सफल मौद्रिक प्रबंधन और सफल विदेश नीति से विश्व पटल पर भारत की बढ़ती साख

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  • विवेक रंजन श्रीवास्तव

विगत वर्ष के परिप्रेक्ष्य में दुनिया के अन्य देशो की तुलना में भारत की प्रगति के आंकड़े देखें तो जहाँ कोरोना जनित कारणों से दुनिया के अनेक देशो की आर्थिक प्रगति बाधित रही है वहीँ आर्थिक समीक्षा 2021-22 के अनुसार भारतीय अर्थव्यवस्था 9.2 प्रतिशत की वास्तविक वृद्धि दर्ज कर रही है। वर्ष 2022-23 में भारत की आर्थिक विकास दर 8 प्रतिशत होने का अनुमान लगाया गया है। विश्व बैंक, एशियाई विकास बैंक और अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष के अनुमानों के अनुसार भी भारत 2021-24 के दौरान विश्व की प्रमुख तीव्रगामी अर्थव्यवस्था बना रहेगा।

देश ने अंतरिक्ष , रक्षा , सोलर पावर , तथा ओषधि अनुसन्धान तथा निर्माण के क्षेत्रों में असाधारण सफलताएं अर्जित की हैं। पारम्परिक निर्यात क्षेत्रो के अतिरिक्त कृषि निर्यात , रक्षा उपकरणों के निर्यात , वेक्सीन तथा दवा निर्यात , के साथ साथ विकसित देशों को भी अंतरिक्ष सेवाये देने में वैश्विक स्तर पर देश ने अनेकानेक सफलताएं पाई हैं। कृषि क्षेत्र में लगभग 4 प्रतिशत वृद्धि , औद्योगिक क्षेत्र में 7 प्रतिशत की विकास दर , सेवा क्षेत्र की वृद्धि दर लगभग 8 प्रतिशत दर्ज की गई है। दिसंबर 2021 में विदेशी मुद्रा भंडार 634 बिलियन अमरीकी डॉलर रहा, जो 13 महीनों से अधिक के आयात के समतुल्य और देश के विदेशी ऋण से भी अधिक है , 2021-22 में निवेश में 15 प्रतिशत की जोरदार वृद्धि होने का अनुमान व्यक्त किया गया है।

इन सारे आंकड़ों से परे यदि समवेत स्वरूप में देश को विश्व गुरु बनाने के संकल्प से सिद्धि के सूत्र को ध्यान में रखते हुए देखा जावे तो जहाँ एक ओर दुनियां के इंग्लैण्ड जैसे कई विकसित देशों सहित हमारे पडोसी देशों श्रीलंका , पाकिस्तान आदि की अर्थव्यवस्थाये ध्वस्त हो रही दिखती हैं , वहीँ भारत के राजकोषीय घाटे को बजट अनुमानों के 46 प्रतिशत तक सीमित कर लिया गया है , दुनिया पर मंडराते विश्व युद्ध के खतरे और महामारी के बावजूद पूंजी बाजार में अप्रैल-नवम्बर 2021 के दौरान 75 आईपीओ जारी करके 89 हजार करोड़ रुपये से अधिक की धनराशि जुटाई गई है , जो पिछले दशक के किसी भी वर्ष की तुलना में अधिक है। नवंबर, 2021 के अंत तक चीन, जापान और स्विट्ज़रलैंड के बाद भारत विश्व में चौथा सबसे अधिक विदेशी मुद्रा भंडार वाला देश है। देश के स्वर्ण भंडार में वृद्धि ,सुनियोजित मौद्रिक प्रबंधन का ही परिणाम है की रूपये को परस्पर व्यापार में वैश्विक मुद्रा के रूप में स्वीकार्यता हेतु अनेक देशों से सहमति प्रतिलक्षित हो रही है। ई रूपये की व्यवस्था , यू पी आई भुगतान प्रणाली , जैसे कदमो ने भारत को मुद्रा पप्रबंधन में विश्व गुरु के रूप में प्रस्तुत किया है। भारतीय समरसता की मुक्त वैश्विक विदेश नीति ने यू एन ओ जैसे संगठन के सम्मुख भी भारत विश्व गुरु की तरह सबका मार्ग प्रशस्त करता दिखता है। मैं विगत लगभग पांच महीनो से अमेरिका भ्रमण पर हूँ , मैं अपनी पिछली विदेश यात्राओं की तुलना में दुनियां के कई देशो के सामान्य नागरिको का भारत के प्रति बदलता नजरिया अनुभव करता हूँ तो गर्व से सीना फूल जाता है। मेरी दृष्टि में विश्व पटल पर भारत की धाक जमाने मे भारत के समवेत प्रयासों में हमारा मौद्रिक प्रबंधन मुझे गेम चेंजर प्रतीत होता है। (युवराज)


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