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डॉ राकेश कुमार आर्य की लेखनी से

नेपाल में वामपंथियों की जीत

नेपाल की राजशाही भारत समर्थक थी। उसका यह स्वरूप चीन को पसंद नहीं था। जब राजशाही को वहां मौत की नींद सुलाया गया तो उस समय मानो नेपाल को भारत के विरूद्घ खड़ा करने की तैयारियां आरम्भ हो गयीं थी। चीन भारत में नक्सलवादी आन्दोलन को उभारने में भी सहायक रहा है। जिससे कि भारत को आन्तरिक चुनौतियों में घेरे रखकर उसे अन्तर्राष्ट्रीय मंचों पर ‘मुकद्दम’ बनने से रोका जा सके। चीन विश्वशक्ति बनना चाहता है और वह नहीं चाहेगा कि उसके रास्ते में भारत दूर-दूर तक भी कहीं खड़ा दिखायी दे। अब तो चीन अमेरिका को भी पीछे छोडक़र सम्पूर्ण विश्व की पहली शक्ति बनने की युक्तियां खोज रहा है। इससे अमेरिका भी चीन से सावधान हो चुका है।
यह चीन ही रहा है जिसने भारत के नक्सलवादी आंदोलन को हवा देने के लिए पेइचिंग रेडियो से विशेष प्रसारण आरम्भ किया हुआ है। चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के समाचार पत्र ‘पीपुल्स डेली’ ने भी नक्सलवादी आन्दोलन को अपने मुख पृष्ठ पर स्थान दे कर उसे उभारने में मदद की है। यह अच्छी बात है कि भाजपा की मोदी सरकार ने नक्सलवादी आन्दोलन की कमर तोडऩे की दिशा में महत्वपूर्ण कार्य किया है और इस आन्दोलन के अधिकांश नेता इस समय या तो भूमिगत हो गये हैं या सुरक्षाबलों की गोलियों का शिकार बन गये हैं या फिर आन्दोलन से मुंह फेरकर राष्ट्र की मुख्यधारा में लौट रहे हैं। हमारे देश के नक्सलवादी उग्रवादियों ने अपनी पत्रिका ‘लिब्रेशन’ में कई बार तत्कालीन कांग्रेसी सरकार की आलोचना करते हुए उसे सोवियत संघ की ‘पिट्ठू सरकार’ बताया था। स्पष्ट है कि उनका यह कार्य भी चीन के ही इशारे पर ही हो रहा था। चीन को भारत और रूस की मित्रता कभी अच्छी नहीं लगी। इसलिए उसने नक्सलवादी आन्दोलनकारियों को अपने साथ भारत के किसानों और मजदूरों को भी लाने के लिए प्रेरित किया। नक्सलवादी बार-बार चेतावनी दे रहे थे कि उनके आन्दोलन की आग एक दिन सारे देश में फैल जाएगी। चीन की हरकत को और उसके षडय़ंत्र को जब भारत सरकार ने समझा तो उसने अनेकों ‘विरोध पत्र’ चीन सरकार को भेजे। पर विरोधपत्रों का कुछ नहीं हुआ। स्मरण रहे विरोध के साथ ‘क्रोध और प्रतिशोध’ भी आवश्यक होते हैं। मनमोहन सरकार के पास केवल विरोध पत्र तो थे-‘क्रोध और प्रतिशोध’ नहीं था। फलस्वरूप चीन अपनी षडय़ंत्रकारी नीतियों से बाज नहीं आया और वह पूर्ववत अपनी ओर से नक्सलवादी आंदोलन को समर्थन देता रहा।
इसी बीच नेपाल में राजशाही का अंतिम संस्कार करा दिया गया। हमारा नेतृत्व इसे नेपाल का भीतरी मामला कहकर इसके प्रति आपराधिक मौन या तटस्थता का भाव अपनाए रहा। उसे लगा कि यदि उसने ‘हिन्दू राष्ट्र’ नेपाल की सहायता की तो इससे भारत के धर्मनिरपेक्ष स्वरूप पर दाग लग जाएगा। अत: सही समय पर भारत बोलने से पीछे हट गया और उसने नेपाल की राजशाही का अंतिम संस्कार हो जाने दिया। उसने सोचा कि नेपाल की राजशाही की राख से उपजे धर्मनिरपेक्ष नेपाल से भी उसके सम्बन्ध कुल मिलाकर ठीक ही रहेंगे। पर हमारे नेतृत्व की यह भूल थी। आज का धर्मनिरपेक्ष नेपाल राजशाही के साथ अपनी कई चीजों को दफन कर चुका है। उसमें चीन के संकेत पर उसने सबसे पहले अपना ‘हिंदू अतीत’ भुलाने की तैयारी की है। कदाचित यही वह तन्तु था जो नेपाल को भारत के साथ आत्मीय भाव से जोड़ता था और नेपाली लोगों को भारत के लोग अपना भाई मानकर उनको दूसरे देश का नागरिक ही नहीं मानते थे। नेपालियों को भारत में और भारतीयों को नेपाल में एक ही देश का नागरिक माना जाता था। हिन्दू अतीत को भुलाते नेपाल ने भारत के साथ अपने पुरातन सांस्कृतिक सम्बन्धों को भी भुलाने की तैयारी कर ली। आज का नेपाल वही नेपाल है जो भारत के साथ अपने ‘हिन्दू अतीत’ को जोडक़र देखना नहीं चाहता। कहने के लिए वहां से चाहे जैसे संकेत मिलें पर सच ये ही है कि नेपाल में भारत के प्रति सब कुछ ठीक नहीं है।
अब नेपाल में हुए चुनावों में वामपन्थी गठबन्धन की भारी जीत हुई है। गठबन्धन की यह जीत भारत के लिए खतरे की घंटी है। वामपन्थी तो भारत में रहकर भारत के नहीं हैं तो फिर नेपाली वामपन्थियों से कैसे अपेक्षा की जा सकती है कि वे भारत के साथ मधुर सम्बन्ध बनाकर रहेंगे? सचमुच नेपाल इस समय एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है जहां से यदि उससे भारत का एक बार हाथ छूट गया तो उसके बाद वह शायद ही कभी भारत के साथ आने की सोचे? अब वह नेपाल इतिहास का अंग बन चुका है जो कभी भारत के साथ मिलकर उसका एक प्रान्त बनकर रहने को स्वेच्छा से तैयार था। तब वह चीन से डरता था और आजकल वह चीन की गोदी में खेल रहा है। खेल- खेल में चीन उसे शिक्षा दे रहा है और समझा रहा है कि-‘भारत की ओर मत देखना यह रूढि़वादी पिछड़े और पाखण्डी धर्म के मानने वाले लोगों का देश है। यदि प्रगति करनी है तो हमारे साथ आओ सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की गली सड़ी व्यवस्था और मानसिकता से ऊपर उठने की तैयारी करो।’ दुर्भाग्यपूर्ण बात ये है कि चीन की इन बातों को नेपाल ध्यान से सुन रहा है और न केवल सुन रहा है अपितु उन पर अमल भी कर रहा है।
ऐसे बदले हुए नेपाल में चीन की गतिविधियों का बढऩा अवश्यम्भावी है। मालदीव और चीन की बढ़ती निकटता को भी हमें इसी परिप्रेक्ष्य में देखने की आवश्यकता है। चीन पाकिस्तान के माध्यम से पहले से ही भारत को चारों ओर से घेरने की तैयारी करता रहा है। अब पाकिस्तानी आतंकियों को चीन की शह पर नेपाल भारत भेजा जा सकता है यद्यपि यह क्रम पूर्व से भी चलता रहा है। पर अब तो यह और भी तेजी से चलेगा।
नेपाली संसद के लिए सीधे चुनावों में वाम गठबन्धन को 165 सीटों में से 113 सीटें प्राप्त हुई हैं। जबकि भारत समर्थक मानी जाने वाली नेपाली कांग्रेस को मात्र 21 सीटों से ही सन्तोष करना पड़ा है। ऐसे में अब नेपाल में वामदलों की सरकार बनने का मार्ग प्रशस्त हो गया है।
भारत की सरकार को अब नेपाल के विषय में बहुत ही सावधान होकर कदम उठाने होंगे। तनिक सा प्रमाद या असावधानी ही भारी विनाश ला सकता है। इसलिए विदेश मंत्रालय को सदा जागते रहना होगा। राष्ट्र की रक्षा जागता हुआ नेतृत्व ही कर सकता है। झपकी लेता हुआ नेतृत्व तो पहले ही विनाश करा चुका है। नेपाल में अब वही ओली सरकार आने वाली है जो मधेशी आन्दोलन के समय भारत से अपने सम्बन्धों को सबसे निचले स्तर पर ले आयी थी और तब वह चीन की ओर फिसलने लगी थी। चीन उस समय नेपाल को हर प्रकार की सहायता देने के लिए तैयार हो गया था। उसे पता था किनेपाल को अपना बनाने के लिए कुछ तो करना ही पड़ेगा। यद्यपि भाजपा के महासचिव राम माधव के श्री के.पी. शर्मा ओली से अच्छे सम्बन्ध हैं, जिनके सहारे यह आशा की जा सकती है कि भारत नेपाल को अपना बनाये रख सकता है। पर केवल इसी आशा की किरण को सब कुछ मानने की भूल महंगी पड़ सकती है हमें यह समझना होगा कि के.पी शर्मा ओली का जो चेहरा हमें दिखायी दे रहा है उसके पीछे चीन और पाकिस्तान और उनके पीछे कई ऐसी अदृश्य शक्तियां खड़ी हैं जो भारत को आगे बढऩे देखना नहीं चाहतीं। राजनीति में एक चेहरे के पीछे छिपे हजारों चेहरों को पढऩे की आवश्यकता होती है।

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