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मेवाड़ के महाराणा और उनकी गौरव गाथा अध्याय – 8 (क) फिर से चित्तौड़ छीनने वाला महाराणा हमीर सिंह

फिर से चित्तौड़ छीनने वाला महाराणा हमीर सिंह

राणा अजय सिंह ने जब अपने भतीजे हमीर सिंह का राजतिलक किया तो उस राजतिलक ने हमीर सिंह के सिर पर कांटों का ताज रख दिया था। जी हां, एक ऐसा ताज जिसे पहन कर रातों को नींद नहीं आ सकती थी और दिन में चैन नहीं मिल सकता था। वास्तव में ताज एक बहुत बड़ा उत्तरदायित्व होता है। जिसका निर्वाह करने के लिए बहुत बड़े मनोबल, आत्मबल बाहुबल, सैन्यबल आदि की आवश्यकता होती है। यह सौभाग्य की बात थी कि 1326 ईस्वी में जब इस कांटों के ताज को पहनने वाला राणा हमीर सिंह सामने आया तो उसने अपने मनोबल के आधार पर अन्य सारे अभावों को दूर कर दिया। उसके भीतर बुद्धि बल भी था। वह युक्तियां खोज सकता था और युक्तियों के आधार पर किसी निष्कर्ष पर पहुंच सकने का बुद्धिबल रखता था। हमीर सिंह के सामने उस समय सबसे बड़ी समस्या यह थी कि उसके पास ना तो चित्तौड़ थी और ना ही ऐसे साधन थे जिनके आधार पर वह अपने खोए हुए राज्य को प्राप्त कर सके। पर जब कोई धीर, वीर, गंभीर व्यक्ति उत्तरदायित्व के निर्वाह के यथार्थ का सामना करता है तो उसे निश्चित रूप से ऐसे साधन प्राप्त हो जाते हैं , जिनसे वह अपनी ‘चित्तौड़’ को प्राप्त कर लेता है। समय और परिस्थितियां जहां व्यक्ति का निर्माण करते हैं वहीं कई बार ये दोनों मिलकर व्यक्ति की परीक्षा के लिए भी आ खड़े होते हैं। बस , यही सब कुछ उस समय हमीर सिंह के साथ हो रहा था। जिन्हें समय अपने शिकंजे में कसकर पास कर देता है , इस संसार में मुकद्दर के सिकंदर वही बनते हैं।
यहां पर हमें यह बात भी ध्यान रखनी चाहिए कि मेवाड़ के महाराणा हमीर सिंह और रणथम्भौर के हम्मीर देव चौहान दोनों अलग – अलग व्यक्तित्व हैं। दोनों को एक समझने की भूल नहीं करनी चाहिए। इतिहास में दोनों ही अपनी अपनी वीरता के लिए पहचाने जाते हैं।

राणा से बना महाराणा हम्मीर

महाराणा हमीर सिंह ने अपने शौर्य , पराक्रम और कूटनीति से मेवाड़ राज्य को मौहम्मद बिन तुगलक से छीनकर उसकी खोई हुई प्रतिष्ठा पुनः स्थापित की। इतना महान कार्य करने के कारण ही उनके नाम के पहले राणा के स्थान पर “महाराणा” जोड़ा गया। अब से पहले के जितने भर भी शासक इस वंश में हुए थे, उनके नाम से पहले “राणा” लगता था। उस समय की परिस्थितियों में महाराणा हमीर सिंह के लिए यह उपाधि बहुत बड़ी थी। इसी से उनकी महानता, देशभक्ति, देश, धर्म व संस्कृति के प्रति समर्पण का भाव स्पष्ट हो जाता है। उन्होंने इतिहास की धारा को परिवर्तित करने का साहस दिखाया। इतना ही नहीं, अपने आने वाले वंशजों को “महाराणा” शब्द देकर उन्हें इतिहास बोध भी कराया।
खोई हुई सत्ता को फिर से प्राप्त करने की भारत के हिंदू राजाओं की वंश परंपरा में यह बहुत बड़ी घटना थी। इतिहासकारों ने भारत के इन वीरों के साथ अन्याय करते हुए इस प्रकार की घटनाओं को अधिक महत्व नहीं दिया है। यद्यपि हुमायूं जैसे व्यक्ति के द्वारा अपने खोए हुए साम्राज्य को फिर से प्राप्त करने की घटना को बहुत अधिक महिमामंडित करके दिखाया गया है।
शासन सत्ता संभालते ही महाराणा हमीर सिंह को अपनी चित्तौड़ को लेने की चिंता सवार हो गई थी। उन्हें इतिहास बोध भी था और राष्ट्र बोध भी था। महाराणा जानते थे कि भारत के प्राचीन वैदिक राष्ट्रवाद में क्षत्रिय का क्या धर्म होता है ? वह जानते थे कि चाहे मेरे सिर पर ताज सज रहा है, पर चारों ओर शत्रु का साज भी सज रहा है। जिस महाराणा को इतिहास बोध भी हो और राष्ट्र बोध भी हो , वह आती-जाती हुई हवाओं के झोंकों से निकलने वाले शब्दों को भी सुनता था, प्रत्येक दिन उदित होने वाले सूर्य के संदेश को भी सुनता था और सूर्यास्त क्या कह कर गया है ? यह भी जानता था। वह फिजाओं में पैदा हुई ललकार को भी सुनता था, राष्ट्र की पुकार को भी सुनता था और स्वर्गवासी हो गए अपने दादा राणा रतन सिंह की हुंकार को भी सुनता था।

कान खोल सुनता रहा हृदय की आवाज।
लेने हित चित्तौड़ को सजा रहा था साज ।।

ऐसी परिस्थितियों में अब महाराणा चित्तौड़ को फिर से प्राप्त करने की योजनाओं में लग गये। हमीर सिंह भली प्रकार जानते थे कि अलाउद्दीन खिलजी ने मालदेव नामक जिस व्यक्ति को उसके पूर्वजों की राजधानी चित्तौड़गढ़ का कार्यभार सौंपा है, वह कितनी बड़ी सुल्तानी सेना के साथ चित्तौड़ में रहता है? महाराणा को यह भी भली प्रकार ज्ञात था कि इस मालदेव नाम के शत्रु के विनाश के लिए उन्हें कितने बड़े स्तर पर तैयारी करनी होगी ? अपनी कार्य योजना को आगे बढ़ाने में महाराणा के सामने सबसे बड़ी समस्या धन शक्ति और सैन्य शक्ति के अभाव की थी। निश्चित रूप से इस महान लक्ष्य की प्राप्ति के लिए धन शक्ति और सैन्य शक्ति दोनों ही अनिवार्य है।

चित्तौड़ लेने की तैयारी

फलस्वरूप अपने इस लक्ष्य की प्राप्ति के लिए महाराणा हमीर सिंह ने सबसे पहले छोटे-छोटे दुर्गों को जीतना आरंभ किया। निश्चित रूप से छोटे-छोटे दुर्गों को जीतने से महाराणा की शक्ति में वृद्धि होने लगी। उन्हें कुछ सीमा तक धनशक्ति और सैन्य शक्ति की प्राप्ति भी होने लगी। इससे महाराणा के सैनिकों का मनोबल व उत्साह दिन प्रतिदिन बढ़ता जा रहा था। धीरे – धीरे महाराणा का वह सपना एक नया स्वरूप लेने लगा, जिसमें वह मिट्टी में मिले अपने राज्य को ढूंढने का प्रयास कर रहे थे। यह सचमुच बहुत बड़ा पुरुषार्थ होता है कि मिट्टी में खो गए राज्य को फिर से स्थापित किया जाए।
संसार के इतिहास के ऐसे बहुत कम शासक हैं जिन्होंने मिट्टी में मिल गए अपने राज्य को फिर से स्थापित करने में सफलता प्राप्त की है। हमारे इतिहास में भारतीय धर्म और संस्कृति के भक्षक हुमायूं के द्वारा किए गए ऐसे उस कार्य को तो महिमामंडित किया गया है, जब उसने शेरशाह सूरी के उत्तराधिकारियों से अपने साम्राज्य को प्राप्त करने में सफलता प्राप्त की थी ,पर महाराणा हमीर सिंह के ऐसे प्रयास का कहीं अभिनंदन नहीं किया गया, जिसने इस देश के धर्म और संस्कृति की रक्षा के लिए ऐसा महान कार्य संपादित किया था।
महाराणा हमीर सिंह ने बहुत ही बुद्धिमत्ता का परिचय देते हुए अपनी प्रजा का विश्वास जीतने का भी प्रशंसनीय प्रयास किया। यद्यपि उनकी प्रजा पहले से ही उनके साथ थी परंतु इसके उपरांत भी उन्होंने एक बहुत ही दूर दृष्टि वाला निर्णय लिया। महाराणा ने अपने राज्य मेवाड़ में यह घोषणा करवा दी थी कि जो लोग उन्हें अपना शासक मानते हैं, वे अरावली पर्वत के पश्चिमी भाग पर आ जाएं । यदि कोई नहीं आएगा तो उसे मेवाड़ राज्य का शत्रु माना जाएगा।

मेवाड़ में बिखर गई थी सर्वत्र क्रांति

महाराणा के इस प्रकार के निर्णय में न केवल उनकी दूरदृष्टि झलकती थी बल्कि उनका कूटनीतिक कौशल भी झलकता था। उनकी प्रजा तो पहले से ही उनके साथ थी। पर जब प्रजा उनके साथ लगने के लिए एक स्थान विशेष पर एकत्रित होगी तो इसका संदेश निश्चित रूप से तत्कालीन मुस्लिम सत्ता तक जाएगा। जिससे मुस्लिम सत्ता को मनोवैज्ञानिक दबाव में लिया जा सकेगा। महाराणा हमीर सिंह के इस निर्णय का मेवाड़ की स्वाधीनता प्रेमी प्रजा पर बड़ा सकारात्मक प्रभाव पड़ा। महाराणा के आदेश को शिरोधार्य कर मेवाड़ के अधिकांश प्रजाजन अपने घर बार को छोड़कर उनके द्वारा निर्दिष्ट स्थान पर आकर एकत्रित हो गए। फलस्वरूप मेवाड़ के नगरों और ग्रामों में सन्नाटा पसर गया। अब हमीर सिंह ने एक ओर से उन सुनसान नगर ग्रामों को उजाड़ना आरंभ किया। जो भी शत्रु पक्ष का व्यक्ति सामने आता महाराणा के सैनिकों के द्वारा उसी को समाप्त कर दिया जाता था। 

वास्तव में उस समय मेवाड़ और मेवाड़ के लोग राष्ट्रभक्ति से सराबोर थे और एक नया इतिहास लिखने के लिए क्रांति कर रहे थे। इस प्रकार की क्रांति वेद के उस संदेश को साकार करने के लिए की जा रही थी जिसमें कहा गया है कि ‘मा स्तेन ईशत:’ अर्थात चोर और भ्रष्ट लोग हमारे शासक नहीं होने चाहिए।” उस समय चोर और भ्रष्ट लोग सत्ता पर काबिज हो गए थे। जिनके विरुद्ध बिगुल फूंककर उन्हें सत्ता से दूर फेंक देना मेवाड़ की संस्कृति प्रेमी जनता ने अपना राष्ट्रीय कर्तव्य माना। यही कारण है कि हम देश के किसी भी होने में होने वाले ऐसे आंदोलनों को को संस्कृति की रक्षा के लिए किए गए आंदोलन या क्रांति मानते हैं। क्रांति की इस पवित्र भावना से मेवाड़ में सर्वत्र क्रांति की छटा बिखर गई थी।

बिखर गई अनमोल सी एक छटा चहुंओर।
अंधियारा छंटने लगा, होने को थी भोर।।

 मेवाड़ प्राप्ति के महाराणा के इस अभियान से सारी मेवाड़ में देशभक्ति का अप्रतिम परिवेश सृजित हो गया था। लोग देशभक्ति के भावों से सराबोर हो उठे थे। अपने वर्तमान महाराणा के साथ-साथ उन्हें अपने महाराणा अजय सिंह और महाराणा रतन सिंह सहित पूर्व के महाराणाओं और उनके बलिदानों और शौर्य से भरी गाथाओं का रह-रहकर स्मरण हो रहा था। महाराणा अजय सिंह के इस विशेष देशभक्ति पूर्ण अभियान के फलस्वरूप जब दिल्ली तक यह समाचार पहुंचे तो दिल्ली का सिंहासन डोलने लगा था। उस समय अलाउद्दीन खिलजी का शासन समाप्त होकर एक नए राजवंश अर्थात तुगलक वंश का प्रादुर्भाव हो चुका था। इस नये मुस्लिम राजवंश के लिए सिर मुंडाते ही ओले पड़ गए थे। एक नई चुनौती अपने भयंकर स्वरूप में देशभक्ति का अप्रतिम स्वरूप लिए उनके समक्ष खड़ी थी। 

डॉ राकेश कुमार आर्य
संपादक : उगता भारत

(हमारी यह लेख माला आप आर्य संदेश यूट्यूब चैनल और “जियो” पर शाम 8:00 बजे और सुबह 9:00 बजे प्रति दिन रविवार को छोड़कर सुन सकते हैं।)

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