विश्वगुरू के रूप में भारत-52 

दूध को जब तक आप बिना पानी मिलाये बेच रहे हैं, तब तक वह व्यवहार है, पर जब उसमें पानी की मिलावट की जाने लगे और अधिकतम लाभ कमाकर लोगों का जीवन नष्ट करने के लिए बनावटी दूध भी मिलावटी करके बेचा जाने लगे तब वह शुद्घ व्यापार हो जाता है। इसे लोग आजकल ‘बिजनैस’ कहते हैं। हर व्यक्ति अपने ‘बिजनैस’ को सफल करने की युक्तियां एक दूसरे के जीवन को दांव पर रखकर खोजता रहता है। इस प्रकार व्यापार या बिजनैस का अभिप्राय दूसरों के जीवन के मूल्य पर स्वयं के लिए अधिकतम लाभ कमाना होकर रह गया है। यह व्यवस्था हमारे व्यवहार वाली व्यवस्था के सर्वथा विपरीत है। व्यवहार में व्यक्ति लागत मूल्य या उत्पादन मूल्य को प्राप्त कर उतना लाभ प्राप्त करना चाहता है जितने से आजीविका उपार्जन हो सके। जबकि व्यापार में व्यक्ति अपने अपने कत्र्तव्य कर्म=धर्म को भूलकर केवल ‘मोटे मुनाफे’ पर ध्यान रखता है।
आयात- निर्यात के विषय में भी वेद की ब$ड़ी स्पष्ट घोषणा है कि-
शतहस्त समाहर: सहस्रहस्तं संकिर:।
(अथर्व. 3/24/5)
वेद का आदेश है कि अर्थव्यवस्था को सफल बनाने के लिए व्यक्ति को सौ रूपये के माल का आयात तो एक हजार रूपये के माल का निर्यात करना चाहिए। आयात से अधिक निर्यात होना चाहिए, तभी अर्थव्यवस्था को एक मजबूत अर्थव्यवस्था का नाम दिया जा सकता है। ऐसी स्थिति हमारे पुरूषार्थी और उद्यमी होने की प्रतीक होती है। अकर्मण्य और आलसी लोगों का निर्यात की अपेक्षा आयात अधिक हो जाता है, जिससे अर्थव्यवस्था शिथिल पड़ते-पड़ते मरने की स्थिति में आ जाया करती है।
यूरोप में एक काल ऐसा आया जब वहां व्यापारियों ने पूर्णत: लूट मचा दी थी और वे जनसाधारण का रक्त चूसने लगे थे। वास्तव में वहां ऐसी स्थिति इसलिए आयी थी किवहां के राजाओं ने भी उपनिवेश स्थापित कर लिये थे और उनकी लूट को ही अपना राजधर्म बना लिया था। राजाओं की देखा-देखी उनका अनुकरण अन्य लोगों ने किया तो पूरे समाज का ही धर्म लूट हो गया।
उस लुटेरे समाज से जनसाधारण बड़ा दु:खी था। सर्वत्र हाहाकार मच उठी। लोगों में प्रचलित व्यवस्था से मुक्ति की इच्छा बलवती होती चली गयी। तब कहीं कम्युनिस्ट तो कहीं लोकतंत्र समर्थकों ने जनता की आवाज बनकर प्रचलित व्यवस्था को चुनौती दी। उन्होंने कहा कि आज के समाज में पूंजी श्रम पर शासन कर रही है जो कि नितांत अन्यायपरक है। एक व्यक्ति अपनी पूंजी का निवेश करता है और अपनी कंपनी में बहुत से कर्मचारी, मजदूर भरकर उनके श्रम का शोषण करता है। यह व्यवस्था अब परिवर्तन चाहती है। तब परिवर्तन के लिए कई देशों में क्रांतियां हुईं, लोगों को सपना दिखाया गया कि अब श्रम पूंजी पर शासन करेगा और पूंजीपति को उतना ही लाभ मिलेगा जितने का वह अधिकारी है, उससे अधिक नहीं मिलेगा। लोगों ने बड़ी संख्या में अपने बलिदान दिये और प्रचलित अन्यायपरक और अत्याचारी अर्थव्यवस्थाओं को परिवर्तित करने में सफलता प्राप्त की। परंतु उनका सपना शीघ्र ही टूट गया जब उन्हें पता चला कि तुमने जितना प्रयास किया है उससे तो केवल राजनीतिक व्यवस्था में परिवर्तन आया है और शराब की केवल बोतल बदली है-शराब तो वही पुरानी ही है। जनता अर्थव्यवस्था में परिवर्तन चाहती थी और क्रांतिनायकों ने राजनीतिक व्यवस्था में परिवर्तन कर उसे अपने नियंत्रण में ले लिया और लग गये जनता का रक्त चूसने।
वैदिक अर्थव्यवस्था में पूंजी श्रम पर शासन नहीं करती और ना ही श्रम पंूजी पर शासन कर सकता है। ‘वैदिक अर्थव्यवस्था में मेधाबल पूंजी को अनुशासित रखकर श्रम को पारितोषिक प्रदान करता है।’ संसार की ऐसी ही अर्थव्यवस्था सर्वोत्तम होती है, इसके विरूद्घ कभी भी आंदोलन या क्रांति नहीं हो सकती। भारत में अर्थव्यवस्था के विरूद्घ आंदोलन नहीं हुए तो इसका कारण यही है कि मेधाबल न्यायपरक निर्णय लेकर पूंजी को अनुशासित रखने में और श्रम को पारितोषित प्रदान करने में सफल रहा है। भारत ने धन सम्पदा से पहले बौद्घिक सम्पदा को पूजनीय माना है।
जिस राष्ट्र की बुद्घि बिगड़ जाती है वहां के प्रभावशाली लोग दुर्बलों का आर्थिक शोषण करने लगते हैं। इस सत्य को समझकर भारत ने लोगों के बुद्घिबल को न्यायपरक बनाने का प्रयास किया और उन्हें समझाया कि संसार में सभी लोग समान हैं-इसलिए किसी के भी अधिकारों का अतिक्रमण नहीं होना चाहिए। भारत की मान्यता रही कि किसी के आर्थिक हितों की उपेक्षा करना या उनका दोहन करना मानवता के विरूद्घ अपराध है। बुद्घिबल को न्यायसंगत व कत्र्तव्य प्रेरित बनाकर समाज में समानता का परिवेश स्थापित कर भारत की राजनीति को आशातीत सफलता मिली। इसका परिणाम यह हुआ कि देश के आर्थिक संसाधनों पर सबका समान अधिकार बना रहा। जिन लोगों ने किसी वर्ग विशेष पर आर्थिक अपराध करने का प्रयास किया उन्हें देश की नीति और विधि दोनों ने ही हेय भाव से देखा। साथ ही ऐसे उपेक्षित समाज के लोगों को देश की मूल विचारधारा से जोडऩे का प्रयास किया। जिन लोगों ने किसी वर्ग विशेष का आर्थिक शोषण किया या समाज में अस्पृश्यता और ऊंच-नीच की भावना को जन्म देने का स्वार्थपूर्ण कृत्य किया-उनका ऐसा कृत्य कभी भी भारत की अर्थव्यवस्था या सामाजिक व्यवस्था का मूल आधार नहीं बन पाया, उसे सदा एक कुरीति ही माना गया।
भारत के अर्थशास्त्री ऋषियों ने देश के अर्थशास्त्र को शिक्षा शास्त्र के साथ जोड़ दिया। उन्होंने विचार किया कि मनुष्य को मनुष्य बनाये रखकर किसी भी प्रकार की भावी आपदा से बचा जा सकता है। इसलिए उन्होंने मनुष्य के भीतर अधिकारों के लिए लडऩे झगडऩे की पाशविक प्रवृत्ति को पनपने ही नहीं दिया। उनका विचार था कि अधिकारों का संघर्ष समाज को अधोगति की ओर ले जाता है। एक व्यक्ति या वर्ग अधिकारों को पाते-पाते अधिनायक बन जाता है और फिर वह दूसरों पर अपने अधिनायकवाद को थोपता है। यहीं से शोषण अन्याय व अत्याचार के नये-नये आयाम खुलते जाते हैं। हमारे ऋषियों की मान्यता थी कि व्यक्ति को कत्र्तव्य प्रेरित किया जाए, और उसे दूसरे के अधिकारों का सम्मान करना सिखाया जाए। इससे अपने अधिकारों की रक्षा और दूसरे की निजता की रक्षा दोनों का ही हो पाना संभव होगा।
आज के संसार की अधोगति का यही कारण है कि इसने आज भी कत्र्तव्य प्रेरित मानव बनाने की ओर ध्यान नहीं दिया है। यह आज भी अपने ही विचारों में खोया और अपनी ही मान्यताओं के मृगजाल में फंसा पड़ा है। यही कारण है कि आज के संसार में आर्थिक अपराध बढ़ते ही जा रहे हैं। आर्थिक अपराधों की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसने व्यक्ति को मारने के लिए चौबीसों घंटे का उसे तनाव दे दिया है। हर पल व्यक्ति मर मरकर जी रहा है। वह तनाव, कुण्ठा और हताशा का शिकार है। उसके भवनों की ऊंचाई बढ़ रही है-पर हृदय की विशालता सिकुड़ती जा रही है, कोठियों में वातानुकूल न के कारण ठण्डक बढ़ती जा रही है, पर माथे पर पसीना फिर भी आ रहा है। यह स्थिति बता रही है कि व्यवस्था में भारी दोष है।
विश्व को चाहिए कि वह भारत की आर्थिक सोच को अपनाये और अपना सारा ध्यान मानव को मानव बनाने की ओर लगाये, अपने अर्थशास्त्र और शिक्षणशास्त्र का समन्वय करे, ध्वस्त हो चुकी बैंकिंग प्रणाली को छोडक़र और बिचौलियों की बाजार व्यवस्था को भंग कर भारत की अर्थव्यवस्था का अनुकरण करे। तभी हम भ्रष्टाचारमुक्त विश्व समाज बनाने में सफल होंगे। विश्वगुरू भारत का चिंतन विश्व के लिए उपलब्ध है। देखते हैं-विश्व उसे कब अपनाएगा?
क्रमश:

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