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इतिहास के पन्नों से

गौतम बुद्ध और बौद्ध धर्म =एक विस्तृत अध्ययन*

Dr DK Garg

Note -यह आलेख महात्मा बुद्ध के प्रारम्भिक उपदेशों पर आधारित है। ।और विभिन्न विद्वानों के विचार उपरांत है। ये 10भाग में है।

इसको पढ़कर वे पाठक विस्मय का अनुभव कर सकते हैं जिन्होंने केवल परवर्ती बौद्ध मतानुयायी लेखकों की रचनाओं पर आधारित बौद्ध मत के विवरण को पढ़ा है ।

कृपया अपने विचार अवश्य बताए।
भाग 10 अंतिम

महात्मा बुद्ध के वैदिक धर्म और बौद्ध धर्म का तुलनात्मक अध्ययन-

1) छद्म बौद्धों का मुख्य मन्त्र है “जय भीम” जबकि इस प्रकार का कोई भी वाक्य महात्मा बुद्ध के किसी भी उपदेश में देखने को नहीं मिलता। सैकड़ों वर्षों से महात्मा बुद्ध के अनुयायी जिस मन्त्र का जाप करते हैं वो हैदृ “ॐ मणि पद्मे हुम्” जिसका हिंदी अनुवाद है कि ॐ ही सत चित आनंद है। यदि हम वैदिक शास्त्रों में देखें तो वहाँ भी ईश्वर के सम्बन्ध में इसी प्रकार का वर्णन आया हैदृ ओमित्येदक्षर्मिदम सर्वं तस्योपव्याख्यानम।
अर्थातः- समस्त वेदादि शास्त्रों में ओ३म् को ही ईश्वर का मुख्य नाम माना है।
2) छद्म बौद्ध अग्निहोत्र तथा यज्ञादि को व्यर्थ कार्य मानते हैं और गायत्री आदि मन्त्रों ढोंग को मानते हैं जबकि इसके विपरीत महात्मा बुद्ध ने अग्निहोत्र व गायत्री मन्त्र को विशेष महत्व दिया है दृ
अग्गिहुत्तमुखा यज्ञाः सावित्री छंदसो मुखम।।
(सुत्तनिपात श्लो. ५६९) अर्थातः- यज्ञों में अग्निहोत्र (दैनिक) मुख के समान प्रधान है और छंद का मुख सावित्री (गायत्री) मन्त्र है।
यदन्तगु वेदगु यन्न काले। यस्साहुतिल ले तस्स इज्झेति ब्रूमि।। (सुत्तनिपात श्लो. ४५८) अर्थात वेदों को जानने वाला जिसके यज्ञ की आहुति को प्राप्त करे उसका यज्ञ सफल होता है महात्मा बुद्ध के ऐसे कई उपदेश हैं जिसमें उन्होंने यज्ञ आदि को विशेष महत्व दिया है जबकि इसके विपरीत स्वयं को महात्मा बुद्ध का अनुयायी बताने वाले छद्म बुद्धिष्ट यज्ञ आदि को पाखण्ड बताते हैं।
3) छद्म बौद्ध सनातन धर्म को गाली देना अपना सर्वोपरि कर्तव्य मानते हैं लेकिन ये मानसिक रोगी शायद ये नहीं जानते कि भगवान बुद्ध स्वयं को सनातन धर्म का अनुयायी मानते थे
नहि वेरेन वेरानि सम्मंतीध कदाचन।
अवेरेन च सम्मन्ति एस धम्मो सनन्तनो द्यद्य (धम्मपद यमक वग्गो ५)
अर्थातः- वैर से कभी वैर शांत नहीं होता वह अवैर से ही शांत होता है यही सनातन धर्म है महात्मा बुद्ध ने जीवन पर्यन्त वैदिक धर्म का अनुसरण किया उन्होंने कभी किसी नए धर्म की स्थापना नहीं की।
4) भगवान बुद्ध ने कहा ‘‘हे आनन्द अन्त शरणा, अन्त दीपा बिहरथ (अर्थात तुम अपने प्रदीप (दीपक) स्वयं बनो, अपनी शरण ग्रहण करो।
5) भगवान बुद्ध संसार के ऐसे महामानव हैं, जिन्होंने किसी ‘‘चमत्कार या अलौकिक शक्तियों‘‘ से भ्रमित करने का प्रयास कभी नहीं किया जैसा कि दुनिया के अन्य लगभग सभी ‘‘धर्म प्रचारकों‘‘ ने किया। उन्होंने बहुत ही विनम्रता और शालीनता के साथ अपने कार्य को किया। एक बार वे अपने प्रधान धम्म सेनापति ‘‘सारिपुत्त‘‘ के साथ जंगल से होकर कहीं जा रहे थे। सारिपुत्त ने अचानक भगवान गौतम बुद्ध की प्रशंसा करते हुए कह बैठे कि ‘‘भगवन! इस दुनिया में आप जैसा ज्ञानी न तो वर्तमान में है, न भविष्य में कभी पैदा होगा। ‘‘इस पर भगवान बुद्ध ने बिना कोई समय गँवाए सारिपुत्त से कहा, कि, ‘‘भंते क्या आपने अपनी आँखों से देख लिया है कि मेरे जैसा ज्ञानी इस दुनिया में कोई, कहीं नहीं है? और उन्होंने जंगल से मुट्ठी भर सूखी पत्तियों को उठाकर कहा कि मेरा ज्ञान बस इतना ही है, परन्तु संसार का ज्ञान इस जंगल के सारे पत्तों से भी ज्यादे है, अनन्त है। ‘‘ऐसे महान, विनम्र, अंधविश्वास, पाखण्ड और रूढ़िवाद की जड़ काटने वाले, वैज्ञानिक और बुद्धिवादी सोच के महामानव थे भगवान गौतम बुद्ध।
6) भगवान बुद्ध ने जाति, वर्ण, अस्पृश्यता, मानवीय विषमता, शोषण, धार्मिक यज्ञों में कथित देवी-देवताओं को प्रसन्न करने के पाखंड के नाम पर बलि के नाम पर निरीह और निरपराध पशुओं के बध और पाखण्डों का खुलकर विरोध किया।
7) भगवान बुद्ध ने सदा मध्यम मार्ग पर चलने, संयम, परिश्रम, चित्त की एकाग्रता को ही सर्वोपरि माना है। उन्होंने सदा परिश्रम को सर्वोच्च प्राथमिकता दी है इसीलिए उनकी संस्कृति को ‘‘श्रमण संस्कृति‘‘ भी कहा जाता है । उनका मानना था कि बगैर परिश्रम के संसार में कुछ भी प्राप्त नहीं होता।
8) गौतम बुद्ध बहुत सरल स्वभाव के व उच्च कोटि के साधक थे। इन्होंने आस्था के नाम पर व्याप्त कुरीतियों व पाखंडों का युक्ति युक्त खण्डन किया। अष्टांगयोग का सरलीकरण कर जनता के सामने रखा। ईश्वर को वे परम सत्य का नाम देते थे। मन को विकारों से मुक्त करने के लिए इनकी विपश्यना ध्यान विधि अच्छी विधि है। गौतम बुद्ध का पूरा जोर ध्यान करने करवाने पर था। वर्तमान पण्डे पुजारियों मुल्लों पादरियों के मकड़जाल से मुक्त करवाने में गौतम बुद्ध का योगदान नकारा नहीं जा सकता।
विपश्यना एक वैज्ञानिक विधि प्रतीत होती है। बुद्ध के शिष्यों ने बुद्ध के नाम से बहुत पाखण्ड खड़ा कर दिया है।
भगवान बुद्ध के नाम से राजनीती की दुकान चलाने वालों ये सिद्ध करके बताओ कि बौद्ध धर्म की स्थापना महात्मा बुद्ध ने की थी। किसने की ये जात तक नही मालुम है।

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