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संस्कारों का पतन और कुसंस्कारों का बढ़ावा

डॉ. राधे श्याम द्विवेदी

कहीं हम कुसंस्कार को बढ़ावा तो नहीं दे रहे :-
हमारा देश भारत युवाओं का देश है,किन्तु आज समाज के वर्तमान परिदृश्य को देखा जाए तो हमारे समाज की युवा पीढ़ी संस्कार से विमुख होती जा रही है। समाज के लगभग तीन चौथाई युवा कुसंस्कार नाम के रोग से ग्रसित होते जा रहे हैं । संस्कार ही हमारे जीवन का सबसे बड़ा श्रृंगार और लक्ष्य होता है। जब कि कुसंस्कार हमारे जीवन मे कालिमा के समान होता है।
विचार करने वाली बात यह है कि , क्या यह कुसंस्कार या फिर सुसंस्कार मनुष्य के भीतर जन्म से ही प्राप्त होती है?
जी नही ! कोई भी बालक जन्म से संस्कार रहित होता है। किसी बालक के भीतर गुण – अवगुण,अच्छाई-बुराई के चिन्ह भी कहीं अंकित नही होता है ।
तो क्या ? हमने कभी विचार किया जब बालक के अंदर जन्म से अच्छाई – बुराई तथा गुण या दोष नही होते तो फिर यह कहाँ से प्राप्त होते है? किसी भी बालक के ह्रदय में यह कुसंस्कार नाम का रोग कहाँ से प्रवेश करता है?
यह एक गहन विचार करने वाली बात है । इसके बारे में यह कहा जा सकता है कि माता -पिता के मुख से जो बात सुनी जाती है वही बात बालक के संस्कार बनती है। जिस प्रकार किसी गांव में स्थित नदी तट या किसी अजूती भूमि पर बार – बार चलने मात्र से पगडंडी बन जाती है। उसी प्रकार माता-पिता की इच्छाएँ , उनके छोटी छोटी बातों को नजरंदाज करने या उन पर समझ बूझ न दिखाना, उन्हें ना डांटना आदि गतिविधियां ही बालक के अंदर संस्कार बनती जाती है। अगर हमारे संतानो में कुसंस्कार या दोष दिखाई पड़ने लगता है,तो प्रत्येक माता-पिता यह देखकर आश्चर्य एवं घोर दुख से भर जाते है । उनका ह्रदय उनसे बार-बार यही प्रश्न करता है, कि उनकी संतानो में यह कुसंस्कार आया कहाँ से ? हालांकि माता-पिता जाने – अनजाने में ही अपने संतान के भीतर कुसंस्कार के बीज बो देते है । जो बाद में उनके संतानो के भीतर ह्रदयरूपी भूमि पर कुसंस्कार का एक वृक्ष बनता जाता है ।
बुरी आदतें कुसंस्कारों का परिणाम:-
मनुष्य की बुरी आदतें मूलतः उसके हृदय में जमे हुए कुसंस्कारों के परिणाम हैं। प्रत्येक अंग का परिचालन आन्तरिक सूचनाओं द्वारा होता है। ये आन्तरिक सूचनाएं कुछ तो स्वयं अपने द्योतन से होती हैं, कुछ दूसरों की विषैली सूचनाओं के कारण होती हैं। परिस्थितियाँ, दूसरे व्यक्तियों के साथ रहन सहन, बोलचाल, विशेष सम्प्रदाय के कारण भी अनेक प्रकार की आदतों का जन्म होता है।
बुरे संस्कारों के कारण जीवन कलुषित :-
अनेक व्यक्ति आज अपने बुरे संस्कारों के कारण कलुषित जीवन व्यतीत कर रहे हैं। वे अपनी आदतों से मजबूर हैं। हमने स्वयं देखा है जेल के कैदियों को तीन आने रोज मिले। इनमें से अधिकाँश व्यक्तियों ने अपने पैसे बीड़ी, पान, सुँघनी, तम्बाकू, चाय, इत्यादि में व्यय कर डाले। कोई भी पौष्टिक तत्व उनके हाथ न लगा। अनेक निम्न श्रेणी के व्यक्ति, मजदूर, मोची, नाई, मेहतर दिन भर भूखे रह कर भी सन्ध्या समय चार-चार आने सिनेमा में फूँक देना अच्छा समझते हैं। इसी प्रकार अनेक कंजूस व्यक्ति अपने तथा अपने बच्चों के स्वास्थ्य, शिक्षा, विकास, मनोरंजन में कुछ भी काम नहीं करते किंतु विवाह, शादी, दहेज, इमारत बनाने में बहुत व्यय कर डालते हैं। धन का ऐसा अपव्यय एक प्रकार की मानसिक दुर्बलता एवं अनेक जन्मों के कुसंस्कारों का द्योतक है।
दूषित संस्कारों से छुटकारे का उपाय :-
वास्तव में मनुष्य का उत्थान तथा पतन उसके मन मंदिर में उत्पन्न होने वाले विचारों से होता है? वहाँ से विकास एवं वहीं से पतन का प्रारंभ होता है। दुर्बलता और शक्ति मानसिक विकास या पतन की दो भिन्न-भिन्न स्थितियाँ हैं। पुनरुत्थान तथा नव निर्माण का कार्य भी हमें यहीं से प्रारंभ करना चाहिए।
उत्तम गुणों को ही विकसित करें :-
मनुष्य के हृदय में सभी उत्तम गुणों के बीज मौजूद हैं। कुछ में ये दूसरों की बनिस्बत अधिक विकसित है। हमें चाहिए कि हममें जो दुर्बलता है, उसके विपरीत वाले गुण को प्रोत्साहन देकर उसे विकसित करे। पुनः-पुनः आत्म- द्योतक से अनायास ही मानव स्वभाव के उत्तम तत्व प्रस्फुटित होकर बढ़ने लगेंगे। जैसे-2 ये विकसित होंगे गन्दी आदतें तथा विषैले संस्कार फीके पड़ते जायेंगे। हमें चाहिए कि हम नवनिर्माण का कार्य अपने आपको भाग्यशाली मानकर आरम्भ करे। हम सोचें कि हम बड़े भाग्यशाली हैं। सुख, समृद्धि, आनन्द, विशुद्ध, जीवन से हमारा निकट सम्बन्ध है। हमारी बुरी आदतों का अन्त हो गया है, शुद्ध विवेक जागृत होने से कुसंस्कार स्वतः दब गये हैं। हम अब केवल भव्य विचार, पवित्र संकल्प, सद्चिन्तन को ही हृदय में स्थान देते हैं।
शुभता और सुचिता:-
आप दृढ़ता से मन में नये पवित्र संस्कार जमाइये। बार-बार उन्हें दुहरा कर पुराने कुसंस्कारों को फीका बनाइये। प्रतिक्षण अपने मन में सद्चिन्तन, सद्वचन, शुभ कर्म में प्रवृत्त रहिये। पवित्र स्थानों में रमण कीजिये। सद्पुरुषों के संपर्क में रह कर उनकी मंजुल वाणी में आवाहन कीजिए। पुराने स्वभाव तथा आदतों को दूर करने का एक ही उपाय है। वह है उनके विरुद्ध उत्तम तथा विशुद्ध संस्कारों का दृढ़ निश्चय तथा दृढ़ता से उन पर कार्य। सत्य संकल्प से सब मनोरथ सम्पन्न होते हैं।
माता-पिता को अपनी इच्छाएं नियंत्रित करें:-
अपने संतान को सु संस्कारी एवं उनके ह्रदय को धर्ममय बनाने की आशा रखने वाले माता-पिता को अपनी इच्छाओं पर अंकुश लगाना अनिवार्य है ।हमे आज के परिवेश में तेज़ी से फैल रहे कुसंस्कार के बीज को फैलने से रोकना चाहिए। आज बदलते परिवेश में कुसंस्कारी मनुष्य अपने आप को भौतिक रूप से समृद्धशाली कर के खुद को समृद्ध समझ रहा है,परंतु वह अपने ह्रदय से कभी भी समृद्ध नही हो सकता है । मनुष्य के सुसंस्कार ही उसे ह्रदय से समृद्ध बनाते है ।आज के युवा को इस कुसंस्कार जैसे रोग से बचने की आवश्यकता है।

(लेखक सहायक पुस्तकालय एवं सूचनाधिकारी पद पर कार्य कर चुके हैं। वर्तमान में साहित्य, इतिहास, पुरातत्व और अध्यात्म विषयों पर अपने विचार व्यक्त करते रहते हैं।)

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