कांग्रेस का सोनिया कालकांग्रेस से सोनिया काल विदा ले चुका है। अब वह अस्ताचल की ओर है। बेशक उन्होंने कांग्रेस की तथाकथित शानदार परम्परा का निर्वाह करते हुए अपना ‘सिंहासन’ अपने पुत्र राहुल को सौंप दिया है, पर वह अब बुझता हुआ दीप ही कही जाएंगी। क्योंकिअब वह कांग्रेस अध्यक्ष पद पर या भारत के प्रधानमंत्री के पद पर नहीं आ पाएंगी। उन्हें अपने जीवन की जिस शानदार उपलब्धि को पाना था वह उन्होंने मनमोहन सिंह के प्रधानमंत्री रहते हुए ‘सुपर पीएम’ बनकर पा ली है। वह स्थिति अब उनके लिए लौटनी सर्वथा असंभव है। उनके लिए यह दुर्भाग्य की ही बात रहेगी कि चाहे उन्हें देश के समाचार पत्रों ने कितना ही बढ़ा चढ़ाकर प्रस्तुत किया और चाहे हम लोगों ने उन्हें ‘सुपर पी.एम.’ कहकर शक्तिशाली महिला के रूप में जाना या पुकारा पर इतिहास तो उन्हें केवल कांग्रेस के अध्यक्ष के रूप में ही जानेगा। क्योंकि देश का संविधान उसे सोनिया गांधी को ‘सुपर पी.एम.’ कहने की अनुमति नहीं देगा। इतिहास वही बोलेगा जो संविधान कहेगा।
अत: इतिहास सोनिया गांधी का इसी रूप में मूल्यांकन करेगा कि उन्होंने सरकार के कार्यों में अड़ंगा डाल-डालकर अपने आपको असंवैधानिक ‘सुपर पी.एम.’ सिद्घ करने का अवैधानिक और अनैतिक कार्य किया। उनके कार्यों से देश की व्यवस्था में जड़ता और पंगुपन की बीमारी प्रविष्ट हो गयी और सारी व्यवस्था को लुंज पुंज बनाकर वह देश पर अप्रत्यक्ष रूप से शासन करती रहीं। उनका यह खेल निरंतर 10 वर्ष तक चला और इन दस वर्षों में देश की शासन व्यवस्था का वह अपहरण किये रहीं, जब देश की आंखें खुलीं और पता चला कि ‘दरोगाजी चोरी हो गयी’-तब लोगों ने उन्हें सत्ता से खींचकर अलग किया। जिसे मैडम ने भारत के लोगों की ‘असहिष्णुता’ कहा। उन्हें वही स्थिति अच्छी लग रही थी-जिसमें वह संविधान की आत्मा का हनन करके पर्दे के पीछे से सत्ता का संचालन कर रही थीं। यदि देश के लोग उसी स्थिति को पसंद करते रहते तो वे मैडम की दृष्टि में सहिष्णु होते।
सोनिया गांधी का इस देश में आगमन कितना अच्छा या बुरा रहा?- इसे भी इतिहास की दृष्टि से देखने की आवश्यकता है। उनका यहां आना कुछ लोगों की दृष्टि में एक षडय़ंत्र था। उस षडय़ंत्र के अंतर्गत उन्हें देश का प्रधानमंत्री बनाने के लिए तिकड़मों के जाल बुने गये और उनके मार्ग में आने वाली बाधाओं को हटाने का उपाय खोजा जाने लगा। उसी प्रकार के उपायों को खोजते-खोजते संजय गांधी, इंदिरा गांधी और राजीव गांधी को रास्ते से हटाया गया? फिर कांग्रेस के भीतर की चुनौतियों को हटाया गया। इनमें राजेश पायलट, जितेन्द्र प्रसाद और माधवराव सिंधिया जैसे लोगों का नाम लिया जाता है। इस षडय़ंत्र पर अपनी सटीक टिप्पणी इतिहास ही करेगा और यह भी इतिहास ही निश्चित करेगा कि ऐसा कोई षडय़ंत्र था भी या नहीं?
फिर भी हमने इसे यहां उल्लेखित किया है तो उसका भी अपना अर्थ है और अपना महत्व है। इस अर्थ और महत्व को समझने की आवश्यकता है। सोनिया गांधी के अनुचित हस्तक्षेप से उस मदर टेरेसा को भारत रत्न दिया गया जो देश के पूर्वोत्तर के प्रान्तों को ईसाइयत के रंग में रंग कर उन्हें भारत, भारतीयता और हिन्दुत्व से काटने का काम करती रही। उस ‘महान महिला’ के कारण सारा पूर्वोत्तर अलगाव की राह पर चल निकला और सोनिया के कारण देश का लोकतंत्र उसे भारत रत्न देने के लिए उसके दरवाजे पर नाक रगडऩे के लिए जा पहुंचा। यह सोनिया की बड़ी उपलब्धि थी और उनकी इस उपलब्धि के परिणामस्वरूप यदि भविष्य में पूर्वोत्तर देश से अलग हो गया तो वहां के ईसाई समाज में मदर टेरेसा और सोनिया गांधी को एक देवी के रूप में पूजा जाएगा, जिनके लिए कहा जाएगा कि इन दो महिलाओं के कारण हम लोग ‘हिंदू आतंकवाद’ से मुक्त हो पाये थे। तब पूर्वोत्तर भी पाकिस्तान की भांति अपना अलग इतिहास लिखेगा और उस इतिहास में शेष देश को वैसी ही गालियों का प्रयोग किया जाएगा जैसी गालियों का प्रयोग पाकिस्तान ने अपने इतिहास में भारत के लिए किया है।
सोनिया गांधी के काल में अरब के शेखों के लिए दक्षिण भारत से हिंदू नाबालिग लड़कियों की तस्करी का धंधा जोरों से चला। वहां से बड़ी संख्या में लड़कियों को वहां भेजा गया अथवा अरब के शेखों ने भारत में आकर हिंदू लड़कियों का शील भंग कर उनसे महीने दो महीने के लिए विवाह रचाया और फिर उन्हें उनके दुर्भाग्य को सौंपकर यहां से चले गये। ऐसी लाखों लड़कियां हैं जो सोनिया की कृपा से आज दुर्भाग्यपूर्ण वैधव्य का जीवन जी रही हंै। उन्हें नहीं पता कि उनके जीवन में कौन राक्षस उनका पति बनकर आया था, वह कौन था-कहां का था और अब वह कहां गया? वे इतना जानती हैं कि अब उन्हें नारकीय जीवन जीना होगा और जब तक जीवित रहेंगी तब तक अभिशप्त बनी रहेंगी। देश को स्वतंत्रता दिलाने का दम भरने वाली कांग्रेस देश की अनेकों ललनाओं को इस नारकीय जीवन में धकेलने की दोषी केवल इसलिए है कि उस पर सोनिया राज चल रहा था। एक महिला ने ही महिलाओं को नरक में धकेल दिया। सारे देश को सहिष्णुता की बीमारी लगाकर शांत कर दिया गया। यदि कोई हिंदूवादी संगठन इस अपराध के विरूद्घ बोला तो उसे ‘तालिबानी’ या ‘हिंदू आतंकवादी’ कहकर अपमानित किया गया। पूरे देश को इस बात के लिए प्रेरित और बाध्य किया गया कि हम जो कुछ कर रहे हैं उसे ही स्वीकार करो और उसी को नमन करो।
एक बार मैडम नेपाल गयी थीं। उस समय नेपाल में राजशाही जीवित थी, मैडम ने नेपाल के प्रसिद्घ पशुपतिनाथ मंदिर में भी जाने का कार्यक्रम बनाया। वहां की परम्परा है कि वहां केवल हिन्दू ही प्रवेश कर सकता है। अत: सोनिया मैडम को वहां के पुजारियों ने मंदिर में प्रवेश नहीं करने दिया। क्योंकि आजकल के जनेऊधारी हिन्दू पंडित राहुल गांधी की माताजी आज तक भी ईसाई ही हैं। मैडम को यह बात बुरी लगी कि उन्हें मंदिर में प्रवेश केवल इसलिए नहीं करने दिया गया कि वे अहिंदू हैं। मैडम ने भीष्म प्रतिज्ञा ली कि मैं इस हिन्दू धर्म को मिटाने का हरसम्भव प्रयास करूंगी और नेपाल के हिन्दू स्वरूप को मिटाकर इसे भी भारत की तरह धर्मनिरपेक्ष बनाकर रहूंगी। क्योंकि धर्मनिरपेक्ष नेपाल ही भारत की भांति अपनी जड़ों को भूल सकता था। अपनी परम्पराओं को भूल सकता था। प्रतिशोध स्वरूप सोनिया मैडम ने नेपाल से राजशाही को उखड़वा दिया क्योंकि यह राजशाही ही नेपाल के हिंदू स्वरूप को बनाये रखना चाहती थी। आज का धर्मनिरपेक्ष नेपाल सोनिया की देन है जो कि भारत को आंखें दिखाता है और चीन की गोद में जाना चाहता है। आज के नेपाल से भारत को खतरा है और अपनी सीमाओं की रक्षा के लिए धर्मनिरपेक्ष नेपाल की सीमा पर हमें जो अतिरिक्त सेना व सैन्य बल वहां नियुक्त करने पड़े है उन पर भारत को लगभग चालीस हजार करोड़ रूपया अतिरिक्त प्रतिवर्ष व्यय करना पड़ रहा है। यह भी भारत के लिए सोनिया की एक विशेष देन है।
इस सम्पादकीय में पूरा ‘सोनिया चालीसा’ आ पाना संभव नहीं है। संक्षेप में पूर्व राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी के द्वारा अपने राष्ट्रपति काल के संस्मरणों को लेकर लिखी गयी उनकी पुस्तक के इस निष्कर्ष के साथ अपनी बात को पूर्ण विराम देता हूं कि सोनिया जी ‘हिन्दू विरोधी’ हैं।
…..और यह भी सत्य है कि हिन्दू विरोधी होना राष्ट्र विरोधी हो जाना तो अपने आप ही बन जाता है। पाठकवृन्द! कैसी लगी। ‘सोनिया चालीसा’ की यह किश्त आपको? हमें अवश्य लिखें।

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