गीता के दूसरे अध्याय का सार और संसार

गीता यह भी स्पष्ट करती है कि ”हे कौन्तेय! पुरूष चाहे कितना ही यत्न करे, कितना ही विवेकशील हो-ये मथ डालने वाली इन्द्रियां बल पूर्वक मन को विषयों की ओर खींच लेती हैं। मन विषयों के पीछे भागता है और इस प्रकार भागता हुआ एक दिन मनुष्य को मार लेता है।” इसलिए मन के लिए वेद ने शयनकालीन मन्त्रों की व्यवस्था की है। जिनमें हम प्रभु से मन के शिवसंकल्पों वाला बनने की प्रार्थना करते हैं। मन के यदि संकल्प शिव हो जाएं, अर्थात कल्याणकारी हो जाएं और सबका भला चाहने वाले व सबका भला करने वाले हो जाएं तो संसार का रागद्वेष का सारा व्यापार ही समाप्त हो जाएगा।
श्री कृष्णजी कहते हैं कि जितेन्द्रिय होने की कामना करने वाले को मुझमें (श्री कृष्णजी अत्यन्त ऊंची बात कह रहे हैं, ऊंचा ज्ञान दे रहे हैं। अत: वे ध्यानावस्था में जाकर ईश्वर की ओर से कहने लगे हैं) कि तुझे मुझमें अर्थात ईश्वर में रम-रमकर बैठना चाहिए। जो लोग संसार समर में रहते हुए ईश्वर में रमे रहते हैं उनके सभी मनोरथ और मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं।
ईश्वर से करो दोस्ती यही करेगी पार।
मनोरथ सारे पूर्ण करे जग का तारणहार।।
गीता का तीसरा अध्याय
संग, कामना और क्रोध की उत्पत्ति
गीता के तीसरे अध्याय में योगेश्वर श्रीकृष्णजी अर्जुन को समझाते हुए कहते हैं कि -हे पार्थ! जो व्यक्ति इंद्रियों के विषयों का ध्यान करने का अभ्यासी हो जाता है, अर्थात उठते बैठते उन्हीं का ध्यान करता रहता है, उसके ऐसा करते रहने से संग की उत्पत्ति होती है। यह संग जब पक जाता है अर्थात जब छूटने का नाम ही नहीं लेता-भीतर जमकर और रमकर बैठ जाता है तब ‘कामना’ पैदा होती है। जिससे व्यक्ति उक्त विषय को प्राप्त करने की लालसा करने लगता है और प्राप्ति के लिए सचेष्ट भी हो उठता है। जब कामना की पूत्र्ति में कोई बाधा आती है तब क्रोध का जन्म होता है।
श्रीकृष्ण जी ने मानव के पतन को रोकने के लिए बड़ा अच्छा संकेत दिया है। उनके अनुसार पतन से बचने के लिए मनुष्य को इन्द्रियों के विषयों के ध्यान से बचना चाहिए। गीताकार श्रीकृष्णजी से आगे चलकर और भी पते की बात कहलवाता है। श्रीकृष्णजी आगे कहते हैं कि क्रोध से अत्यन्त मूढ़ भाव की उत्पत्ति होती है। क्रोध विवेकशक्ति और स्मृति शक्ति का नाश करता है, जिससे हमारे भीतर मूढ़ता के गहन अन्धकार की अवस्था छा जाती है।
भावार्थ है कि उस अवस्था में हम जो कुछ भी कर रहे होते हैं-उसके परिणाम पर विचार करने की हमारी शक्ति नष्ट हो जाती है। इस प्रकार की स्थिति में अर्थात मूढभाव स्मृति में भ्रम उत्पन्न हो जाता है। जिससे बुद्घिनाश होता है और जिस व्यक्ति की बुद्घि नष्ट हो जाती है उसका सब कुछ ही नष्ट हो जाता है अर्थात वह व्यक्ति स्वयं भी नष्ट हो जाता है। हम व्यवहार में देखते हैं कि जब व्यक्ति पतन की राह पर चलता है तो उसका मार्ग यही होता है जो श्रीकृष्णजी के द्वारा यहां बताया जा रहा है। लोक में समझदार लोग आज भी उल्टे सीधे और लोकविरूद्घ काम करने वाले व्यक्ति को देखकर अक्सर उसे यह कहकर ही टोकते हैं कि-‘तेरी बुद्घि तो खराब नहीं हो गयी है?’ इस कथन का अभिप्राय है कि यदि बुद्घि खराब हो गयी हो तो फिर ऐसे व्यक्ति को ठीक करने का कोई उपाय नहीं है।
आज के संसार की पतनोन्मुखी अवस्था का यही कारण है कि सर्वत्र विषयों का चिन्तन और ध्यान चल रहा है, जिससे बुद्घि स्थिर न होकर चलायमान है, खराब है और लोग अपने जीवन को नष्ट करते जा रहे हैं। श्रीकृष्ण जी का यहां यह उपदेश है कि यदि जीवन में उन्नति चाहते हो तो बुद्घि को स्थिर रखना सीखो। अभ्यास बनाओ कि विषयों का संग छूटे और मन को हम अपने वश में करने के अभ्यासी बन जाएं। संसार के बहुत से विवादों का निपटारा श्रीकृष्णजी के इसी उपदेश से हो जाएगा।
आज की शिक्षा नीति को वैश्विक स्तर पर एक समान बनाने की आवश्यकता है। इस प्रकार की एक समान शिक्षा नीति में मानव के उत्थान और पतन के विषय में बच्चों के मस्तिष्क में बचपन से ही उन मानवीय मूल्यों को स्पष्टत: अंकित करने की आवश्यकता है जिन्हें अपनाकर बच्चे अपने उत्थान के मार्ग को पहचान सकें। आज की शिक्षा नीतियां समस्त विश्व में ही कुछ इस प्रकार की हैं कि वे बच्चों को विषयों की आग से बचने के स्थान पर उसमें झोंकती सी नजर आती हैं। जिससे पढ़ा-लिखा व्यक्ति भी भीतर ही भीतर विषयों की आग से जल रहा है। उसकी बुद्घि नष्ट हो रही है, जिससे वह स्वयं भी तिल-तिलकर मर रहा है।
श्रीकृष्णजी आगे कहते हैं कि जो व्यक्ति राग द्वेष नाम के दो शत्रुओं से स्वयं को बचाकर अपनी इन्द्रियों को अपने वश में करने का अभ्यासी हो जाता है और अपने अन्त:करण को अत्यन्त पवित्र और निर्मल बनाये रखने की साधना करते-करते उसे विशेष प्रकार का बना लेता है और इस प्रकार के अन्त:करण का स्वामी होकर संसार में विचरता है-वह सदा प्रसन्नता को प्राप्त रहता है।
श्रीकृष्ण जी कह रहे हैं कि अन्त:करण को विशेष प्रकार का बनाने की साधना को अर्थात इन्द्रियों को वश में करने की साधना को संसार विजय की कामना करने वाले प्रत्येक व्यक्ति को अपनाकर चलना चाहिए। यही वह चाबी है जो संसार के स्वैर्गिक खजाने को हमारे सामने लाकर खोलकर रख देती है। जिन-जिन लोगों के या साधकों के पास यह चाबी रही है-उन-उन लोगों ने इस स्वैर्गिक खजाने की पूंजी का जमकर उपभोग किया है। खूब आनन्द लिया है-इस खजाने का। ऐसे लोग ही वास्तविक अर्थों में ईमानदार कहे जाते हैं। इस ईमानदारी को कृष्णजी हर व्यक्ति के भीतर रचा- बसा देना चाहते हैं। तभी तो वह कहते हैं कि जब मनुष्य प्रसन्नता में और प्रसाद के भाव में रहने लगता है तब उसके सब दु:ख दूर हो जाते हैं। जिसके हिये में अर्थात चित्त में प्रसन्नता आ जाती है, उसकी बुद्घि शीघ्र ही स्थिर हो जाती है। आजकल अधिकांश लोग हमें बीमार से और कहीं किसी अदृश्य संसार में उलझे हुए से दिखायी देते हैं इसका कारण केवल एक ही है कि उनके भीतर का हंस रोता रहता है, उनके हिये में प्रसन्नता का भाव नहीं है, उनका मन का मोर मरा पड़ा है। श्रीकृष्णजी इसी मन के मोर को सदा नृत्य कराते रहने की प्रेरणा दे रहे हैं कि भीतर के हिये में सदा संगीत बजता रहना चाहिए। वहां ऐसी स्वर लहरियां चलती रहनी चाहिएं कि हम सदा प्रसन्नता का अनुभव करते रहें। उन स्वर लहरियों पर झूमते रहें, नाचते रहें और अपने सांसारिक कार्यों का निर्वाह भी करते रहें। जीवन एक बहुत बड़ी बाजी है जो मौत के जुए पर रखी जाती है। इस बाजी को वही जीत सकता है जिसके मन में प्रसन्नता का भाव है। जिसका चित्त उत्साह से भरा है, सकारात्मक ऊर्जा से भरा है। जो इस बाजी को हार जाता है-वह जीवन की जंग को हार जाता है। इसीलिए कृष्णजी की बात को लोग इस प्रकार कहने लगे हैं कि ‘मन के हारे हार है और मनके जीते जीत।’
कृष्णजी कहते हैं कि जो व्यक्ति ‘ब्रह्म’ के साथ युक्त अर्थात जुड़ा हुआ नहीं है, उसमें स्थिर बुद्घि नहीं होती जो व्यक्ति ब्रह्म के साथ जुड़ा हुआ नहीं है, उसमें भावना भी नहीं होती। जिसमें भावना नहीं होती उसमें शान्ति नहीं होती और जिसे शान्ति नहीं उसे सुख भी नहीं होता।

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