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हमारे क्रांतिकारी / महापुरुष

स्वामी दयानंद किसी की निंदा या आलोचना नहीं अपितु सत्य का मंडन और असत्य का खंडन करते थे

स्वामी दयानंद जी महाराज द्वारा रचित अमर ग्रन्थ सत्यार्थ प्रकाश का सबसे अधिक प्रचार आर्यसमाज से सम्बन्ध रखने वाले सदस्यों की अपेक्षा आर्यसमाज से सम्बन्ध न रखने वाले जनमानस ने अधिक किया हैं चाहे वह सनातन धर्म,सिख ,कबीर पंथी,जैन, बौद्ध,सिख, ईसाई, इस्लाम आदि किसी भी मत से क्यूँ न सम्बंधित हो। सत्यार्थ प्रकाश के खंडन में अनेक पुस्तकें रची गयी, अनेक पुस्तकें उनके प्रतिउत्तर के रूप रची गयी जिससे स्वामी दयानंद के मंतव्य को उचित रूप से समझा जा सके, अनेक लिखित एवं मौखिक शास्त्रार्थ हुए, महाशय राजपाल,वीर परमानन्द आदि अनेक आर्यवीरों ने अपने बलिदान भी दिए परन्तु यह सब प्रयोजन किसलिए था।
स्वामी दयानन्द जी के ही शब्दों में

 “इन सब मतवादियों, इनके चेलों और अन्य सबको परस्पर सत्यासत्य के विचार करने में अधिक परिश्रम न हो इसलिए यह ग्रन्थ बनाया हैं। जो इसमें सत्य का मंडन और असत्य का खंडन किया हैं वह सबको बताना ही प्रयोजन समझा गया हैं। इसमें जैसी मेरी बुद्धि ,जितनी विद्या औ जितना इन चारों मतों के मूल ग्रन्थ देखने से बोध हुआ हैं उसको सबके आगे निवेदन कर देना मैंने उत्तम समझा हैं क्यूंकि विज्ञान गुप्त हुए का पुन: मिलना सहज नहीं हैं। पक्ष पात छोड़कर इसको देखने से सत्यासत्य मत सबको विदित हो जायेगा। इस मेरे कर्म से यदि उपकार न मानें तो विरोध भी न करें क्यूंकि मेरा तात्पर्य किसी की हानि या विरोध करने में नहीं किन्तु सत्यासत्य का निर्णय करने कराने का हैं। इसी प्रकार सब मनुष्यों को न्याय दृष्टी से जतना अति उचित हैं। मनुष्य जन्म का होना सत्य असत्य का निर्णय करने कराने के लिए हैं। इसी मत मतान्तर के विवाद से जगत में जो जो अनिष्ट फल हुए , होते हैं और होंगे उनको पक्ष पात रहित विद्वतजन जान सकते हैं। जब तक इस मनुष्य जाति में परस्पर मिथ्या मत मतान्तर का विरुद्ध वाद न छुटेगा तब तक अन्याय न्याय का आनंद न होगा। सन्दर्भ- सत्यार्थ प्रकाश अनुभुमिका १ ”

१२ वें समुल्लास की भुमिका में स्वामी दयानंद जी लिखते हैं “इसमें जैनी लोगों को बुरा न मानना चाहिए क्यूंकि जो जो हमने इनके मत विषय में लिखा हैं वह केवल सत्यासत्य के निर्णयार्थ हैं न की विरोध या हानि करने के अर्थ। सन्दर्भ अनुभुमिका २ ”
१३ वें समुल्लास की भुमिका में स्वामी दयानंद जी लिखते हैं “यह लेख केवल सत्य की वृद्धि और असत्य के ह्रास होने के लिए लिखे हैं न की किसी को दुःख देने व हनी करने व मिथ्या दोष लगाने के अर्थ। ” अनुभुमिका ३

स्वामी दयानंद द्वारा सत्यार्थ प्रकाश के १४ समुल्लास की रचना के बाद कुरान के भाष्य में , उसके समझने में भी अनेक परिवर्तन हुए। इस्लाम से सम्बंधित बुद्धिजीवी वर्ग ने स्वामी दयानंद के मंतव्य के अनुकूल कुरान की नवीन व्याख्या करने का प्रयास करना आरंभ किया जिसके कुछ प्रमाण इस प्रकार हैं।

मौलाना अब्दुल कलाम आज़ाद लिखते हैं-

१. मनुष्य का कल्याण और उसकी मुक्ति उसके विश्वास और कर्मों पर निर्भर हैं न की सम्प्रदाय विशेष पर।
२. मनुष्य मात्र के लिए ईश्वरीय धर्म एक ही हैं और एक समान सबका उसकी शिक्षा दी गई हैं। इसलिए धर्मों के अनुयायियों ने धर्म की एकता और उसके विश्वव्यापी तत्व को नष्ट कर जो बहुत से विरोधी और परस्पर लड़ने वाले जत्थे बना लिए हैं यह साफ उनकी गुमराही हैं।
३. धर्म की जड़ एकेश्वरवाद हैं , यानी एक विशवम्भर प्रभु की सीधी उपासना और सब धर्म पर्वतकों ने इसी की शिक्षा दी हैं।
(सन्दर्भ मौलाना अब्दुल कलाम आज़ाद कृत ‘कुरान और धार्मिक मत भेद’ पृष्ठ ४७-४८)

मौलाना मुहम्मद अली अपनी कुरान के अंग्रेजी अनुवाद में लिखते हैं

1 .The waging of war on unbelievers to compel them to accept Islam is a myth pure and simple a thing unknown to the Holy Quran. (Ref- Introduction P C VIII)

अर्थात अविश्वासियों के विरुद्ध इन उद्दश्य से युद्ध किया जाये जिससे उन्हें मुस्लमान बनने के लिए बाधित किया जा सके। यह कोरी गप्प हैं जो कुरान के सर्वथा विरुद्ध हैं।

2 .The description of paradise as a garden with rivers flowing in it,is only a parable rivers corrosponding to faith and the trees of the garden corresponding to the good which a man does. Evidently the fruits of the deeds are meant here and not the fruit that the earth grows. Similar is the case with the water, the milk, the clothes and the adornments of the next life, they are not things of this life. (Ref- Introduction P C IXIIL)

अर्थात स्वर्ग का वर्णन एक बाग के रूप में जिसमें नदिया बह रही हैं केवल एक अलंकार हैं। नदियों से विश्वास का वृक्षों से कर्मों का तथा फलों से कर्म फलों का तात्पर्य हैं। जल, दूध, शहद, गद्दे, वस्त्र, भूषण आदि इस लोक की वस्तुएँ नहीं हैं इत्यादि।

निंदा और खंडन में क्या अंतर हैं?

निंदा करने वाला व्यक्ति किसी तथ्य, किसी भी सिद्धांत की, किसी भी मान्यता की, किसी भी व्यक्ति की, किसी भी विचारधारा की सदा आलोचना करता रहता हैं, वह इस बात को दरकिनार करता हैं की सामने वाला व्यक्ति सत्य कह रहा हैं अथवा असत्य।
अर्थात उसे दुसरे की बुराई करनी ही हैं।

इसका एक प्रत्यक्ष उदहारण कुरान को मानने वाले मुस्लिम भाई हैं। जैसे की उनके अनुसार एक व्यक्ति जिसका जन्म इस्लाम में न हुआ हो, जिसने कोई भी पाप कर्म न किया हो, जो सदा दूसरों का भला करता हो वह व्यक्ति इसलिये गलत हैं की वह कुरान के ईश्वर अल्लाह और उनके अंतिम पैगम्बर रसूल में विश्वास नहीं लाता।

इस्लाम मानने वालो की मान्यता निंदा के समान हैं क्यूंकि धर्म का मूल उद्देश्य सत्य श्रेष्ठ मार्ग पर चलना हैं।

पर वे सामने वाले व्यक्ति के कर्मों को दरकिनार कर यह पहले देखते हैं की वह मुसलमान हैं या नहीं हैं। अगर नहीं हैं तो दुश्मन के समान हैं। इसलिए उसकी आलोचना करना, उसका विरोध करना वह निंदा कहलाता हैं।

खंडन किसे कहते हैं?

सत्य को सत्य कहना और असत्य को असत्य कहना महापुरुषों का चरित्र होता हैं। स्वामी दयानंद का उद्देश्य किसी भी धर्म विशेष की आलोचना करना नहीं था अपितु धर्म के नाम पर जो पाखंड, आडम्बर, अत्याचार, शत्रुता, मार काट इतिहास में होती आई हैं और हो रही हैं उसकी आलोचना करना खंडन कहलाता हैं।

और सत्यार्थ प्रकाश में स्वामी दयानंद ने न केवल अपने घर की सफाई की हैं अपितु विदेश सेमेटिक मतों , नास्तिक मतों को भी समान रूप से तर्क की कसौटी पर कसा हैं।
इसलिए सर्वप्रथम स्वामी दयानंद के मंतव्य और उद्देश्य को समझे बिना उन पर शंका करना मुर्खता नहीं तो और क्या हैं।

#डॉविवेकआर्य

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