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डॉ राकेश कुमार आर्य की लेखनी से

पाकिस्तान को लेकर भारत सोये नहीं

ईसाई नये वर्ष 2018 की शुरूआत पाकिस्तान के लिए कष्टकारी रही है। इस देश की वास्तविकता को सारा संसार अब समझ रहा है। अमेरिका ने पाकिस्तान को ‘नया साल मुबारिक’ बोलते हुए अपने इस मित्र को दी जाने वाली 25 करोड़ 50 लाख डॉलर की सहायता राशि रोक दी है। अब पहली बार ‘ट्रम्प प्रशासन’ ने पाकिस्तान से यह स्पष्ट कहा है कि वह अपनी भूमि से आतंकवाद को प्रोत्साहित नहीं करेगा, पहले यह सुनिश्चित करे।
पाकिस्तान के लिए अमेरिका का यह कदम चौंकाने वाला है। सारा पाकिस्तान हिलकर रह गया है। पाकिस्तान की सेना के कठपुतली प्रधानमंत्री शाहिद खाकान अब्बासी ने अमेरिकी घोषणा के तुरंत पश्चात अपने मंत्रीमंडल की एक आपात बैठक बुलायी और अमेरिकी कदम से जन्मी परिस्थितियों पर विचार किया। अब मियांजी को दाल आटे का भाव पता चल गया है। अब जाकर पता चला है कि बुरे कामों का क्या परिणाम आता है? उस दिन से तो पाकिस्तान के शासक मौज लेते आ रहे थे और यह मानकर चल रहे थे कि सारा संसार उनकी मुट्ठी में है, और उनका कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता।
जहां तक भारत का सम्बन्ध है तो भारत पिछले दो दशकों से यह कहता आ रहा है कि पाकिस्तान एक आतंकी देश है और यह अपने को मिलने वाली किसी भी सहायता राशि का दुरूपयोग करते हुए आतंकी गतिविधियों को बढ़ावा देने में उसका प्रयोग कर रहा है। देर से ही सही पर अब अमेरिका सहित सारा संसार यह मानने लगा है कि पाकिस्तान की नीयत में खोट है और यह देश विश्व शान्ति का पक्षधर न होकर विश्व को नष्ट करने वाली शक्तियों को प्रोत्साहित करने वाला देश है। यह माना जा सकता है कि अमेरिका ने पाकिस्तान के विरूद्घ जो कदम उठाये हैं वे भारत समर्थक कम और चीन के वर्चस्व को रोकने वाले अधिक हैं। दक्षिणी एशिया को लेकर अमेरिकी नीतियों में जो परिवर्तन दिखायी दे रहा है वह अब ड्रैगन द्वारा ली जा रही अंगड़ाई को ध्यान में रखकर ही लिए जाने वाले निर्णयों की एक कड़ी है। कुछ लोगों की सोच हो सकती है कि अमेरिका ने चीन को रोकने के लिए उसके दोस्त पाकिस्तान के पर कतरे है। इसलिए भारत को अधिक खुश होने की आवश्यकता नहीं है। माना कि इस बात में कुछ सच है पर सच यह भी है कि अंतर्राष्ट्रीय कूटनीति में आने वाले उतार चढ़ावों की समीक्षा करना हर देश के लिए आवश्यक है। अत: अमेरिकी कूटनीति से यदि इस समय भारत को लाभ मिल रहा है तो उसे प्रसन्न होने का भी अधिकार है। भारत ही है जिसने पाकिस्तानी छद्मी चेहरे को विश्व मंचों पर बेनकाब किया है। आज भारत की कूटनीति भी जीत रही है जब पाकिस्तान का अमेरिका ‘हुक्का पानी बन्द’ कर रहा है। अंतत: एक बड़े स्तर के अभियान के पश्चात भारत को अपने लक्ष्य में सफलता मिली है।
अमेरिका आंख मूंदकर पिछले 16 वर्ष से पाकिस्तान को आर्थिक सहायता देता आ रहा था। जिस पर भारत केवल कागजी विरोध व्यक्त करता था और उससे अधिक कुछ कर पाने की स्थिति में वह नहीं था। अब भारत की विदेश नीति अपने प्रभावी दौर में है और उसकी बात को विश्व बिरादरी बड़े ध्यान से सुनने लगी है। ऐसे में पाकिस्तान का ‘हुक्का पानी बन्द’ करने में अमेरिका ने भारत की बात को ध्यान में रखे बिना ही उक्त निर्णय लिया होगा आज ऐसा एकदम झटके से कोई नहीं कह सकता।
पाकिस्तान ने पिछले दिनों हमारे कूलभूषण जाधव की मां और पत्नी के साथ जिस प्रकार का अपमानजनक व्यवहार किया, उससे भी अंतर्राष्ट्रीय बिरादरी को यह समझने में सुविधा रही है कि यह देश जंगली लोगों का देश है जो केवल ‘जूते की भाषा’ जानता है और उससे अलग वह कुछ नहीं जानता है। कुलभूषण जाधव के मामले में मानवतावादी दृष्टिकोण अपनाकर पाकिस्तान भारत के निकट आ सकता था। साथ ही अंतर्राष्ट्रीय बिरादरी को यह भी समझा सकता था कि भारत जिस प्रकार उसे एक असभ्य, बर्बर, व आतंकी देश घोषित कराना चाहता है-वास्तव में वह ऐसा है नहीं। इसके विपरीत पाकिस्तान ने कुलभूषण जाधव की मां और पत्नी के साथ अपमानजनक व्यवहार करके यह सिद्घ कर दिया कि भारत उसे जिस प्रकार का सिद्घ करता है वह वैसा ही है। इस प्रकार पाकिस्तान ने भारत के अभियान को एक प्रचार के रूप में परिवर्तित कर दिया। जिससे अमेरिका को भी पाकिस्तान को समझने में सुविधा रही।
इधर आसाम और पूर्वोत्तर भारत भी 1947 से ही अर्थात देश के बंटवारे के समय से ही पाकिस्तान द्वारा प्रायोजित आतंकवाद से पीडि़त रहा है। पाकिस्तान ने 1947 से ही पूर्वोत्तर और विशेषत: असम के जनसांख्यिकीय आंकड़े को गड़बड़ाने के लिए वहां मुस्लिमों की अवैध घुसपैठ करानी आरम्भ कर दी थी। जिससे यह प्रान्त शान्तिप्रिय लोगों का प्रान्त होने के उपरान्त भी बार-बार खूनी संघर्षों को देखता रहा। जब पाकिस्तान से अलग होकर बांग्लादेश बन गया तो भी पाकिस्तानी शासकों की नीतियां आसाम और पूर्वोत्तर भारत के लिए वैसे ही काम करती रहीं जैसे पहले से करती आ रही थीं। यद्यपि हम बांग्लादेश को अपना भाई मानने की वैसी ही मूर्खता कर रहे थे जैसी हमने 1962 से पूर्व चीन को अपना भाई मानने की भूल की थी। हम भूल करते रहे और शत्रु पाकिस्तान बांग्लादेश को ‘अपना भाई’ बनाकर उसके घुसपैठियों को आसाम में भेजकर वहां के जनसांख्यिकीय आंकड़े को गड़बड़ाता रहा। इसके लिए ऑल असम स्टॅडेंट्स यूनियन (आसू) को वहां 1979 से 1985 तक सात वर्षीय संघर्ष करना पड़ा। आसाम को बार-बार साम्प्रदायिक दंगों की आग में झुलसना पड़ा और वहां कितनी ही अनमोल जानें मजहबी जुनून के कारण चली गयीं। अब वहां हिंदुओं की जन्म दर में 7.2 प्रतिशत की कमी आ गयी है। बांग्ला भाषी लोगों की संख्या वहां 6 फीसदी बढ़ी है तो असमी बोलने वालों की संख्या में 9 प्रतिशत कमी आयी है। 2011 की जनगणना के आंकड़े इन तथ्यों की पुष्टि करते हैं।
कहने का अभिप्राय है कि भारत पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद का पिछले सत्तर वर्ष से सामना करता आ रहा है। अब आसाम में भी विदेशियों की घुसपैठ को चिन्हित करने की प्रक्रिया में तेजी आयी है। लोगों को पता चल रहा है कि वास्तव में पूर्वोत्तर की अशान्ति के पीछे भी पाकिस्तान का ही हाथ रहा है यह अलग बात है कि यह हाथ आजकल हमें सीधे तौर पर बांग्लादेश का जान पड़ता है-पर वास्तव में पाकिस्तानी मानसिकता ही वहां काम कर रही है।
ऐसे में भारत को पाकिस्तान पर अमेरिका के कसते शिकंजे को लेकर प्रसन्न तो होना चाहिए पर साथ ही सावधान भी होना चाहिए। पाकिस्तान की प्रकृति में ही आतंकवाद है, वह आतंकवादी सोच का देश है, उसने आतंक और खून की खेती का अपना राष्ट्रीय चरित्र विकसित किया है। ऐसे में वह अमेरिका से झुंझलाकर चोट अमेरिका पर ना करके भारत पर कर सकता है। सीमाओं पर हिंसक झड़पें बढ़ रही हैं, ये कुछ बताती हैं कि अब तक अमेरिका ने पाकिस्तान को जितनी सहायता दी है उससे भारत को क्षति पहुंचाने के लिए पाकिस्तान तैयारी कर चुका है। भारत सोये नहीं, जागता रहे। समय चुनौती को चुनौती देने का है। यदि चुनौती को पहचानने में चूक की गयी तो अनर्थ हो जाएगा।

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