गीता का तीसरा अध्याय और विश्व समाज

हमने पाकिस्तान के विरूद्घ भारत के प्रधानमंत्री मोदी को ‘सर्जिकल स्ट्राईक’ करते देखा। संयुक्त राष्ट्र में अपनी विदेश मंत्री श्रीमती सुषमा स्वराज को पाकिस्तान की बखिया उधेड़ते हुए देखा-ऐसे हर अवसर पर देश में भावनात्मक एकता का परिवेश बना, लोगों में सांस्कृतिक और सांगठनिक एकता का भाव बना। जिससे पता चलता है कि योगीराज श्रीकृष्णजी अर्जुन को उस समय एक व्यावहारिक ज्ञान दे रहे थे-जब वे बता रहे थे कि तुझे लोगों में सांगठनिक एकता बनाये रखने के लिए भी युद्घ करना चाहिए। यदि श्री मोदी और श्रीमती सुषमा स्वराज पाकिस्तान के सामने घिघियाने लगते या अपनी बात को सही प्रकार से नहीं कह पाते तो देश में निराशा का माहौल बनता। बात स्पष्ट है कि ‘राजा’ का उत्साहित रहना राष्ट्र को उत्साहित करता है, सेना के सेनापति का उत्साह सेना में और लोगों में उत्साह का संचार किये रखता है।
राजा का उत्साह ही करे राष्ट्र कल्याण।
राजा का नैराश्य ही हरे राष्ट्र के प्राण।।
इसी बात को आगे बढ़ाते हुए श्रीकृष्णजी कह रहे हैं कि श्रेष्ठ मनुष्य जो कुछ करता है, उसी का अनुकरण इतरजन अर्थात साधारण लोग भी करते हैं। अत: हे पार्थ! तुझे अपने लोगों के लिए आदर्श स्थापित करना चाहिए, जिससे वे तेरे द्वारा स्थापित किये गये आदर्श का अनुकरण कर सकें, और तुझे अपना पथप्रदर्शक मान कर तेरे द्वारा दिखाये गये मार्ग को अपना सकें।
राजा अपने देशवासियों के लिए और अपनी प्रजा के लिए सदा आदर्श होता है। इसीलिए चाणक्य जैसे विद्वान ने कहा है कि यथा राजा यथा प्रजा। राजा देशभक्त हो, पराक्रमी हो, वीर और साहसी हो, ईश्वरभक्त हो, प्रजावत्सल हो तो उसके ये दिव्य गुण उसकी प्रजा का भी मार्गदर्शन करने लगते हैं और प्रजा के भीतर भी ऐसे गुण स्वाभाविक रूप से आ जाते हैं। दुर्योधन यदि राजा बनता है तो उसके दुर्गुणों का प्रभाव देश की जनता पर अवश्य पड़ेगा, और उस समय देश के लोग पथभ्रष्ट हो जाएंगे, क्योंकि देश का राजा पथभ्रष्ट होगा। अत: अर्जुन को ऐसे पथभ्रष्ट व्यक्ति के लिए स्वयं ही राजा बनने का मार्ग प्रशस्त करना उचित नहीं।
श्रीकृष्णजी कहते हैं कि यद्यपि त्रिलोक में मेरे लिए ऐसा कोई कर्म नहीं है जो मेरे लिए किया जाना आवश्यक हो और न कोई ऐसा पदार्थ है जो प्राप्त होना चाहिए पर मुझे प्राप्त न हो, परन्तु इसके उपरान्त भी मैं कर्म में लगा रहता हूं। इसलिए तू भी कर्म से भागे मत, कर्म कर और अपने कर्मयोगी होने का प्रमाण संसार को दे।
संसार के सारे निकम्मे लोगों के लिए गीता का यह उपदेश बहुत ही उपयोगी है। बहुत से लोग अपने उद्देश्य में असफल इसलिए हो जाते हैं कि वे कर्म को लात मार देते हैं। उनके सपने तो ऊंचे होते हैं-पर कर्म की पवित्रता भंग हो जाती है या पूर्णत: निष्क्रियता उन्हें आ घेरती है। श्रीकृष्ण जी ऐसे निष्क्रिय लोगों को भी अर्जुन के माध्यम से साथ-साथ ही कह रहे हैं कि हे संसार के लोगों! अपने कर्मयोगी बने होने का प्रमाण पत्र लोगों को दो इससे तुम्हें सम्मान मिलेगा।
आतंकवाद और गीता
गीता के तीसरे अध्याय में ही श्रीकृष्णजी कहते हैं कि यदि मैं अपने कार्यों को यज्ञीय भाव से किये गये कर्म=पूर्ण सावधानी के साथ सम्पादित न करूं तो हे पार्थ! सब लोग कर्म करना ही छोड़ दें। आशय है कि ऐसी स्थिति में संसार की यज्ञीय भावना समाप्त हो जाएगी। जिससे यह सृष्टि चक्र की भूमिसात हो जाएगा। आजकल कर्म के पीछे की यज्ञीय भावना ही मर रही है, जिससे संसार तीसरे महायुद्घ की विभीषिकाओं में झुलसने की तैयारी करता जान पड़ रहा है।
श्रीकृष्णजी कहते हैं कि मैं लोक नष्ट कराने का पाप अपने ऊपर नहीं लेना चाहता, इसलिए कर्मयोगी बना रहकर अपने धर्म का और अपने कर्म का पालन करता रहता हूं। मैं नहीं चाहता कि संसार में किसी प्रकार की अव्यवस्था को फैलाने वाला मैं बनूं। आज के संसार के बड़े देशों ने संसार के अपने शत्रु देशों को नीचा दिखाने के लिए ओसामा बिन लादेन जैसे आतंकवादी या आतंकवादी संगठन खड़े किये अर्थात संसार में अव्यवस्था फैलाई और आज जब उनके घर तक आग पहुंच गयी है तो वे ही आतंकवाद को बुरा मान रहे हैं। वही लादेन जैसे आतंकवादियों को अब पकड़-पकडक़र मार रहे हैं। कृष्णजी का मानना है कि ‘राजा’ या प्रमुख व्यक्तियों को संसार में अपनी जिम्मेदारी बड़ी सावधानी से निभानी चाहिए। कर्म तो किया जाए-पर अनासक्ति भाव से किया जाए। संसार के जिम्मेदार लोग अपनी जिम्मेदारी समझें और किसी भी राष्ट्र को नीचा दिखाने के लिए अनीतिपरक उपायों को न अपनायें। यदि अनीति परक उपाय कहीं अपनाये भी जा रहे हैं तो उन्हें नीति परक लोग समाप्त कराने के लिए एक हो जाएं।
अर्जुन के लिए कृष्णजी का उपदेश है कि दुर्योधन की अनीति परक बातों का नाश करने का जब समय आया है तो तू इससे परे मत हट, अपितु संसार में व्यवस्था बनाये रखने के लिए निज धर्म को पहचान। अपनी भूमिका को जान और समझकर तदनुरूप आचरण कर। हे भरतवंशी अर्जुन! जिस प्रकार अज्ञानी लोग कर्म में आसक्त होकर अपने सारे कार्यों का निष्पादन करते रहते हैं-उसी प्रकार ज्ञानी लोगों को चाहिए कि लोकसंग्रह अर्थात लोगों को इकट्ठा बनाये रखने की इच्छा से कर्म में अनासक्त होकर कर्म करे।
तीसरे अध्याय के 25वें श्लोक में श्रीकृष्णजी यह बात कह रहे हैं। इसका अभिप्राय समझना बड़ा आवश्यक है। श्रीकृष्ण जी कह रहे हैं कि विश्व में सज्जन शक्ति का संगठनीकरण आवश्यक है। दुष्टों का संगठनीकरण इसलिए हुआ दीखता है कि उनका कोई नायक होता है-जैसे हर डाकू दल का कोई नायक होता है। सरगना होता है। पर सज्जनों का कोई नायक नहीं होता, वे ऐसे ही रहते हैं बिना नायक के। इसलिए उन्हें मुट्ठी भर लोग परेशान करते हैं, गाजर, मूली की भांति उनका संहार करते हैं। आज के विश्व में आतंकी संगठन मुट्ठी भर हैं, और मुट्ठी भर ही उनके अनुयायी हैं, पर उन्होंने विश्व में आतंक मचा रखा है। यह इसलिए है कि सज्जन शक्ति आज भी बिना नायक के है। सारे विश्व के सज्जन लोग इस समय एक ‘महानायक’ की खोज में हैं। ऐसा महानायक जो सबको एक संगठन में ला सके, एक झण्डे के नीचे ला सके और एक विचार के प्रति समर्पित कर सके। श्रीकृष्णजी अर्जुन से कह रहे हैं कि तू विश्व की सज्जनशक्ति का नायक बनकर आतंकवादियों का नाश कर। विश्व सज्जन शक्ति का नायक बनकर संहार करना तेरा सबसे बड़ा धर्म है। क्योंकि क्षत्रिय का जन्म दुष्टों का संहार करने के लिए होता है। तू अपने जीवन के इस पवित्रतम कर्म को भूलने का प्रयास मत कर, और मत यह बहाने बना कि अपनों को मारकर मेरे साथ ऐसा हो जाएगा या वैसा हो जाएगा? तेरी विद्वत्ता की या ज्ञानी होने की पता ही तब चलेगी जब तू लोगों में संगठनभाव उत्पन्न करने में सफल हो जाएगा। तेरे लिए उचित है कि तू लोगों को अनासक्ति का पाठ भी न पढ़ा सके तो आसक्त भाव से कर्म करने का ही पाठ पढ़ा, पर उन्हें निकम्मा मत बना। कुल मिलाकर उन्हें धर्मानुसार काम करने की प्रेरणा कर।
क्रमश:

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