महाजनपद काल – एक सम्पूर्ण यात्रा (भाग-10)-मगध महाजनपद

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उगता भारत ब्यूरो

मगध प्राचीन भारत के सोलह महाजनपद में से एक था । बौद्ध काल तथा परवर्तीकाल में उत्तरी भारत का सबसे अधिक शक्तिशाली जनपद था। इसकी स्थिति स्थूल रूप से दक्षिण बिहार के प्रदेश में थी। आधुनिक पटना तथा गया ज़िला इसमें शामिल थे । इसकी राजधानी गिरिव्रज थी । भगवान बुद्ध के पूर्व बृहद्रथ तथा जरासंध यहाँ के प्रतिष्ठित राजा थे । अभी इस नाम से बिहार में एक प्रमंडल है – मगध प्रमंडल।

मगध का सर्वप्रथम उल्लेख अथर्ववेद में मिलता है । इससे सूचित होता है कि प्राय: उत्तर वैदिक काल तक मगध, आर्य सभ्यता के प्रभाव क्षेत्र के बाहर था। अभियान चिन्तामणि के अनुसार मगध को कीकट कहा गया है । मगध बुद्धकालीन समय में एक शक्‍तिशाली राजतन्त्रों में एक था । यह दक्षिणी बिहार में स्थित था जो कालान्तर में उत्तर भारत का सर्वाधिक शक्‍तिशाली महाजनपद बन गया । यह गौरवमयी इतिहास और राजनीतिक एवं धार्मिकता का विश्‍व केन्द्र बन गया ।

मगध महाजनपद की सीमा उत्तर में गंगा से दक्षिण में विन्ध्य पर्वत तक, पूर्व में चम्पा से पश्‍चिम में सोन नदी तक विस्तृत थीं । मगध का सर्वप्रथम उल्लेख से सूचित होता है कि विश्वस्फटिक नामक राजा ने मगध में प्रथम बार वर्णों की परंपरा प्रचलित करके आर्य सभ्यता का प्रचार किया था।वाजसेनीय संहिता में मागधों या मगध के चारणों का उल्लेख है। मगध की प्राचीन राजधानी राजगृह थी । यह पाँच पहाड़ियों से घिरा नगर था । कालान्तर में मगध की राजधानी पाटलिपुत्र में स्थापित हुई । मगध राज्य में तत्कालीन शक्‍तिशाली राज्य कौशल, वत्स व अवन्ति को अपने जनपद में मिला लिया । इस प्रकार मगध का विस्तार अखण्ड भारत के रूप में हो गया और प्राचीन मगध का इतिहास ही भारत का इतिहास बना ।

मगध राज्य का विस्तार उत्तर में गंगा, पश्‍चिम में सोन तथा दक्षिण में जगंलाच्छादित पठारी प्रदेश तक था । पटना और गया ज़िला का क्षेत्र प्राचीनकाल में मगध के नाम से जाना जाता था । मगध प्राचीनकाल से ही राजनीतिक उत्थान, पतन एवं सामाजिक-धार्मिक जागृति का केन्द्र बिन्दु रहा है । मगध बुद्ध के समकालीन एक शक्‍तिकाली व संगठित राजतन्‍त्र था । गौतम बुद्ध के समय में मगध में बिंबिसार और तत्पश्चात् उसके पुत्र अजातशत्रु का राज था। इस समय मगध की कोसल जनपद से बड़ी अनबन थी यद्यपि कोसल-नरेश प्रसेनजित की कन्या का विवाह बिंबिसार से हुआ था। इस विवाह के फलस्वरूप काशी का जनपद मगधराज को दहेज के रूप में मिला था। यह मगध के उत्कर्ष का समय था और परवर्ती शतियों में इस जनपद की शक्ति बराबर बढ़ती रही।

चौथी शती ई.पू. में मगध के शासक नव नंद थे। इनके बाद चन्द्रगुप्त मौर्य तथा अशोक के राज्यकाल में मगध के प्रभावशाली राज्य की शक्ति अपने उच्चतम गौरव के शिखर पर पहुंची हुई थी और मगध की राजधानी पाटलिपुत्र भारत भर की राजनीतिक सत्ता का केंद्र बिंदु थी। मगध का महत्त्व इसके पश्चात् भी कई शतियों तक बना रहा और गुप्त काल के प्रारंभ में काफ़ी समय तक गुप्त साम्राज्य की राजधानी पाटलिपुत्र ही में रही। जान पड़ता है कि कालिदास के समय (संभवत: 5वीं शती ई.) में भी मगध की प्रतिष्ठा पूर्ववत् थी क्योंकि रघुवंश में इंदुमती के स्वयंवर के प्रसंग में मगधनरेश परंतप का भारत के सब राजाओं में सर्वप्रथम उल्लेख किया गया है। इसी प्रसंग में मगध-नरेश की राजधानी को कालिदास ने पुष्पपुर में बताया है।

गुप्त साम्राज्य की अवनति के साथ-साथ ही मगध की प्रतिष्ठा भी कम हो चली और छठी-सातवीं शतियों के पश्चात् मगध भारत का एक छोटा सा प्रांत मात्र रह गया। मध्यकाल में यह बिहार नामक प्रांत में विलीन हो गया और मगध का पूर्व गौरव इतिहास का विषय बन गया। जैन साहित्य में अनेक स्थलों पर मगध तथा उसकी राजधानी राजगृह (प्राकृत रायगिह) का उल्लेख है।कालान्तर में मगध का उत्तरोत्तर विकास होता गया और मगध का इतिहास (भारतीय संस्कृति और सभ्यता के विकास के प्रमुख स्तम्भ के रूप में) सम्पूर्ण भारतवर्ष का इतिहास बन गया । बिम्बिसार ने हर्यक वंश की स्थापना 544 ई. पू. में की । इसके साथ ही राजनीतिक शक्‍ति के रूप में बिहार का सर्वप्रथम उदय हुआ । बिम्बिसार को मगध साम्राज्य का वास्तविक संस्थापक/राजा माना जाता है । बिम्बिसार ने गिरिव्रज (राजगीर) को अपनी राजधानी बनायी । इसने वैवाहिक सम्बन्धों (कौशल, वैशाली एवं पंजाब) की नीति अपनाकर अपने साम्राज्य का विस्तार किया । यह ” मगध’ नामक क्षेत्र मध्य बिहार का एक भौगोलिक क्षेत्र हैं । राजनीतिक एवं प्रशासनिक मानचित्र में यह मुख्यत: मगध प्रमंडल के रूप में है । इस मगध प्रमंडल के ज़िले हैं- गया, औरंगाबाद, जहानाबाद, नवादा । प्रमंडल का मुख्यालय गया में ही है और यही है मगधांचल का सांस्कृति, राजनीतिक तथा व्यावसायिक केन्द्र । बिहार राज्य और नेपाल के तराई क्षेत्र में बोली जाने वाली बिहारी भाषाओं में मागधी को मागधी प्राकृत का आधुनिक प्रतिनिधि माना जाता है।

इस क्षेत्र में विभिन्न प्रकार की कलाएं प्राचीनकाल से ही है और यही कालांतर में कलाकारों की रोजी-रोटी तथा व्यवसाय का मुख्य साधन बनीं। हालांकि आधुनिक कलाओं, उत्पादों और व्यवसायों से पारंपरिक व्यवसाय प्रभावित जरुर हुआ है, फिर भी इन व्यवसायों एवं पारंपरिक उत्पादों का अपना महत्त्व एवं बाज़ार में पूछ भी है। इसलिए यह कहना कि ” आज के पारंपरिक उद्योगों पर संकट ही संकट है’ पूर्णत: उचित नहीं है ।

हम अब मगध क्षेत्र के पारंपरिक उद्योग से परिचित हो लें तथा इनसे जुड़े पारंपरिक व्यवसाय व्यापकता, वायपारिक घाटा लाभ, स्थानीय समस्याएं व उनके समाधान तथा अन्य तकनीकि पक्षों पर भी न डालते चलें । यहाँ के प्रमुख पारंपरिक उद्योगों में वस्र-उद्योग, मिष्टान्न उद्योग बांस से उत्पादित वस्तु उद्योग, पाषाण एवं काष्ठ मूर्ति उद्योग, वाद्य यंत्र उद्योग, ऊन एवं कंबल उद्योग, हस्तकला के अन्य उद्योग, शराब एवं ताड़ी उद्योग तथा गिट्टी उद्योग मुख्य हैं । उपरोक्त सभी पारंपरिक गुरु चेले वाले परंपरा चक्र से ही चलते आ रहे हैं और इसी परंपरा के तहत इसमें आवश्यक अनावश्यक रुपांतरण होते रहे हैं ।

मगध महाजनपद के उदय के कारण-

सोलह महाजनपदों में मगध, कोसल, वत्स और अवंति अधिक शक्तिशाली महाजनपद थे। इनमें भी मगध महाजनपद की अपनी विशिष्ट अवस्थिति थी जिसका लाभ मगध को मिला। लेकिन इतिहास में ऐसे कई दृष्टान्त हैं जिनसे स्पष्ट होता है कि मगध जैसे विशाल साम्राज्यों का उदय बगैर योग्य शासकों के संभव नहीं हो पाया था।

मगध उत्थान के प्रथम चरण में इसकी अवस्थिति की महत्ता निम्नलिखित रूपों में वर्णित है-

*लोहे के समृद्ध भण्डार मगध की आरंभिक राजधानी राजगीर से बहुत दूर नहीं थे, अत: लौह युग में मगध की भौगोलिक अवस्थिति बड़ी ही उपयुक्त थी। इससे मगध के शासक प्रभावी हथियारों का निर्माण करवा पाने में सक्षम थे।

*मगध राज्य मध्य गंगा के मैदान के बीच अवस्थित था। प्रयाग के पश्चिम के प्रदेश की अपेक्षा यह प्रदेश कहीं अधिक उपजाऊ था और यहाँ से जंगल भी साफ हो चुके थे। भारी वर्षा के कारण इस क्षेत्र को बिना सिंचाई के उत्पादक बनाया जा सकता था। फलस्वरूप यहाँ के किसान अधिशेष उपजा सकते थे।

*नगरों के उत्थान एवं सिक्कों के प्रचलन से भी फायदा मिला। पूर्वोत्तर भारत में वाणिज्य-व्यापार की वृद्धि से बिक्री की वस्तुओं पर चुंगी लगा सकते थे जिससे सेना के खर्च के लिये धन जुटाया जा सकता था।

*मगध की दोनों ही राजधानियाँ राजगीर एवं पाटलिपुत्र सामरिक दृष्टि से अत्यधिक महत्त्वपूर्ण स्थानों पर थीं। राजगीर पाँच पहाड़ियों की शृंखला से घिरा हुआ था। तत्कालीन समय में तोपों का आविष्कार न होने से राजगीर जैसे दुर्गों को तोड़ना आसान नहीं था।

*राजधानी पाटलिपुत्र गंगा, गंडक और सोन नदियों के संगम पर थी। जिससे थोड़ी दूर घाघरा नदी भी गंगा से मिलती थी। यहाँ से सभी दिशाओं में संचार संबंध कायम करना आसान था। प्राक-औद्योगिक दिनों में जब यातायात में कठिनाइयाँ थीं तब सेना इन्हीं नदी मार्गों से होकर पूरब, पश्चिम, उत्तर एवं दक्षिण दिशाओं में बढ़ती थी।

*मगध ऐसा पहला राज्य था जिसने अपने पड़ोसियों के विरुद्ध हाथियों का बड़े पैमाने पर प्रयोग किया जो कि पूर्वांचल से इनके पास पहुँचते थे। इनका प्रयोग दुर्गों को भेदने में, सड़कों एवं अन्य यातायात सुविधाओं से रहित प्रदेशों और कछारी क्षेत्रों में बखूबी किया जाता था।

मगध उत्थान के प्रथम चरण में इसके शासकों के योगदान की सीमा निम्नलिखित रूपों में वर्णित है-

*मगध ने बिम्बिसार के शासनकाल में विशिष्ट स्थान प्राप्त किया। इसके द्वारा शुरू की गई विजय व विस्तार की नीति अशोक के कलिंग विजय के साथ समाप्त हुई। इसने अंग देश पर अधिकार कर इसका शासन पुत्र आजीवक को सौंप दिया।

*बिम्बिसार ने वैवाहिक संबंधों के माध्यम से कोसल, वैशाली के लिच्छवि एवं पंजाब के मद्र कुल के साथ बेहतर संबंध कायम किये।

*अवंति एवं गांधार जैसे राज्यों के साथ विजय एवं कूटनीति के बल पर बिम्बिसार ने ईसा-पूर्व छठी सदी में सबसे शक्तिशाली राज्य कायम कर लिया।

*अजातशत्रु की विस्तारवादी नीति एवं उसके पुत्र उदयभद्र द्वारा काशी, अंग एवं वज्जियों के मगध में विलय से साम्राज्य काफी विस्तृत हो गया।

*नन्द राजवंश ने बिम्बिसार एवं अजातशत्रु के द्वारा डाली गई नींव पर प्रथम वृहत् साम्राज्य की स्थापना की।

निष्कर्षत: मगध साम्राज्य के उदय के प्रथम चरण में द्वितीय चरण के समान ही भौगोलिक, आर्थिक इत्यादि कारकों के साथ इसके शासकों का अहम योगदान परिलक्षित होता है। ऐसे साम्राज्यों के उदय में अवस्थिति एवं योग्य शासक एक-दूसरे के पूरक होते हैं जिसकी झलक दोनों ही चरणों में बखूबी देखने को मिलती है।

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