भारत प्राचीनकाल से संस्कार आधारित नि:शुल्क शिक्षा प्रदान करने वाला देश रहा है। इस देश ने शिक्षा को मानव निर्माण से विश्व निर्माण का एक सशक्त माध्यम माना और इसीलिए शिक्षा को व्यक्ति का मौलिक अधिकार घोषित कर ज्ञानवान होने को व्यक्ति की मौलिक आवश्यकता माना।
1947 में जब देश आजाद हुआ तो हमारे संविधान निर्माताओं ने भी देश में नि:शुल्क शिक्षा देने को आवश्यक माना। इसके पीछे भी यही कारण था कि हमारे संविधान निर्माताओं को भी देश के सुशिक्षित और सुसंस्कारित लोगों के निर्माण की चिंता थी। हमारे संविधान निर्माता सुशिक्षित और सुसंस्कारित जनों के निर्माण से ही देश में शान्ति व्यवस्था की स्थापना होने, वास्तविक विश्वबन्धुत्व के भारत के आदर्श को पाने की चाह और भारत के विश्वगुरू बनने के आदर्श को पूर्ण होता हुआ देखते थे।
देश के स्वतंत्र होने के उपरान्त देश के लगभग छह लाख गांवों में सरकारी विद्यालय खोले जाने की ओर कुछ कार्य भी किया गया। जिससे लगा कि देश की सरकार अपने लिए संविधान में रखी गयी नि:शुल्क शिक्षा की व्यवस्था के आदर्श को पूर्ण करने के प्रति संवेदनशील है। इससे लोगों को भी अच्छा अनुभव हो रहा था। पर यह सब कुछ अधिक देर तक नहीं चला। शीघ्र ही लोगों की भावनाओं को छल सा लिया गया और सरकार के पांव जिधर सही दिशा में उठ रहे थे उधर उठते-उठते ठिठक गये।
एक षडय़ंत्र के अंतर्गत शिक्षा का व्यावसायीकरण होने लगा। कुछ तथाकथित समाजसेवी देश सेवा और समाजसेवा के नाम पर पेट सेवा करने के लिए आगे आये और उन्होंने कहा कि लोगों को सुशिक्षित करने के सरकार के कार्य को हम पूरा कराने में सहायता करेंगे। इसके लिए हम सरकार को जमीन और मूलभूत ढांचा भवन आदि उपलब्ध करायेंगे। पर हमारे शिक्षकों को वेतन के लिए कुछ ट्यूशन फीस सरकार हमें लोगों से अर्थात अभिभावकों से लेने के लिए अनुमति दे। इस पर सरकार ने सहमति दे दी। वास्तव में ये तथाकथित लोग ब्रिटिश ईस्ट इण्डिया कंपनी के सौदागर व्यापारियों की भांति छुपे हुए रूस्तम सिद्घ हुए। इनके मुंह के शब्द जितने पवित्र थे उतनी पवित्र इनकी भावनाएं नहीं थीं। इनकी भावनाओं में तो विष घुला था। इसलिए इन लोगों ने अपनी भावनाओं को पूर्णत: व्यावसायिक बनाकर अर्थात संवेदनशून्य बनाकर कार्यारम्भ किया।
इस कार्य में सरकारी अधिकारियों की भी मिली भगत रही और देर सवेर इसमें कुछ जनप्रतिनिधि या राजनीतिक दलों के लोग भी सम्मिलित हो गये। इस प्रकार संविधान के नाम पर जो राजनीति नि:शुल्क शिक्षा देने का वचन देश के नागरिकों को दे रही थी वही विषैली हो गयी और उसने ही संवेदनाशून्य बनकर शिक्षा का व्यावसायीकरण करने का खेल खेलना आरम्भ कर दिया। राजनीति में लोग आज भी संविधान की सर्वोच्चता की बात करते हैं, पर देश की शिक्षा का व्यावसायीकरण उनके इस दावे की पोल खोल रहा है। जब तक देश की शिक्षा का व्यावसायीकरण बंद नहीं हो जाता है तब तक मानना पड़ेगा कि देश का संविधान आत्महत्या कर चुका है।
शिक्षा के व्यावसायीकरण से राजनीतिज्ञों को तिहरा लाभ हुआ। एक तो यह कि उसे देश में फटाफट जितने विद्यालय और विश्वविद्यालय खोलने थे उससे वह बच गये, दूसरे लोगों को रोजगार देने से बच गये और तीसरे विद्यालयों से ही राजनीतिक लोगों को कमाई भी होने लगी। इससे देश के समाज का और देश के राजनीतिक तंत्र का नैतिक पतन हुआ। जिस देश की शिक्षा ही भ्रष्टाचारियों के हाथ की कठपुतली बन जाया करती है, उसके लोगों का नैतिक पतन होना अनिवार्य है। जब राजा ही भ्रष्ट होगा तो प्रजा का भ्रष्ट होना भी अनिवार्य हो जाता है। शिक्षा जितनी पवित्र होगी और मानव निर्माण को प्रोत्साहित करने वाली होगी उतनी ही वह श्रेष्ठ संसार के निर्माण में सहयोगी होगी।
आज की व्यावसायिक शिक्षा देश में शिक्षा माफिया तंत्र का निर्माण करने मेें सहायक हो चुकी है। जिससे पूरी व्यवस्था पंगु सी हो गयी है। शिक्षा क्षेत्र में घुसे माफिया किस्म के लोग फर्जी डिग्री बनाने का कार्य कर रहे हैं। फर्जी नौकरी दिलाने में लगे हैं। अध्यापकों को कम से कम वेतन देकर उनको बैंक के फर्जी चैक दिये जाते हैं। जिनमें उन्हें अधिक वेतन दिया दिखाया जाता है पर वास्तव में उन्हें दिखाये गये वेतन का चौथाई वेतन ही दिया जाता है। इस प्रकार निजी विद्यालय पढ़े लिखे युवाओं का आर्थिक शोषण भी कर रहे हैं। इनका व्यक्तिगत स्वार्थ का साम्राज्य खड़ा हो रहा है। सेवा की भावना के नाम पर देश के लोगों के साथ और देश की युवा हो रही नई पीढ़ी के साथ ये शिक्षा माफिया खिलवाड़ कर रहे हैं। रातों रात एक निजी स्कूल वाला व्यक्ति धनवान होता जाता है। वह बच्चों की छात्रवृत्ति को खाने का रास्ता खोज लेता है। नेताओं से सांठ गांठ कर उनके सरकारी पैसे को विद्यालय में निर्माण के लिए लेता है और फिर नेताजी को कमीशन देकर उनसे मित्रता कर ली जाती है। अधिकतर जनप्रतिनिधि अपने लिए आवंटित धनराशि को इन विद्यालयों को मोटे कमीशन पर बेच देते हैं। ऐसे में कैसे अपेक्षा करें कि निजी विद्यालय सब कुछ ठीकठाक कर रहे हैं या कर सकते हैं?
आज शिक्षा के व्यावसायीकरण की दर्दनाक प्रक्रिया ने गरीब लोगों के बच्चों की शिक्षा छीन ली है। उनके विकास के सभी अवसर छीन लिये हैं। उनका भविष्य छीन लिया है। क्योंकि कोई भी निर्धन व्यक्ति लाखों करोड़ों रूपया खर्च करके अपने बच्चे का भविष्य बनाने की क्षमता नहीं रखता है। इस प्रक्रिया के परिणाम ये भी आये हैं कि संवेदनाशून्य शिक्षा प्रणाली संवेदनाशून्य मानव का निर्माण कर रही है। पढ़ लिख कर भी युवा जेब काटने की या आर्थिक अपराधों की गतिविधियों में लगता जा रहा है। इसका कारण है कि शिक्षा के व्यावसायीकरण ने युवाओं को धनी बनने के सपने तो दिखाये हैं-पर उन्हें अपने परिवार के परम्परागत व्यवसाय से काट दिया है। अत: अपने परम्परागत व्यवसाय को युवा वर्ग अपने लिए हेय मान रहा है। उसे नया व्यवसाय चाहिए और बड़ी नौकरी चाहिए, जिससे कि वह रातों रात अमीर बन सके। जब युवा पढ़ लिखकर सडक़ पर आता है तो उसे पता चलता है कि सपनों के संसार में और यथार्थ में आकाश पाताल का अंतर होता है। फलस्वरूप वह आत्महत्या तक कर रहा है। इससे शिक्षा के व्यावसायीकरण समाज में बेरोजगारी और हताशा की भावना का निर्माण कर रहा है।
शिक्षा के के व्यावसायीकरण से परिवार के संबंध भी खराब हो रहे हैं। लंबे चौड़े खर्चों को लेकर माता-पिता और नई पीढ़ी का झगड़ा रहता है। बच्चे कमाने लगे तो सबसे पहले वे माता-पिता और परिजनों को भूलते हैं और पागल होकर कमाने में लग जाते हैं, सारी दुनिया पैसे के लिए बनकर रह जाती है उनकी। इससे पारिवारिक परिवेश बोझिल हो चुका है। सेवा के स्थान पर स्वार्थ बढ़ता जा रहा है और नई पीढ़ी हर बात में स्वार्थ तलाश रही है। स्वार्थ को ही उसने जीवन मान लिया है। जबकि स्वार्थ तो सर्वनाश का नाम है। जब तक उसे यह बात समझ आती है तब तक देर हो चुकी होती है।
हमारा मानना है कि सरकार को यथाशीघ्र शिक्षा के व्यावसायीकरण पर रोक लगानी चाहिए। सरकार शिक्षा को संस्कारप्रद बनाये, मानवीय और उदार बनाकर संवेदनशील बनाये। इसी से देश का कल्याण होना सम्भव है।

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