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महाराणा प्रताप की 426 वीं पुण्यतिथि के अवसर पर : हल्दीघाटी का युद्ध, महाराणा प्रताप और चेतक

आज है देश की आन बान और शान के प्रतीक महाराणा प्रताप की पुण्यतिथि

 

हल्दीघाटी के मैदान में युद्ध करने की योजना महाराणा प्रताप ने गोगुंदा के किले में रहते हुए बनाई थी। जब मेवाड़ और मुगलों के बीच संधि न हो पाई तो मानसिंह मुगलों की एक विशाल सेना लेकर महाराणा प्रताप पर चढ़ाई करने के लिए चल पड़ा। महाराणा प्रताप ने एक रणनीति के तहत हल्दीघाटी को युद्ध के लिए चुना।
हल्दीघाटी इसको इसलिए कहते हैं कि इसके प्रवेश द्वार के दोनों तरफ की मिट्टी हल्दी की तरह पीले रंग की है। हल्दीघाटी के चारों तरफ गुर्जरों के छोटे छोटे से गांव हैं । जिन्होंने उस समय हल्दीघाटी के युद्ध में महाराणा प्रताप की सहायता की थी। 18 जून 1576 को मानसिंह और महाराणा प्रताप के मध्य हल्दीघाटी के मैदान में लड़ाई हुई । दोपहर तक दोनों सेनाएं बहुत ही बहादुरी के साथ लड़ती रहीं। युद्ध के समय महाराणा प्रताप मानसिंह को ढूंढ रहे थे तो उनको मानसिंह का हाथी दिखाई पड़ा । महाराणा प्रताप ने अपने घोड़े चेतक को ऐड लगाई । चेतक घोड़ा मान सिंह के हाथी के सामने पहुंच गया। महाराणा प्रताप ने घोड़े को फिर ऐड लगाई। घोड़े ने अपनी आगे वाली दोनों टांगें उठाकर हाथी के माथे पर टेक दीं ।महाराणा प्रताप ने अपना भाला हाथ में उठाकर हाथी के ऊपर बैठे हुए मानसिंह पर प्राण लेवा पूर्णा आवेग के साथ भारी प्रहार किया। मानसिंह का महावत एक तरफ को बच गया और मानसिंह हाथी की अंबारी में दूसरी तरफ को लेट गया। इस प्रकार भाले का वार खाली चला गया। भाले का वार ही खाली नहीं चला गया , यदि सोचा जाए तो भारत माता का वार ही खाली चला गया अन्यथा इतिहास कुछ और ही होता।

मानसिंह के हाथी की सूंड में एक कृपाण थी जो वह आगे – आगे घुमाता हुआ चलता था। चेतक घोड़े की पिछली एक टांग में वह छोटी तलवार लगी और चेतक की पिछली एक टांग टखने के पास से कुछ कट गई।
सचमुच बहुत बड़ा दुर्भाग्य था देश का। उसके पश्चात झाला राव मन्नासिंह नामक सिपहसालार ने महाराणा प्रताप को युद्ध के मैदान से सुरक्षित निकल जाने के लिए संकेत किया। लेकिन महाराणा प्रताप ने मना किया । झाला राव ने उनको समझाया कि मातृभूमि की रक्षा के लिए आपका सुरक्षित निकल जाना बहुत जरूरी है ।
अपने को सुरक्षित निकाल कर दुश्मनों को नष्ट करने के लिए आपका जीवित रहना बहुत आवश्यक है। पुनः शक्ति संचयन करके शत्रुओं पर आक्रमण किया जाना ही बुद्धिमत्ता होती है। इसलिए नीतिगत महाराणा प्रताप को वहां से निकाल दिया ।कुछ देर तक मुगल सेना झाला राव को ही महाराणा प्रताप समझने की गलती करती रही , लेकिन महाराणा प्रताप अपने घायल चेतक को लेकर दूर निकल गए।
जिस समय 18 जून 1576 को हल्दीघाटी के मैदान में यह युद्ध दोनों सेनाओं के बीच चल रहा था उसी समय तक गुजरात और राजस्थान के संभाग में प्रतिवर्ष मानसून सक्रिय हो जाता है इसलिए उस दिन बहुत तेज वर्षा होने लगी थी। सामने एक नाला आया जो करीब 20 फुट चौड़ा था । महाराणा प्रताप ने घोड़े को ऐड लगाई। घोड़ा थक चुका था। संकोच कर रहा था। घायल था। लेकिन महाराणा प्रताप के ऐड लगाने पर घोड़ा उस नाले को कूद गया ।नाले में पानी बहुत तेजी से बह रहा था ।क्योंकि पहाड़ का नाला ढलान की तरफ बहुत तेजी से बहता है ।वह ऐसा ही नाला था।
चेतक घोड़ा नाले को कूद गया। लेकिन फिर वहीं गिर गया।
महाराणा प्रताप ने चेतक घोड़े को बहुत प्यार किया । सचमुच जिस घोड़े ने हर संकट में उनका साथ दिया था आज उसका इस प्रकार साथ छोड़ कर जाना महाराणा प्रताप को हृदय से दुखी कर रहा था। उनकी आंखों से अश्रुधारा बह चली । तब उन्होंने वहीं पर ही यह प्रतिज्ञा ली कि अपने इस मूल्यवान साथी की याद में वह इसकी समाधि यहां पर अवश्य बनवाएंगे। महाराणा प्रताप ने अपनी प्रतिज्ञा के अनुसार बाद में वहां चेतक की समाधि बनवाई । इसी समाधि के पास एक पहाड़ी के ऊपर इस समय राजस्थान सरकार द्वारा चेतक घोड़े व महाराणा प्रताप की एक विशाल भव्य मूर्ति काले संगमरमर के पत्थर की बनाई गई है।
इसी समय दो घुड़सवार मुगल सैनिक भी महाराणा प्रताप को भागता हुआ देखकर उनका पीछा कर रहे थे। लेकिन उनको पीछा करते हुए देखकर और भाई के प्राण खतरे में जानकर महाराणा प्रताप का भाई शक्ति सिंह जो राजगद्दी न मिलने से नाराज होकर के अकबर से जा करके मिल गया था, उसने उन दोनों मुगल सैनिकों को मार गिराया । तब वह महाराणा प्रताप के पास पहुंचा। महाराणा प्रताप ने समझा कि यह उनसे लड़ाई के लिए आया है , इसलिए लड़ाई को तैयार हुए ,परंतु भाई द्वारा वास्तविकता बताने पर महाराणा प्रताप ने उनको अपने पास आने का संकेत किया। तब भाई ने महाराणा प्रताप को अपना घोड़ा दिया और कहा कि आप दूर निकल जाएं।
हल्दीघाटी का युद्ध जब चल रहा था तो उसमें अनेक सैनिक , योद्धा , हाथी , घोड़े मारे जा चुके थे । उसी दिन बरसात भी हुई थी , उसकी वजह से सैनिकों , घोड़ों व हाथियों का खून वर्षा के पानी के साथ बहकर एक विशाल तालाब में भर गया था ।जिस तालाब को मैंने भी मौके पर देखा । जिसको आज रक्त तलैया कहते हैं। उस समय यह रक्त से भर गई थी ।
यद्यपि हल्दीघाटी का युद्ध अनिर्णीत रहा ।परंतु इसके पश्चात मुगल और मेवाड़ के बीच युद्धों की झड़ी लग गई। परंतु हर युद्ध में महाराणा प्रताप ही विजयी होते रहे ।बहुत सारे किले महाराणा प्रताप ने मुगलों से वापस लिए । जो इतिहास भारतवर्ष के स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात पहले 5 शिक्षा मंत्रियों ने लिखवाया तथा कम्युनिस्टों से प्रभावित होकर के नेहरू ने कभी कोई आपत्ति नहीं की ऐसे ही इतिहास में यह सब बातें पढ़ने को नही मिलती हैं ।
महाराणा प्रताप के गोगुंदा को मुगलों की सेना ने तहस-नहस कर दिया था और महाराणा प्रताप हल्दीघाटी के युद्ध के पश्चात पहाड़ों में छिपकर मुगलों से छापामार युद्ध कर रहे थे। गोगुंदा से कुछ ही दूरी पर अवस्थित कोठारी गांव को उन्होंने अपना केंद्र बिंदु बनाया ।महाराणा प्रताप से मुगल सेना इतनी भयभीत थी कि हल्दीघाटी युद्ध के पश्चात गोगुंदा में रहने वाले मुगल सैनिकों ने मोहल्ला में आड खड़ी करके, दीवार बनाकर के गोगुंदा के अंदर रहते थे ।कुंवर मानसिंह भी गोगुंदा में मुगल सेना के साथ चार माह तक रहे , लेकिन वे प्रताप को पकड़ नहीं पाए ।आखिर मानसिंह को अकबर ने दिल्ली बुला लिया । मुगल सेना गोगुंदा में कैदी की भांति रहने लगी। महाराणा प्रताप के वीर सिपाहियों ने मुगल शाही सेना की आपूर्ति के सारे रास्ते बंद कर दिए थे , जिससे वह भुखमरी के कगार पर पहुंच गई। बचे हुए मुगल शाही सैनिकों को खदेड़ दिया और गोगुंदा पर पुनः अधिकार कर लिया।
सन 1536 से गोगुंदा भारत के इतिहास के पन्नों पर उभरा और भारतीय राजनीति व रणनीति का केंद्र बिंदु बन गया। सन 1626 में जब खुर्रम आगरा जाते समय गोगुंदा में से गुजरा तो मेवाड़ के महाराणा करण सिंह ने खुर्रम का स्वागत सत्कार गोगुंदा में ही किया। उस दिन खुर्रम ने अपनी सालगिरह गोगुंदा में ही मनाई ।इस प्रकार भारत के इतिहास में गोगुंदा एक महत्वपूर्ण स्थान बन गया। जिसके प्रमाण में जहाँ का प्राचीन गढ़ है। यहाँ कभी मेवाड़ के महाराणा ने अपने राज्य का संचालन करने के साथ ही अपनी रणनीति तैयार की थी। गोगुंदा का विशालगढ़ तो आज सरकार की उदासीनता और संरक्षण के अभाव में जर्जर अवस्था में है परंतु महल, झरोखे ,गोखरे उस प्राचीन इतिहास के साक्षी रहे हैं।
महाराणा प्रताप महान हैं। अकबर महान नहीं है। इस विचार को लेकर के हमारे ‘उगता भारत’ समाचार पत्र समूह का प्रतिनिधिमंडल मेरे साथ में तत्कालीन राज्यपाल महामहिम श्री कल्याण सिंह जी से मिला ।उनसे महाराणा प्रताप को अकबर के स्थान पर महान बताकर इतिहास को बदलने का प्रस्ताव दिया ।जिस प्रस्ताव को माननीय महामहिम राज्यपाल द्वारा स्वीकार किया गया । महाराणा प्रताप को राजस्थान के विद्यालयों के पाठ्यक्रम में महान पढ़ाया जाने लगा।
लेकिन जैसे ही भाजपा की सरकार बदली और कांग्रेस की सरकार आई तो उन्होंने फिर महाराणा प्रताप के स्थान पर अकबर को महान पढ़ाना शुरू कर दिया है । जो कि बहुत ही दुखद विषय है। कांग्रेस ने यही नहीं , बल्कि देश के साथ धर्मनिरपेक्षता के नाम पर इतिहास में अनेक असत्य एवं अनावश्यक विलुप्तीकरण एवं विद्रूपीकरण किए हैं , वास्तविक इतिहास को, तथ्यों को ,सत्य को, छिपाया ।लेकिन भारत की वर्तमान पीढ़ी जागृत हो चुकी है । इस बात पर कार्य कर रही है कि भारतवर्ष का इतिहास पुनः लिखा जाना चाहिए। जिस पर बहुत सारे विद्वान साथी कार्य कर रहे हैं, जो खुशी का विषय है।
इस लेख में मैंने ऐसे तथ्यों को समाविष्ट एवं उद्घाटित करने का प्रयास किया है जो हमारे पढ़ने में नहीं आते । महाराणा प्रताप से संबंधित अन्य बहुत सी सामान्य जानकारियां एवं बातें तो आप पढ़ते ही रहते हैं ।
अब आवश्यकता है कि महाराणा प्रताप को इतिहास में सही स्थान और सम्मान प्रदान किया जाकर महाराणा प्रताप को इतिहास में महान पुरुष एवं महा योद्धा के रूप में प्रतिष्ठित एवं प्रतिस्थापित किया जाए।
वीर शिरोमणि देशभक्त महाराणा प्रताप की पुण्यतिथि पर शत शत नमन।

देवेंद्र सिंह आर्य एडवोकेट
चेयरमैन : उगता भारत समाचार पत्र

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