नकली दवा का दर्द

बाल मुकुंद ओझा
घटिया और नकली चिकित्सीय उत्पादों का बाजार, प्रभावी नियंत्रण के अभाव में, लगातार बढ़ रहा है। मानव स्वास्थ्य पर पड़ रहे इसके खतरनाक प्रभाव को लेकर विश्व स्वास्थ्य संगठन ने हाल ही में एक बेहद चौंकाने वाली रिपोर्ट जारी की है। भारत सहित अ_ासी देशों में किए गए अध्ययन पर आारित इस रिपोर्ट में कई ऐसे मामलों का ब्योरा है जिनमें घटिया और नकली दवाओं के कारण सैकड़ों मरीजों की जान चली गई। रिपोर्ट के मुताबिक 2007 से 2016 के दौरान 48,218 नमूनों के सौ अध्ययनों के विश्लेषण में करीब साढ़े दस फीसद दवाएं नकली या घटिया पाई गई हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन का कहना है कि वैश्वीकरण और ई-कॉमर्स ने आपूर्ति शृंखला की जटिलता बढ़ा दी है। अवै रूप से बनाई जा रही दवाओं के आपूर्ति शृंखला में शामिल होने का खतरा बढ़ गया है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, 2013 के बाद से नकली और घटिया चिकित्सीय उत्पादों की बाबत पंद्रह सौ रिपोर्टें मिली हैं। इनमें ज्यादातर एंटी-मलेरिया और एंटी-बायोटिक दवाएं शामिल हैं।
अंग्रेजी दवाओं का गड़बड़झाला भारत में शुरू से रहा है। इसके इनके दाम मनमाने तरीके से र्निारित होते रहे हैं। आम आदमी की समझ से बाहर होने के कारण अंग्रेजी दवाओं ने खौफनाक ढंग से देश के बाजार पर कब्जा कर लिया। इसमें विदेशी के साथ देशी कंपनियां भी शामिल थीं। नकली और घटिया दवाओं का बाजार खूब फला-फूला। एक रुपए में बनने वाली टेबलेट सौ रुपए में बेची गई। जीवनरक्षक दवाओं के दाम आसमान छूने लगे। राजनीतिक पार्टियों और सामाजिक संगठनों ने इस लूट के खिलाफ कभी जोरदार आवाज बुलंद नहीं की। दवा कंपनियां अपने राजनीतिक आकाओं के हित साने लगीं। मानव स्वास्थ्य के साथ सरेआम खिलवाड़ हुआ। जाने कितने लोग मौत के मुंह में समा गए तब जाकर राज्य-व्यवस्था की नींद टूटी। मगर आपाापी की कार्रवाई के आगे कुछ नहीं हुआ। मोदी सरकार आने के बाद इस गड़बड़झाले को समझने का प्रयास अवश्य हुआ। दवाइयां कुछ हद तक सस्ती भी हुईं, मगर अब भी सब कुछ ठीकठाक नहीं है। इसे समझने के लिए सर्वोच्च न्यायालय के किसी न्यायाीश की अध्यक्षता में आयोग के गठन की जरूरत है, जो दवा बाजार के गोरखें को उजागर कर सके। सबसे पहले दवाओं के तिलिस्म को समझने की जरूरत है।
एक रिपोर्ट के अनुसार, दुनिया में लगभग दो सौ अरब डॉलर का घटिया और नकली दवाओं तथा वैक्सीन का ंा है। एशिया में बिकने वाली तीस प्रतिशत दवाएं नकली या घटिया हैं। एक मोटा अनुमान यह है कि भारत में बिकने वाले हर पांच गोलियों के पत्तों में से एक नकली है। इन दवाओं से हर वर्ष लगभग पांच प्रतिशत न-हानि देश को होती है। और यह ंा बेरोकटोक चल रहा है और असली दवाओं के व्यापार से भी ज्यादा तरक्की कर रहा है। दो वर्ष पहले एक सर्वे से पता चला कि एशिया घटिया और नकली दवाओं का सबसे बड़ा उत्पादक है। नकली दवाओं और टीकों से हर वर्ष लगभग दस लाख लोग काल के गाल में समा जाते हैं। भारत के स्वास्थ्य मंत्रालय की मानें तो भारत में पांच प्रतिशत दवाएं चोर दरवाजे वाली और 0.3प्रतिशत नकली हैं।
एक सर्वे में बताया गया है कि भारत में लाखों-करोड़ों लोग हर रोज ऐसी ही दवाओं का सेवन कर रहे हैं, जिनसे या तो उनका मर्ज जस का तस है या और बढ़ रहा है, या फिर खतरनाक तत्त्वों के कारण वे असमय मौत के मुंह में केले जा रहे हैं। इंडियन मेडिकल एसोसिएशन ने भी केंद्र सरकार को सौंपी अपनी रिपोर्ट में दावा किया था कि देश में नकली व मिलावटी दवाओं का कारोबार कुल दवाओं के कारोबार का करीब पैंतीस प्रतिशत तक पहुंच गया है। सर्दी-जुकाम, बुखार और दर्द से निजात दिलाने वाली दवाएं, जो सबसे ज्यादा लिखी जाती हैं, चिकित्सीय मानकों पर सर्वाकि खराब और बेअसर साबित होती हैं। खराब दवाओं के कारण इलाज लंबा खिंचता है, या मर्ज और बिगड़ जाता है। फिर अतिरिक्त एंटीबायोटिक दवा लेनी पड़ती है, जिससे इलाज और ज्यादा महंगा हो जाता है। भारत में पिछले पांच साल में एंटीबायटिक प्रतिरोकता के मामले दो गुने हो गए हैं। सरकार ने देश भर के शहरी और ग्रामीण इलाकों की दवा दुकानों से सैंतालीस हजार नमूने एकत्र किए, जिनकी जांच में पाया गया कि दवा बाजार में 0.1 से 0.3 प्रतिशत दवाएं नकली हैं। इस सर्वेक्षण में एक स्वयंसेवी संस्था की भी मदद ली गई। सर्वेक्षण ने बताया कि नकली दवाओं में सबसे ज्यादा एंटीबायोटिक बिकती हैं जबकि उसके बाद बैक्टीरिया-रोक दवाओं का स्थान है। देश के कुल दवा बाजार का आकार तकरीबन 1 लाख 10 हजार करोड़ रुपए का है। अकितर नकल उन दवाओं की बनाई जाती है जिनमें मुनाफा काफी होता है यानी जिनकी लागतऔर विक्रय मूल्य का अंतर बहुत ज्यादा होता है।
कई डॉक्टर उन कंपनियों की दवाएं लिखते हैं, जो उन्हें महंगे-मंहगे उपहार देती हैं। कमीशनखोरी की भी चर्चा सुनी जाती है। इसमें सरकारी और निजी, दोनों क्षेत्रों के कुछ डॉक्टरों की भागीदारी से इनकार नहीं किया जा सकता। अक्सर देखा यह गया है कि नामचीन डॉक्टर द्वारा लिखी दवा उसके पास की दुकान पर ही मिलेगी। आप पूरा शहर छान मारिये आपको उक्त दवा कहीं और नहीं मिलेगी। यही नहीं, बड़े-बड़े अस्पतालों के डॉक्टरों द्वारा लिखी दवाएं आपको वहीं मिलेंगी, वह भी मनमाने दामों पर। इस गड़बड़झाले को सब समझते हैं मगर कोई कार्रवाई नहीं होती! यह भी देखा गया है कि सरकारी दुकानों में भी ये दवाएं खुलेआम बेची जाती हैं। जो दवा बाकी बाजार में दस रुपए में मिल जाएगी, वहयहां दुगुने-तिगुने दाम पर मिलेगी।
उपभोक्ता संगठनों के एक आकलन के अनुसार, ग्रामीण क्षेत्रों में बेची जाने वाली चालीस फीसद से ज्यादा दवाएं नकली और घटिया होती हैं। घपला दवा-निर्माण और दवा के थोक कारोबार में है तो दवा की दुकानें कहां से बेदाग होंगी! केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय के निर्देश पर नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ बायोलॉजिकल्स ने 2014-2016 में देश भर में सर्वे किया। सर्वे के दौरान सरकारी अस्पतालों, स्वास्थ्य केंद्रों और दवा की दुकानों से 47,954 नमूने लिये गए। इस सर्वे के नतीजे चौंकाने वाले निकले। बाजार से ज्यादा दवाओं की खराब गुणवत्ता सरकारी अस्पतालों में मिली। दुकानों पर जहां तीन फीसद दवाओं की गुणवत्ता खराब थी, वहीं सरकारी अस्पतालों में यह आंकड़ा दस फीसद था। सर्वे के दौरान फुटकर दुकानों में 0.023 फीसद नकली दवाएं पाई गईं। जबकि सरकारी केंद्रों में 0.059 फीसद। यानी कि फुटकर दुकानों से औसतन दोगुना। सर्वे के अनुसार, स्थिति में फिलहाल सुार हो रहा है। खराब दवाओं के मामले में उत्तर प्रदेश, पंजाब, उत्तराखंड, मिजोरम, तेलंगाना, मेघालय, नगालैंड और अरुणाचल प्रदेश अव्वल हैं। यहां 11.39 से 17.39 फीसद दवाएं खराब थीं। जबकि दिल्ली, ओडि़शा, तमिलनाडु, पश्चिम बंगाल और चंडीगढ़ में यह आंकड़ा 7.39 फीसद था। विश्व बैंक के मापदंड के अनुसार, डेढ़ सौ दुकानों तथा पचास दवा निर्माताओं के बीच एक दवा निरीक्षक होना चाहिए। भारत में यह पैमाना दूर-दूर तक लागू नहीं है। जांच प्रयोगशालाओं में मौजूद उपकरणों और रसायनों की दयनीयता का तो कहना ही क्या! नकली दवाओं से मरीज को ऐसी बीमारी हो सकती है जिसका इलाज शायद हमारे पास हो ही नहीं। फार्मासिस्ट नकली दवाओं का पता लगाने में मदद कर इसे रोक सकते हैं। उनकी भूमिका नियामक एजेंसियों से भी ज्यादा अहम है। मगर देखा गया है कि बाड़ ही खेत को खा रही है। मिलीभगत के खेल का कोई अंत नहीं है। मगर हर स्तर पर निगरानी बढ़ा कर इस पर अंकुश लगाया जा सकता है।

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