वैदिक सम्पत्ति : इतिहास पशु हिंसा और अश्लीलता

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इतिहास पशु हिंसा और अश्लीलता

गतांक से आगे….

वैदिक कोष निघण्टु के देखने से ज्ञात होता है कि वेद में मेघ को अद्रि, अश्मा, पर्वत, गिरि और उपल भी कहते हैं। परन्तु ये सब शब्द लोक में पहाड़ों के लिए ही व्यवहार में पाते हैं। इसी तरह वेद में सगर और समुद्र शब्द अन्तरिक्ष के लिए भी आये हैं, परन्तु व्यवहार में ये शब्द समुद्र के ही लिए आते हैं। वेद में गावः शब्द किरणों के लिए और सुपर्ण शब्द घोड़े तथा किरणों के लिए भी आता है। इस तरह से गौ और अश्व दोनों शब्द सूर्यकिरणों के भी वाची माने जाते हैं। जो हाल इन शब्दों का है, वहीं हाल अन्य संकड़ों शब्दों का है। इन अर्थों के अतिरिक्त वैज्ञानिक परिभाषा के कारण भी शब्दों के दो दो अर्थ हो जाते हैं। वेद का ‘यज्ञेन यज्ञमयजन्त देवाः’ मन्त्र प्रसिद्ध है। यास्काचार्य ने इस टुकड़े का अर्थ करते हुए लिखा है कि-
‘यज्ञेन यज्ञमयजन्त देवाअग्निना अग्निमयजन्त देवाः अग्निः पशुरासीतं ‘देवाऽलभन्त’
अर्थात् देवों ने अग्नि से अग्नि को यजन किया, क्योंकि अग्नि ही पशु था, उसी को देवता प्राप्त हुए। यहाँ अग्नि को पशु कहा गया है। यही नहीं, किन्तु वायु और सूर्य को भी पशु कहा गया है। तथा यजुर्वेद अध्याय 31 के सप्तास्यासन परिचयस्त्रिः सप्त समिधः कृताः । देवा यद्य तन्वाना अबन्धन् पुरुषं पशुम् मन्त्र में पुरुष को भी पशु कहा गया है। इस मन्त्र के दो अर्थ हैं। पहिला अर्थ यह है कि रस, रक्त, मांस, अस्थि, मज्जा, मेद और बीर्य की सात परिधियां बनाकर पांच ज्ञानेन्द्रिय, पांच कर्मेन्द्रिय, दश प्राण और एक मन की इक्कीस मूर्छनाओं को लेकर और नादरूपी पुरुष पशु को बांधकर देवताओं ने संगीतयज्ञ को फैलाया। और दूसरा अर्थ यह है कि सातों स्वरों की सात परिधियां बनाकर इक्कीस मूर्छनाओं की इक्कीस समिधाओं को लेकर और नादरूपी पुरुष पशु को बांधकर देवताओं ने संगीतयज्ञ को फैलाया। इन दोनों अर्थों से आत्मा और नाद भी पशु ही सिद्ध होते हैं। किन्तु प्रश्न यह है कि इन अग्नि, वायु, सूर्य, आत्मा और नाद आदि को पशु कहने का क्या कारण है ? इस विषय का निर्णय शतपथ ब्राह्मण के एक प्रश्नोत्तर से अच्छी तरह हो जाता है। वहां पूछा गया है कि कतमः प्रजापतिरिति’ अर्थात प्रजा का पालन करने वाला कौन है? तो उत्तर दिया गया है कि ‘पशुरिति’ अर्थात् प्रजा का पालन करने वाला पशु ही है। मालूम हुआ कि जो पदार्थ या शक्तियाँ प्रजा का पालन करती हैं वे सब पशु शब्द से ही सूचित की गई हैं। अग्नि ऑख और रूप को देकर, वायु प्राण और बल को देकर, सूर्य मेघा और चैतन्य को देकर, आत्मा जीवित देकर और नाद आनन्द को देकर प्रजा का पालन करते हैं, इसीलिए पशु नाम से सूचित किये गये हैं और इसी तरह अनेकों शब्द वैज्ञानिक परिभाषाओं के कारण दो दो अर्थ रखते हैं। जिस प्रकार ये शब्द अपना अपूर्व अर्थ रखते हैं, उसी तरह उपर्युक्त अज शब्द भी वैज्ञानिक अर्थ के ही कारण बीज अर्थ में आता है। अज का अर्थन पैदा होने वाला है। बीज का मतलब भी यही है। बीज भी कभी पैदा नहीं होता। बीज-कारण-सदैव उत्पत्तिरहित अनादि काल से चला आ रहा है। इसीलिए ‘अजसंज्ञानि बीजानि’ के अनुसार अज का अर्थ बीज भी होता है। वेद में इस प्रकार के अर्थकौशल का चमत्कार भरा पड़ा है। जिस प्रकार वेद शब्दों के दो दो तीन तीन अर्थ होते हैं, उसी तरह लौकिक शब्दों के भी अनेक अर्थ होते हैं। ‘भावप्रकाश’ में इस प्रकार के कई शब्द दिये हुए हैं—
अक्षशब्दः स्मृतोऽष्टासु सौवचल विभीतके । कर्षपद्यारुद्राक्षश कटेन्द्रियपाशके ।

काकाख्यः काकमाची च काकोली काकांणतिका । काकजंघा काकनासा काकोदु बरिकापि च ।
सप्तस्वर्थेषु कथितः काकशब्दो विचक्षणः । सर्पद्विरदमेषेषु सीसके नागकेसरे । नागवल्यां नागदत्यां नागशब्दः प्रयुज्यते ।

मांसे द्रवे चेक्षुरसे पारदे मधुरादिषु । बालरोगे विषे नीरे रक्षो नवसु वर्तते ।।

अर्थात् अक्ष शब्द के आठ अर्थ हैं- संचर नमक, बहेड़ा, एक कर्ष (तौल), पद्माक्ष, रुद्राक्ष, छकड़ा, इन्द्री और पांसे । काक शब्द के सात अर्थ हैं-मकोय, काकोली, लाल घुरंगची, काकजंघा, काकनासा, कठूमर और काकपक्षी । नाग शब्द के आठ नाम हैं-सांप, हाथी, मेंढा, सीसा, नागकेशर, नागरबेल, पान और नागदंती । रस शब्द के नौ अर्थ हैं -मांस, द्रव, ईख का रस, पारद, मधुरादि छै रस, बालक का एक रोग, विष, जल, और काव्य के नौ रस । जिस प्रकार ये शब्द अनेक अर्थ रखते हैं, उसी तरह गौ, वृषभ, अज और अश्व आदि शब्द भी अनेक अर्थ रखते हैं। यहाँ हम नमूने के तौर पर गौ आदि कुछ शब्दों के अनेक अर्थों को दिखलाने का यत्न करते हैं । निरुक्त में लिखा है कि ‘चर्म च श्लेष्मा च स्नायु च ज्यापि गौरुच्यते’ अर्थात् चमड़ा, श्लेष्मा, नसें और धनुष की डोरी को भी गौ कहते है । ऐसी दशा में जहां चमड़े और प्रत्यञ्चा के काटने की बात हो, वहां गौ के काटने का अर्थ ले दौड़ना बहुत ही सहज है । इन नामों के अतिरिक्त जिह्वा, वाणी, पृथिवी, किरण और इन्द्रियों को भी गौ कहा गया है । इस प्रकार से जब गौ शब्द के अनेकों अर्थ हैं तब हर जगह चतुष्पाद गौ का ही ग्रहण करना नितान्त अनुचित है ।
क्रमशः

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