हाथ जोड़ झुकाये मस्तक वन्दना हम कर रह्वहे

गतांक से आगे….
कथावाचकों की फीस लाखों में पहुंच गयी है। धर्म और प्रवचन बेचे जा रहे हैं। उनके माध्यम से अश्लीलता परोसी जा रही है। ‘इदन्नमम्’ का सार्थक व्यवहार समाप्त हो गया है, जिससे लोभवृत्ति में वृद्घि हो गयी है, झूठे अहम् को लेकर लड़ाई झगड़े चल रहे हैं। जिससे नमस्ते का ढंग भी परिवर्तित हो गया है। ना कोई किसी के लिए मस्तक झुका रहा है और ना ही हाथ जोड़ रहा है। इसका अर्थ है कि सब अहंकार में छाती फुलाये घूम रहे हैं।
”ऐश्वर्य तीनों लोकों के संतोष के सम है नहीं।
संतोष जिसके पास है, उस सम धनी जग में नहीं।”
ऐसे संतोष को हृदय में स्थान देने के लिए ही हाथ जोडऩे और मस्तक झुकाने की बात कही गयी है।
हाथ जोडऩे का एक प्रतीकात्मक अर्थ यह भी है कि सबके धन को अपने पास एकत्र करने की अमानवीय भावना से हाथों को समेट लो। इस भूमंडल की संपदा पर हर उस प्राणी का अधिकार है जो यहां आया है। यहां तक कि पशु-पक्षियों और वनस्पति या पेड़-पौधों का भी उस पर अधिकार है। हमारे हाथ अमर्यादित होकर किसी का संहार या तिरस्कार न करने लगें इसलिए उनका एक साथ विनम्रता से जुड़े रहने का अर्थ है कि मैं आपके जीने के मौलिक अधिकार का हृदय से सम्मान करता हूं। मैं ये मानता हूं कि जैसे जीने का अधिकार मुझे है-वैसे ही ये आपको भी है। जीवन के विषय में इतनी सरलता ही सबको जीने का अधिकार उपलब्ध करा सकती है।
ईश्वर के दरबार में अर्थात उसके ध्यान में बैठने के लिए भी ‘नमस्ते’ की मुद्रा को एक माध्यम बनाया जाता है। अपने इष्ट के समक्ष हाथ जोडक़र बैठने का अभिप्राय है कि-
”अब सौंप दिया इस जीवन का सब भार तुम्हारे हाथों में।
है जीत तुम्हारे हाथों में और हार तुम्हारे हाथों में।।”
ऋग्वेद (1/64/23) में आया है कि जो मनुष्य सृष्टि के पदार्थ और तत्रस्थ ईश्वरकृत रचना को जानकर परमात्मा का सब ओर से ध्यान कर विद्या और धर्म की उन्नति करते हैं वे मोक्ष को प्राप्त होते हैं। हाथ जोड़ और मस्तक झुकाकर बैठने की मुद्रा उपासना की मुद्रा है। इसमें व्यक्ति अंतर्यामी की लीलाओं को बड़ी निकटता से अपने भीतर अनुभव करने लगता है।
यजुर्वेद अध्याय 33 मंत्र 60 में उपासना के विषय में बताया गया है कि इसका फल क्या मिलता है? ऋषि कहता है कि जो मनुष्य अपने मन की आनंद की अवस्था में डुबकी लगाते हुए उस नाशरहित अर्थात अविनाशी अजर, अमर, अभय, नित्य, और सृष्टिकर्ता जगत के स्वामी परमात्मा की उपासना करते हैं, तथा उससे भिन्न, उससे समान किसी की उपासना नहीं करते हैं-वे इस नाशवान जगत के सभी बंधनों से मुक्त होकर मोक्ष को प्राप्त करते हैं। जगत के बंधनों का छूट जाना ही तो मुक्ति है, ये जगत के बंधन उस दिव्य परमपिता परमात्मा को अपने अंत:करण में देखने से और उसकी नित्योपासना करने से ही कटते हैं।
ईश्वर के समक्ष मस्तक झुकाकर बैठने से व्यक्ति श्रद्घालु बनता है। ऐसे श्रद्घालु के विषय में यजुर्वेद (अध्याय 34 मंत्र 34) में आया है कि :-
प्रातरग्निं प्रातरिन्द्रम् हवामहे प्रातर्मित्रावरूणा प्रातरश्विना। प्रातर्भगं पूषणं ब्रह्मणस्पति प्रात: सोममुत रूदं्र हुवेम्।।
यहां बताया गया है कि जो मनुष्य नित्य-नियम से बिना किसी व्यवधान के उस परमेश्वर की उपासना अग्निहोत्र, ऐश्वर्य की उन्नति का उपाय, प्राण और अपान की पुष्टि, उपदेशक विद्वानों से ज्ञानप्राप्ति, औषधियों का सेवन, और जीवात्मा को जानने का प्रयत्न करते हैं-वे सब सुखों को प्राप्त होते हैं।
इस मंत्र में ईश्वरोपासक की शारीरिक, मानसिक और आत्मिक अवस्था का चित्रण किया गया है। प्राण और अपान की पुष्टि से शारीरिक, मानसिक और आत्मिक अवस्था की पुष्टि होती है।
उपदेशक विद्वानों से ज्ञान प्राप्त करने और उसको अपने आचरण में अपनाने से भी आत्मिक आनंद मिलता है। इन सब अवस्थाओं को प्राप्त करने से प्राणी जीवात्मा को जानने का प्रयत्न करने लगता है, वह समझने लगता है कि संसार के जिस रागद्वेष की उलझन में फंसा पड़ा है-वह तो अपना ठिकाना है नहीं।
ठिकाना तो कहीं और है, और यदि वह ठिकाना समय रहते नहीं खोजा गया तो अनर्थ हो जाएगा। इसी उद्देश्य की प्राप्ति के लिए भक्त अपने भगवान से कह उठता है कि हाथ जोड़ झुकाये मस्तक वंदना हम कर रहे-अर्थात-हे दयानिधे! मैंने चारों से अपने आपको समेट लिया है मैंने शरीर को, अपने मन को और अपने आत्मा को एक तेरे चरणों में समर्पित कर दिया है, अब देर न कर बस गले से लगा ले, और मुझे वह वरदान दे दे-जिसे पाकर मैं भवसागर तर जाऊं। जिसे पाकर मेरा जीवन धन्य हो जाए। क्रमश:

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