विश्वगुरू के रूप में भारत-53 

दासता से मुक्ति का दिया भारत ने विश्व को संदेश
भारत ने अपना स्वाधीनता संग्राम उसी दिन से आरंभ कर दिया था जिस दिन से उसकी स्वतंत्रता का अपहत्र्ता पहला विदेशी आक्रांता यहां आया था। इस विषय पर हम अपनी सुप्रसिद्घ पुस्तक श्रंखला ‘भारत के 1235 वर्षीय स्वाधीनता संग्राम का इतिहास’ के छह खण्डों में प्रकाश डाल चुके हैं। सुबुद्घ पाठक उस श्रंखला को मंगाकर उचित लाभ प्राप्त कर सकते हैं।
भारत ने अपना स्वाधीनता संग्राम क्यों लड़ा? इस प्रश्न पर विचार करना आवश्यक है। भारत के द्वारा अपना स्वाधीनता संग्राम लड़े जाने के कई कारण थे। उन्हें हम इस प्रकार समझ सकते हैं :-
(1) भारत का राजधर्म स्वाधीनता का पोषक
भारत का राजधर्म स्वाधीनता का पोषक और संवाहक है। उसका जन्म ही व्यक्ति की स्वतंत्रता की रक्षार्थ हुआ। जिस निजता की रक्षा की बात आज हो रही है और सारा संसार ‘निजता’ की परिभाषा निश्चित करने में लगा है उस निजता को हमने ‘योगक्षेम’ कहा है। इस योगक्षेम की रक्षा करने की बात वेद ने की है। जिस पर हम पूर्व में प्रकाश डाल चुके हैं।
महाभारत में भीष्मजी युधिष्ठिर से कहते हैं-
योग: क्षेमश्च ते नित्यं ब्राहमणेश्वस्तु
।। 18।।
तदर्थ जीवितं ते अस्तु मां तेभ्यो अप्रतिपालनम् ।। 19।। अ. 61
अर्थात ”भरत नन्दन! ब्राह्मणों के पास जो वस्तु न हो उसे उनको देना और जो हो उसकी रक्षा करना भी तुम्हारा नित्य कर्म है। तुम्हारा जीवन उन्हीं की सेवा में लग जाना चाहिए। उनकी (अर्थात प्रजा की रक्षा से) तुम्हें कभी भी मुंह नहीं मोडऩा चाहिए।”
भीष्म जी आगे कहते हैं कि जिनका राजा बुद्घिमान और धार्मिक होता है, सदाचारी और विवेकी होता है वे प्रजाजन सुख से सोते हैं और सुख से ही जागते हैं। इसका अभिप्राय है कि भीष्मजी राजा के लिए अनिवार्य गुण घोषित कर रहे हैं कि वह ऐसा पराक्रमी हो जिसके रहते हुए जनता सुखपूर्वक जीवन यापन करे अर्थात जनता की स्वतंत्रता के या उसकी निजता के अपहरण की कोई संभावना न हो। जनता के सुख चैन में बाधा डालने का साहस किसी भी व्यक्ति को न हो और प्रत्येक प्रकार के उपद्रवी लोगों पर राजा का पूर्ण नियंत्रण स्थापित हो।
भीष्मजी कहते हैं कि ऐसे प्रजा हितैषी राजा के रहते प्रजावर्ग के लोग संतुष्ट रहते हैं। उस राज्य में सबके योगक्षेम का निर्वाह होता है। समय पर वर्षा होती है और प्रजा अपने शुभकर्मों से समृद्घिशालिनी होती है। ऐसे राजा की राज्य व्यवस्था पूर्णत: न्याय पर आधारित होती है और यह सर्वमान्य सत्य है कि एक न्यायशील राजा के राज में सारी प्रजा सुख शान्ति के साथ जीवन यापन करती है।
जब विदेशी आक्रामक भारत आये तो उनका उद्देश्य भारत के लोगों के योगक्षेम का अपहरण करना था। जिससे उनकी निजता प्रभावित होनी थी। तब ऐसी चुनौती को देख कर भारत का राजधर्म आंदोलित हो उठा और उसने तलवार उठा ली। एक ही संकल्प था- उस समय सारे राष्ट्र का कि विदेशियों की पराधीनता स्वीकार नहीं करेंगे और ना ही अपने लोगों की निजता का किसी भी प्रकार से उल्घन होने देंगे। इसी संकल्प को लेकर हमारे वीर योद्घा क्षत्रियजन सैकड़ों वर्ष तक विदेशी सत्ताधीशों का नाश करने के लिए उनसे संघर्ष करते रहे। योगक्षेम की रक्षा करना और अपनी निजता को नीलाम न होने देना यह विषय भारत की मूल चेतना या विषय था। इससे वह आंदोलित हो उठा और दीर्घकाल तक प्रभावित रहा।
(2) स्वाधीनता का मूल्य भारत ही समझ सकता था
स्वाधीनता क्या है? इसका अर्थ केवल वही देश समझ सकता था जिसने स्वाधीनता को सबसे पहले परिभाषा दी हो, जिसने स्वाधीनता और स्वराज्य की पूजा प्राणपण से की हो। भारत ने अपने दीर्घकालीन शासनकाल में अपने आर्य राजाओं को जनसेवी कार्यों में लगे रहते देखा था। वे दुष्टों का संहार कर देश के जनसाधारण के जीवन को उन्नत बनाने के लिए संकल्पबद्घ रहते थे। पर अब जो विदेशी आक्रांता भारत की ओर आ रहे थे उनका उद्देश्य लोगों की स्वाधीनता का सम्मान करना न होकर स्वाधीनता का अपहरण करना था। जिसे स्वाधीनता के उपासक रहे भारतीय राजवंशों ने या वीर योद्घाओं ने स्वीकार नहीं किया और ऐसे लुटेरे आक्रांताओं का विरेाध करने के लिए और नाश करने के लिए उठ खड़े हुए। जहां आवश्यक समझा गया वहां राजाओं ने दर्जनों की संख्या में एक साथ मिलकर शत्रु के विरूद्घ गठबंधन भी किया या उचित माना गया तो विदेशी आक्रांताओं और स्वतंत्रता के अपहत्र्ताओं को देश की सीमाओं से बाहर खदेडऩे के लिए नये राजवंशों की भी स्थापना की गयी। गुर्जर प्रतिहारवंश से लेकर विजय नगर के राज्य और शिवाजी महाराज तक के मराठा राजवंश तक ऐसे कितने ही राजवंश आये जिनका उद्देश्य ही विदेशियों को देश से बाहर खदेडऩा था। ऐसे संकल्प लेकर उठने या बनने वाले राजवंशों की दीर्घकालीन परम्परा विश्व में केवल भारत के पास रही है। इसका कारण यही रहा कि भारत ने ही स्वाधीनता का मूल्य समझा है और उसने जब देखा कि जनसाधारण को भी विदेशी लोग या तो मार रहे हैं या अपना गुलाम बना रहे हैं तो उससे यह सहन नहीं हुआ। तब भारत की मूल चेतना में बसा संस्कार जागृत हुआ और उसने भारत को विदेशियों के विरूद्घ संघर्ष के लिए मैदान में उतार दिया। गुर्जर प्रतिहारवंश के शासकों ने विदेशियों को निरंतर तीन सौ वर्ष तक भारत की सीमा में प्रवेश नहीं करने दिया। ऐसा उत्कृष्ट कार्य गुर्जर प्रतिहारवंश के शासकों ने अपनी देशभक्ति की भावना से प्रेरित होकर ही किया था। इसके पश्चात सल्तनकाल और मुगलवंश के किसी भी शासक को और उसके पश्चात अंग्रेजों को भी भारत के लोगों ने निष्कंठक राज्य नहीं करने दिया। भारत के लोगों ने अपनी स्वतंत्रता के लिए प्रत्येक विदेशी शासक के शासनकाल में प्रतिदिन संघर्ष किया।
(3) धर्म का पतित होना भारत को स्वीकार्य नहीं था
भारतीय धर्म अपने आप में स्वाधीनता का पोषक है। वह व्यक्ति की निजता को मुखरित होते देखना चाहता है। विदेशी आक्रांता जब भारत आये तो उन्होंने भारतीय धर्म का विनाश करना आरंभ किया। इससे भारत का पौरूष उबल पड़ा। उसे यह स्वीकार्य नहीं था कि कोई विदेशी आक्रांता भारत की भूमि पर आकर भारतीय धर्म को नष्ट करने का काम करे। वस्तुत: भारत का धर्म विश्व धर्म था और भारतीयों की मान्यता थी कि यदि भारत का धर्म नष्ट किया गया तो इसका भारत पर ही नहीं विश्व पर भी घातक प्रभाव पड़ेगा और विश्व शान्ति खतरे में पड़ जाएगी। ऐसे कार्यों के लिए आदि शंकराचार्य से लेकर स्वामी दयानंद जी महाराज तक के कितने ही समाज सुधारकों ने भी भारतीय जनमानस को जगाने का प्रशंसनीय कार्य किया। भारत के राजधर्म ने अपने धर्म को पतित करते विदेशी आक्रांताओं का जमकर विरोध किया। इतना ही नहीं भारत की धर्मप्रेमी जनता ने भी अपने वीर राजाओं का भरपूर सहयोग दिया और अपने अनगिनत बलिदान दे देकर संघर्ष की मशाल को जलाये रखा।
(4) मातृभूमि के लिए बलिदान सर्वोत्तम होता है
भारत की संस्कृति में पुरूषार्थ को प्राथमिकता दी गयी है। पुरूषार्थ के विषय में महाभारत में कहा गया है कि जैसे बीज खेत में बोये बिना फल नहीं दे सकता, उसी प्रकार दैव भी पुरूषार्थ के बिना सिद्घ नहीं होता। पुरूषार्थ खेत है और दैव को बीज बताया गया है। खेत और बीज के संयोग से ही अनाज उत्पन्न होता है।
ऐसे पुरूषार्थी भारत का यह भी विश्वास था कि राष्ट्र के इस प्रकार के सांस्कृतिक मूल्यों की रक्षा के लिए पौरूष प्रदर्शन की भी आवश्यकता होती है। यही कारण रहा कि भारत के महान मनीषियों ने पुरूषार्थ व पौरूष का उचित समन्वय स्थापित कर राष्ट्र के लिए बलिदानी परम्परा का दीर्घकालीन साज सजा दिया। भारत ने मातृभूमि की रक्षा के लिए बलिदानों को सर्वोत्तम माना। इसका कारण यह भी था कि भारत के ऋषियों ने आर्य धर्म की रक्षा से ही संसार में शान्ति स्थापित की थी और जब उस शान्ति को संकट उत्पन्न होने लगा तो उसकी रक्षा करना भी हमारे पूर्वजों ने अपना कत्र्तव्य माना। भारत के लोगों ने अपना बलिदान देना और भारतमाता की रक्षा करना उस समय अपना राष्ट्रीय उद्योग मान लिया था।
क्रमश:

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