यादि क्रूर ग्रह चढ़े हैं। जो तुम इन की शान्ति, पाठ, पूजा, दान कराओ तो इस को सुख हो जाय, नहीं तो बहुत पीड़ित होकर मर जाय तो भी आश्चर्य नहीं।’कहिये ज्योतिर्वित्! जैसी यह पृथिवी जड़ है वैसे ही सूर्यादि लोक हैं, वे ताप और प्रकाशादि से भिन्न कुछ भी नहीं कर सकते। क्या ये चेतन हैं जो क्रोधित होके दुःख और शान्त होके सुख दे सकें?
अंत में एक प्रश्न:
सभी पूर्वाग्रह से रहित हो कर पढ़ें एवं स्वयं विचारें की क्या पाखण्ड और अंधविश्वास कभी किसी राष्ट्र का हित कर सकते हैं?
जो पाखण्ड और अंधविश्वास भूत-प्रेत बाधा काला जादू आदि के नाम पर चलाये जा रहे हैं वह हिन्दू समाज को खोखला कर और गहरे अंधेरो में ले जा रहे हैं।हम नित्य प्रति ईश्वर से प्रार्थना करते हैं कि
“असतो मा सद्गयमय”
हे परमात्मा! हमको असत्य से सत्य की ओर अग्रसर करें किन्तु कुछ लोग समाज को अंधविश्वास पाखण्ड की ओर ले जा कर परमात्मा द्वारा प्रसिद्ध व वैज्ञानिक वैदिक धर्म की निंदा का प्रयास करते हैं निश्चित ही ऐसे लोग दंड के पात्र हैं।
धीरेंद्र जी से हमारा सविनय निवेदन है पाखण्ड और अंधविश्वास की आड़ में पब्लिसिटी लेना बंद करें। हिन्दू समाज को श्री राम जी महाबली हनुमान जी के आदर्शो व विचारों की ओर अग्रसर करें एवं वैज्ञानिक प्रतिभासंपन्न बनाने में योगदान दें। श्री राम जी महाराजा स्वयं वेद व विज्ञान के पक्षधर व संरक्षक थे पाखण्ड के नहीं।

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