सं न्यासी जीवन का भारतीय संस्कृति में विशेष सम्मान और महत्व है। हमारे पूर्वजों ने संन्यास आश्रम की स्थापना इस उद्देश्य से की थी कि जीवनभर की आध्यात्मिक कमाई को और अनुभवजन्य ज्ञान को व्यक्ति इस आश्रम में जाकर लोकहित में बिना कोई मूल्य लिये समाज को बांटेगा, कोई लेने भी नहीं आएगा तो उसके घर अतिथि बनकर पहुंचेगा और उसे उसके घर जाकर देगा। हमारे विद्वानों ने इस कमाई को ही ऐसी कमाई माना जो बांटने से घटती नहीं है, अपितु जितना बांटोगे उतना बढ़ती जाएगी। यही कारण रहा कि गुरू ने अपनी कमाई को किसी को देना नि:शुल्क रखा। उसने लोगों में श्रद्घा उत्पन्न की और श्रद्घा का मोल लिये बिना उनका कल्याण वैसे ही कर दिया जैसे हमारे वीर सैनिक गर्दन का मोल लिए बिना देश का कल्याण करते रहते हैं। इस पवित्र व्यवस्था की बराबरी संसार में कहीं किसी देश में नहीं है।
समय का फेर देखिये कि आज संन्यास में हर प्रकार का कूड़ा कबाड़ घुसने लगा है। संन्यास को व्यवसाय बना लिया गया है। लोगों की आस्था का और श्रद्घा का ‘झूठा सौदा’ किया जा रहा है। आश्रम ‘सच्चा सौदा’ के नाम से खुल रहे हैं तो काम ‘झूठे सौदा’ का किया जा रहा है। श्रद्घा का मूल्य मांगा जा रहा है और एक ऐसा व्यक्ति जो एक बच्चे का पिता होने की भी पात्रता नहीं रखता है-वह करोड़ों अनुयायी पैदा करके अपने पिता की अवस्था के लोगों का भी पिता बन गया है। अपने आप को ‘परमात्मा’ कहलवाता है और करोड़ों लोगों की आस्था से खिलवाड़ करता है। अपनी बेटियों के साथ जो कुछ भी वह करता रहा अब उस पर भी अधिक लिखने की आवश्यकता नहीं है।
राम रहीम ने अपने अनुयायियों और इस देश की संस्कृति के साथ यही सब तो किया है। उसके अनुयायियों के लिए आवश्यक था कि वे 11 रूपया प्रतिदिन अपने गुरूजी की सेवा के लिए अपनी कमाई में से निकालेंगे। बताने वालों की बात में अतिश्योक्ति हो सकती है तो इसे घटाकर 1 रूपया कर लिया जाए तो भी प्रतिदिन 5 करोड़ अनुयायियों से राम रहीम को 5 करोड़ रूपया मिलते थे। इसे भी कम कर लो तो दो करोड़ मान लीजिए। अब जिस व्यक्ति को दो करोड़ रूपया प्रतिदिन ऐसे ही बैठे बिठाये मिल रहा हो तो बहनों का शील उसके आश्रम में नहीं लुटेगा तो कहां लुटेगा? ऐसे राक्षसी संस्कारों के व्यक्तियों को महिमामंडित करने में तब क्या ये सारा समाज दोषी नहीं है? निश्चित रूप से है।
स्वार्थी और लालची लोगों ने अपनी दुकानदारी चमकाने के लिए रातों-रात अध्यात्म के महल खड़े कर लिये और उन महलों को आश्रम का नाम देकर लोगों को भ्रमित किया। इस कार्य में ऐसे व्यक्तियों के कुछ लोग ही प्रारंभ में साथी होते हैं। ये साथी लोग भी स्वार्थी होते हैं। ये सारे स्वार्थी मिलकर अपने अध्यात्म के उद्योग की रूपरेखा वैसे ही बनाते हैं जैसे किसी बड़ी कंपनी की स्थापना से पहले उसके डायरेक्टर्स और निवेषक योजना बनाते हैं या जैसे किसी राजनीतिक पार्टी की स्थापना से पहले धन-पद प्राप्त करने वाले स्वार्थी नेता मिलकर एक साथ बैठते हैं और ‘जनहित’ में एक नई पार्टी को जन्म दे डालते हैं। बहुदलीय व्यवस्था के दुष्परिणामों को झेल रहा यह देश तब मन मसोसकर रह जाता है जब उसे ‘जनहित’ में एक और पार्टी दे दी जाती है। इसी प्रकार मानवता को तार-तारकर कर चुकेे आधुनिक बाबाओं की करतूतों से पहले से ही दु:खी देश की आत्मा उस समय और भी कराह उठती है-जब ‘इंसां’ बनाने के नाम पर उसे एक और ‘राम रहीम’ मिल जाता है। कोई नहीं सोचता कि आध्यात्मिक विज्ञान का अंतिम उद्देश्य तो मनुष्य को मनुष्य बनाकर उसे ऋषि और देव बनाने का है। अध्यात्म किसी व्यक्ति को एक साथ ‘गुरमीत’ (सिख) ‘राम’ (हिन्दू) ‘रहीम’ (मुस्लिम) नहीं बना सकता। अध्यात्म तो इन पहचानों को मिटाने का नाम है। वहां जाकर इनका उपद्रव शान्त हो जाता है। उस दरबार में केवल मानवतावाद रह जाता है। पर राम रहीम ने अपना यह नाम ही लोगों का मूर्ख बनाने के लिए रख लिया था। आश्चर्य की बात है कि वह सवा अरब की आबादी के देश का मूर्ख बनाने में सफल रहा। ना तो कानून जागा न कानून वाले जागे और न ही राजनीति या मीडिया जागी। सबके सब सोते रहे और एक गुफा में बहनों के शील भंग एक नरपिशाच के माध्यम से होते रहे। किसी शायर ने क्या सुंदर लिखा है-
खुदा के बन्दों को देखकर ही खुदा से, मुनकिर हुई है दुनिया।
कि ऐसे बन्दे हैं जिस खुदा के वह, कोई अच्छा खुदा नहीं है।।
यहां पीरों पर चादरें चढ़ती हैं, मंदिरों में सोने के कलश चढ़ते हैं। पर ये चादरें और सोने के कलश जाते कहां हैं और आते कहां से है? ये कोई नहीं सोचता। क्या खुदा सदा ही चादरों के लिए लालायित रहता है या भगवान को सदा सोने की ही इच्छा बनी रहती है?-हम ये सोचते ही नहीं। कभी मंदिरों में सोने का कलश देना या बड़ी दानराशि देना गरीबों के कल्याणार्थ-हुआ करता था। वहां बैठे संत महन्तों पर धनी सेठ लोग विश्वास किया करते थे कि यदि हम यहां कुछ दे जाएंगे तो वह सही प्रकार लोगों के कल्याण के कार्यों में लग जाएगा। हमारे संत-महात्मा लोग लोगों के उस विश्वास पर खरे भी उतरते थे और वे उस राशि को लोक कल्याण में ही लगा दिया करते थे। उनके इस कार्य को राजा लोग भी समझा करते थे कि यहां से जो कुछ भी होगा वह राष्ट्र कल्याण के लिए ही होगा-अत: वे मंदिरों पर कोई कर नहीं लगाते थे। ऐसी व्यवस्था सर्वोत्तम थी। मंदिरों में आज भी ऐसे संत महात्मा रहते है जो दान की धनराशि को तुरंत लोगों में ही वितरित कर देते हैं। वे उसे बचाकर नहीं रखते। ना ही उसका लोभ करते हैं। वे राष्ट्र कार्यों में उस धनराशि का प्रयोग करते हैं। ऐसे अपवादों को हमें नमन भी करना चाहिए।
पर बात तो रामरहीम जैसों की है। जिनके चरित्र दोगले हैं। ये लोग अपने धन से लोककल्याण का कोई कार्य नही करते। यदि ये लोग वास्तव में अपने अनुयायियों को मानवतावाद और राष्ट्रवाद को अन्योन्याश्रित रूप में समझाकर उन्हें यह बतायें कि राष्ट्रकल्याण के लिए बढ़ चढक़र सहयोग करें और सरकार को दान देकर सडक़ों के निर्माण में, नये विद्यालयों की स्थापना में या चिकित्सालयों की स्थापना में या किसी निर्धन की पुत्री का विवाहादि कराने में खुलकर सहयोग करो तो हमारा मानना है कि देश की सभी ज्वलंत समस्याओं का समाधान मात्र दस वर्ष में हो जाएगा।
यदि राम रहीम अपने धन का सदुपयोग चारों तीर्थधामों को जोडऩे वाली सडक़ परियोजना पर व्यय कर देते या ऐसा करने में सरकार के सामने प्रस्ताव रखते कि आप एक ऐसी परियोजना बनाओ और हम उसमें आपको सहयोग करेंगे, साथ ही अपने अनुयायियों को भी इस कार्य के लिए प्रेरित करते तो यह राष्ट्रसेवा भी होती, धर्म सेवा भी होती और जनसेवा भी होती।
हमारे विवेक में यह बात होनी चाहिए कि आजादी से पूर्व इस देश की कुल 563 रियासतें थीं, जिनके राजा को कर देने वाली जनसंख्या औसतन मात्र सवा छह लाख थी।
यह जनसंख्या औसत रूप में एक रियासत की यदि मान ली जाए तो इसमें भी कर देने वाले लोग तो और भी कम थे। राजा को जितना भी कर मिलता था उसे वह जनहित में व्यय करता था, सेना के रख-रखाव पर व्यय करता था। अब यदि एक राजा को प्रतिदिन सवा छह लाख लोगों में से एक लाख व्यक्ति भी 1 रूपया देते हैं तो उसे एक लाख रूपया प्रतिदिन की आय होगी, उसे भी यह अनिवार्यत: जनता के लिए व्यय करता था। पर आज के ‘राजा रामरहीम’ को तो जनहित की भी चिंता नहीं थी। कोई सडक़ नहीं बनानी, कोई विद्यालय नहीं खोलना, कोई रोजगार नहीं देना। जो भी माल आ गया वह अपना हो गया। निश्चय ही ऐसे अपराधों को राष्ट्रद्रोह माना जाना चाहिए। यह तब और भी आवश्यक हो जाता है जब इस धन का दुरूपयोग आतंक जैसी गतिविधियों के लिए किये जाने के प्रमाण सामने आ रहे हों। ऐसा प्रबंध होना चाहिए कि ऐसे लोग भविष्य में लोगों की भावनाओं से खिलवाड़ न कर पायें। राम रहीम जैसे लोगों के लिए है-
मेरे अतराफ में पानी तो बहुत है लेकिन, अब मुझे प्यास का अहसास नहीं होता।
गेरूवे कपड़ों पा न इतरा जोगी, सिर्फ कपड़ों से संन्यास नहीं होता।।

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