देश को हीरा दे गोलोक गई हीराबा

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मां ,सिर्फ एक शब्द नहीं भावना होती है स्नेह, धैर्य, विश्वास, समाया था मोदी की मां में । बेटे से कहती थी कभी रिश्वत मत लेना, किसी का बुरा मत करना।
डॉ घनश्याम बादल

देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र दामोदरदास मोदी की मां श्रीमती हीरा बा अब नश्वर शरीर को छोड़कर परम धाम चली गई हैं । एक प्रधानमंत्री की मां होने के बावजूद उन्होंने बहुत साधारण जीवन जिया । जब नरेंद्र मोदी मुख्यमंत्री थे तब भी हीराबेन एक साधारण महिला की तरह ही जीती थी और जब वें प्रधानमंत्री बन गए तब भी उनकी जीवन शैली में कोई खास फर्क नहीं आया ।

एक जमीन से जुड़ी, संघर्षशील, अपनी संतानों के प्रति स्नेह से ओतप्रोत अपनी दिनचर्या के सब काम खुद करने वाली, संघर्षों में अपने पति का कंधे से कंधा मिलाकर साथ देने वाली, बेटे के युवावस्था में ही संन्यास लेने या घर छोड़कर जाने के निर्णय पर अपने पति को मनाने वाली, हीराबेन अगले वर्ष 18 जून को 100 साल पूरे कर चुकी होती लेकिन 30 दिसंबर को लगभग 6 महीने पहले ही ईश्वर ने उन्हें अपने पास बुला लिया ।
यह मां के ही संस्कार रहे होंगे कि नरेंद्र दामोदरदास मोदी भले ही सूट दस लाख का पहनते हों मगर मां के सामने जाकर नतमस्तक हो जाते थे, उनके चरण छूते थे, उनकी बनाई खिचड़ी खाते थे, और अपने जीवन को संवारने के लिए हमेशा अपनी मां का शुक्रिया अदा करते रहे ।
29 दिसंबर को ही वें अहमदाबाद में उन्हें देखने भी गए और जब लगा कि मां ठीक हो जाएंगी तो वापस आ गए लेकिन मां अगले ही दिन सभी बीमारियों से मुक्त होकर गोलोक वासी हो गई ।
नरेंद्र दामोदरदास मोदी भले ही देश के लिए प्रधानमंत्री हैं, दुश्मनों एवं राजनीतिक विरोधियों के लिए कट56 ईंच का सीना रखते हो मगर जब मां की बात आती तो वें हमेशा भावुक ही दिखाई दिए ।
अपने ब्लॉग में उन्होंने अपनी मां पर बहुत विस्तार से लिखा है उसी के कुछ अंश हीराबेन उर्फ हीरा बा को श्रद्धांजलि रूप में यहां उद्धृत कर रहा हूं।
मां , ये सिर्फ एक शब्द नहीं है। जीवन की ये वो भावना होती है जिसमें स्नेह, धैर्य, विश्वास, कितना कुछ समाया होता है। दुनिया का कोई भी कोना हो, कोई भी देश हो, हर संतान के मन में सबसे अनमोल स्नेह मां के लिए होता है। मां, सिर्फ हमारा शरीर ही नहीं गढ़ती बल्कि हमारा मन, हमारा व्यक्तित्व, हमारा आत्मविश्वास भी गढ़ती है। और अपनी संतान के लिए ऐसा करते हुए वो खुद को खपा देती है, खुद को भुला देती है।

अपनी मां के 100 वें वर्ष में प्रवेश करने पर नरेंद्र मोदी लिखते हैं
“आज मैं अपनी खुशी, अपना सौभाग्य, आप सबसे साझा करना चाहता हूं। मेरी मां, हीराबा आज 18 जून को अपने सौवें वर्ष में प्रवेश कर रही हैं। यानि उनका जन्म शताब्दी वर्ष प्रारंभ हो रहा है। पिताजी आज होते, तो पिछले सप्ताह वो भी 100 वर्ष के हो गए होते। यानि 2022 एक ऐसा वर्ष है जब मेरी मां का जन्मशताब्दी वर्ष प्रारंभ हो रहा है और इसी साल मेरे पिताजी का जन्मशताब्दी वर्ष पूर्ण हुआ है।
पिछले ही हफ्ते मेरे भतीजे ने गांधीनगर से मां के कुछ वीडियो भेजे हैं। घर पर सोसायटी के कुछ नौजवान लड़के आए हैं, पिताजी की तस्वीर कुर्सी पर रखी है, भजन कीर्तन चल रहा है और मां मगन होकर भजन गा रही हैं, मंजीरा बजा रही हैं। मां आज भी वैसी ही हैं। शरीर की ऊर्जा भले कम हो गई है लेकिन मन की ऊर्जा यथावत है।

वैसे हमारे यहां जन्मदिन मनाने की कोई परंपरा नहीं रही है। लेकिन परिवार में जो नई पीढ़ी के बच्चे हैं उन्होंने पिताजी के जन्मशती वर्ष में इस बार 100 पेड़ लगाए हैं।”
एक बेटा अपनी मां को किस नजरिए से देखता है इसे मोदी के ब्लॉग से समझा जा सकता है

मेरी मां जितनी सामान्य हैं, उतनी ही असाधारण भी। ठीक वैसे ही, जैसे हर मां होती है। आज जब मैं अपनी मां के बारे में लिख रहा हूं, तो पढ़ते हुए आपको भी ये लग सकता है कि अरे, मेरी मां भी तो ऐसी ही हैं, मेरी मां भी तो ऐसा ही किया करती हैं। ये पढ़ते हुए आपके मन में अपनी मां की छवि उभरेगी।

मां की तपस्या, उसकी संतान को, सही इंसान बनाती है। मां की ममता, उसकी संतान को मानवीय संवेदनाओं से भरती है। मां एक व्यक्ति नहीं है, एक व्यक्तित्व नहीं है, मां एक स्वरूप है। हमारे यहां कहते हैं, जैसा भक्त वैसा भगवान। वैसे ही अपने मन के भाव के अनुसार, हम मां के स्वरूप को अनुभव कर सकते हैं।

मां हीरबा के जीवन वृत्त का सार संक्षेप इस तरह लिखा है “नरेंद्र मोदी ने अपने ब्लॉग में
“मेरी मां का जन्म, मेहसाणा जिले के विसनगर में हुआ था। वडनगर से ये बहुत दूर नहीं है। मेरी मां को अपनी मां यानि मेरी नानी का प्यार नसीब नहीं हुआ था। एक शताब्दी पहले आई वैश्विक महामारी का प्रभाव तब बहुत वर्षों तक रहा था। उसी महामारी ने मेरी नानी को भी मेरी मां से छीन लिया था। मां तब कुछ ही दिनों की रही होंगी। उन्हें मेरी नानी का चेहरा, उनकी गोद कुछ भी याद नहीं है। आप सोचिए, मेरी मां का बचपन मां के बिना ही बीता, वो अपनी मां से जिद नहीं कर पाईं, उनके आंचल में सिर नहीं छिपा पाईं। मां को अक्षर ज्ञान भी नसीब नहीं हुआ, उन्होंने स्कूल का दरवाजा भी नहीं देखा। उन्होंने देखी तो सिर्फ गरीबी और घर में हर तरफ अभाव।
उनके बचपन को अपनी लेखनी से नरेंद्र मोदी इस तरह प्रस्तुत करते हैं
“हम आज के समय में इन स्थितियों को जोड़कर देखें तो कल्पना कर सकते हैं कि मेरी मां का बचपन कितनी मुश्किलों भरा था। शायद ईश्वर ने उनके जीवन को इसी प्रकार से गढ़ने की सोची थी। आज उन परिस्थितियों के बारे में मां सोचती हैं, तो कहती हैं कि ये ईश्वर की ही इच्छा रही होगी। लेकिन अपनी मां को खोने का, उनका चेहरा तक ना देख पाने का दर्द उन्हें आज भी है।

बचपन के संघर्षों ने मेरी मां को उम्र से बहुत पहले बड़ा कर दिया था। वो अपने परिवार में सबसे बड़ी थीं और जब शादी हुई तो भी सबसे बड़ी बहू बनीं। बचपन में जिस तरह वो अपने घर में सभी की चिंता करती थीं, सभी का ध्यान रखती थीं, सारे कामकाज की जिम्मेदारी उठाती थीं, वैसे ही जिम्मेदारियां उन्हें ससुराल में उठानी पड़ीं। इन जिम्मेदारियों के बीच, इन परेशानियों के बीच, मां हमेशा शांत मन से, हर स्थिति में परिवार को संभाले रहीं।

वडनगर के जिस घर में हम लोग रहा करते थे वो बहुत ही छोटा था। उस घर में कोई खिड़की नहीं थी, कोई बाथरूम नहीं था, कोई शौचालय नहीं था। कुल मिलाकर मिट्टी की दीवारों और खपरैल की छत से बना वो एक-डेढ़ कमरे का ढांचा ही हमारा घर था, उसी में मां-पिताजी, हम सब भाई-बहन रहा करते थे।
उस छोटे से घर में मां को खाना बनाने में कुछ सहूलियत रहे इसलिए पिताजी ने घर में बांस की फट्टी और लकड़ी के पटरों की मदद से एक मचान जैसी बनवा दी थी। वही मचान हमारे घर की रसोई थी। मां उसी पर चढ़कर खाना बनाया करती थीं और हम लोग उसी पर बैठकर खाना खाया करते थे।

सामान्य रूप से जहां अभाव रहता है, वहां तनाव भी रहता है। मेरे माता-पिता की विशेषता रही कि अभाव के बीच उन्होंने घर में कभी तनाव को हावी नहीं होने दिया। दोनों ने ही अपनी-अपनी जिम्मेदारियां साझा की हुईं थीं।

मां समय की पाबंद थीं। उन्हें भी सुबह 4 बजे उठने की आदत थी। सुबह-सुबह ही वो बहुत सारे काम निपटा लिया करती थीं। गेहूं पीसना हो, बाजरा पीसना हो, चावल या दाल बीनना हो, सारे काम वो खुद करती थीं। काम करते हुए मां अपने कुछ पसंदीदा भजन या प्रभातियां गुनगुनाती रहती थीं। नरसी मेहता जी का एक प्रसिद्ध भजन है “जलकमल छांडी जाने बाला, स्वामी अमारो जागशे” वो उन्हें बहुत पसंद है। एक लोरी भी है, “शिवाजी नु हालरडु”, मां ये भी बहुत गुनगुनाती थीं।

घर चलाने के लिए दो चार पैसे ज्यादा मिल जाएं, इसके लिए मां दूसरों के घर के बर्तन भी मांजा करती थीं। समय निकालकर चरखा भी चलाया करती थीं क्योंकि उससे भी कुछ पैसे जुट जाते थे। कपास के छिलके से रूई निकालने का काम, रुई से धागे बनाने का काम, ये सब कुछ मां खुद ही करती थीं। उन्हें डर रहता था कि कपास के छिलकों के कांटें हमें चुभ ना जाएं ।

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