सुप्रीम कोर्ट के कॉलेजियम में अपना प्रतिनिधि क्यों चाहती है केंद्र सरकार?

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गौतम मोरारका

देखा जाये तो उच्चतम न्यायालय की मौजूदा कॉलेजियम प्रणाली पर विवाद थमने का नाम नहीं ले रहा है। हाल ही में केंद्रीय कानून मंत्री के बयान के बाद कुछ पूर्व न्यायाधीशों ने भी इस मुद्दे पर बयान दिये जिस पर न्यायालय ने नाखुशी भी जताई थी।

केंद्रीय कानून मंत्री ने मुख्य न्यायाधीश को पत्र लिख कर मांग की है कि उच्च और उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीशों का चयन करने वाले कॉलेजियम में सरकार का भी प्रतिनिधि होना चाहिए। इस पत्र पर हालांकि कॉलेजियम में चर्चा के बाद ही कोई निर्णय लिया जायेगा, लेकिन इस पर देश में बहस भी शुरू हो गयी है। कुछ न्यायविद् इसे एनजेएसी अधिनियम की वापसी बता रहे हैं तो वहीं सरकार से जुड़े लोगों का कहना है कि हमने कोई अभूतपूर्व मांग नहीं की है क्योंकि पूरी दुनिया में ही ऐसा होता है। कानून मंत्री का मानना है कि कॉलेजियम प्रणाली में सरकार का प्रतिनिधि होने से इसमें पारदर्शिता और सार्वजनिक जवाबदेही भी आएगी।

देखा जाये तो उच्चतम न्यायालय की मौजूदा कॉलेजियम प्रणाली पर विवाद थमने का नाम नहीं ले रहा है। हाल ही में केंद्रीय कानून मंत्री के बयान के बाद कुछ पूर्व न्यायाधीशों ने भी इस मुद्दे पर बयान दिये जिस पर न्यायालय ने नाखुशी भी जताई थी। लेकिन उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने जिस तरह एनजेएसी अधिनियम को रद्द किये जाने पर संसद में चर्चा नहीं होने पर हैरत जताई थी, उससे अंदेशा हो गया था कि सरकार कोई कदम उठा सकती है। अब केंद्रीय कानून मंत्री ने मुख्य न्यायाधीश को पत्र लिखकर कॉलेजियम में सरकार का प्रतिनिधि रखने की जो मांग की है उससे स्पष्ट हो गया है कि सरकार न्यायाधीशों के चयन के मुद्दे को सिर्फ कॉलेजियम के भरोसे छोड़ने को तैयार नहीं है। उल्लेखनीय है कि 2015-16 में संसद से पारित एनजेएसी में कॉलेजियम प्रणाली को पलटने का प्रावधान था, हालांकि शीर्ष अदालत ने इसे असंवैधानिक बताते हुए रद्द कर दिया था।

न्यायपालिका और सरकार के बीच कॉलेजियम प्रणाली पर मतभेद उस समय भी सामने आये थे जब हाल ही में उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने केशवानंद भारती मामले में अदालत के ऐतिहासिक फैसले पर सवाल उठाते हुए कहा था कि न्यायपालिका, संसद की संप्रभुता से समझौता नहीं कर सकती। उल्लेखनीय है कि उस फैसले ने देश को ‘संविधान के मूलभूत ढांचे का सिद्धांत’ दिया था। धनखड़ ने जयपुर में आयोजित पीठासीन अधिकारियों के सम्मेलन को संबोधित करते हुए राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग अधिनियम को निरस्त किये जाने पर एक बार फिर सवाल उठाते हुए कहा था कि लोकतंत्र के अस्तित्व के लिए संसदीय संप्रभुता और स्वायत्तता सर्वोपरि है। बहरहाल, न्यायपालिका और सरकार के बीच जो मतभेद दिख रहे हैं उसका हल सौहार्द्रपूर्ण तरीके से ही निकाला जाना चाहिए।

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