राजनीतिक भीख नहीं तपोवन सत्र

माननीय विधायक अगर वाकआउट करें, तो खर्च का हिसाब लगाना वाजिब है, लेकिन सदन में सत्र के दिन बढ़ें तो लोकतांत्रिक प्रासंगिकता बढ़ती है। अत: तपोवन में विधानसभा का ताप बढ़ाने के लिए सत्र की अवधि में विस्तार की गुंजाइश हमेशा रहेगी। 
विधानसभा का तपोवन में होना या शीतकालीन सत्र के दौरान होने की आशा में जनता का होना कितना प्रासंगिक है, इस पर बहस है और जरूरत भी। मात्र चार दिन के सत्र में क्या खोया इस पर बहस करने के बजाय क्या पाया, देखना होगा। ये फरियादी कौन थे जो तपोवन को अपनी आशाओं के गुलदस्ते के रूप में देखते हैं। हर दिन की भीड़ किसी प्रलोभन या विशेष मदद पाने को नहीं आई, बल्कि तपोवन में मुलाकात भी एक त्योहार है। क्या हिमाचल के अस्तित्व और पूर्ण राज्यत्व में पंजाब के पहाड़ी क्षेत्रों का मिलन एक सौगात नहीं थी। क्या आधे से अधिक हिमाचल को पाना या खोना, तपोवन की भूमिका में दिखाई नहीं देता। इसे खारिज करने के कई तर्क हो सकते हैं, लेकिन इसे हासिल करने की वजह यहां की राजनीतिक क्रमागत तरक्की है। यह एक सियासी संतुलन है और क्षेत्रवाद के हरकारों को रोकने का श्रम भी। हम वीरभद्र सिंह की सोच को नागफनी मानकर चलेंगे, तो आने वाली सरकारों को वर्षों तक स्लेट साफ करनी पड़ेगी, लेकिन कुछ मूल प्रश्न हमेशा बड़े फैसलों से ही दफन होते हैं। तपोवन एक राजनीतिक शास्त्र है, लेकिन इसके अर्थशास्त्र में भी खोज हो सकती है। अगर तपोवन विधानसभा परिसर एक अनावश्यक खर्च है, तो उस खर्च का हिसाब करें जो पांगी-भरमौर से बड़ा भंगाल तक के हिमाचली को शिमला की राह खोजने में करना पड़ता है।
प्रदेश के आधे से अधिक विधायकों का तपोवन में आना कम खर्चीला होता है, जबकि शिमला का सफर, आम जनता की जेब पर भारी पड़ता है। विधानसभा का यहां आना और सक्रिय रहना, कम जरूरी कैसे हो सकता है। क्या संपर्कों के बिना शिमला के सचिवालय में घुसना मुनासिब है। क्या सचिवालय में बैठकर प्रदेश को समझ लेना आसान है। क्या सचिवालय की ज्यादा शक्ति स्थानांतरण पर जाया नहीं होती। अगर तपोवन का नामोनिशान मिटाना इतना ही जरूरी है, तो सचिवालय में सारे प्रदेश को प्रतिनिधित्व देने के लिए क्यों न स्थानांतरण की छूट दी जाए। सरकार को चाहिए कि तपोवन परिसर में विधायी कार्य कम से कम पंद्रह दिन चलें, ताकि हर गूंज स्वाभाविक व व्यावहारिक बने। यह राजनीतिक शोध का विषय है कि क्यों तपोवन परिसर में जनता सैलाब बनकर आती है और शिमला केवल जमघट बनकर रह जाता है।
ऐसे में ई- विधान अकादमी सरीखी परियोजना तपोवन परिसर से जोड़ी जाए। न्याय की परिपाटी में राजनीति की भूमिका को बेदखल नहीं किया जा सकता है। अगर पंजाब के पर्वतीय क्षेत्र हिमाचल में शामिल न होते, तो शिमला में भी राज्य की बहस बहरी रहती। आज भी सत्ता के हर मुकाम में नाम चाहे शिमला का लिखा जाए, मगर राजनीतिक क्षमता के मैदान कहीं निचले या मैदानी इलाकों में हैं। राजनीति की इसी रीढ़ पर लोटते सांप को हटाने की कोशिश में वीरभद्र सरकार ने हर पड़ाव पर एक नाम दिया। तपोवन को अर्थतंत्र की वकालत में देखने के बजाय इसे राजनीति के बड़े दर्शन में समझना होगा। यहां आकर क्षेत्रवाद खत्म होता है। शिमला सचिवालय का खुमार खत्म होता है। सत्ता की भाषा बदलती है, तो योजनाओं का आकार बदलता है। शिमला से धर्मशाला तक का सफर चलकर कैसे पूरा होता है, इसे जब सचिव स्तर के लोग समझते हैं तो सदन की बहस भी सुनने लगती है। यही एक अवसर और परिपाटी है, जो सचिवालय की धडक़न को जमीन से जोड़ती है। विधानसभा परिसर के समीप जोरावर स्टेडियम तक पहुंचे काफिलों के उत्साह और उमंगों से पूछिए कि तपोवन के आबाद होने की कीमत कितनी है। बेशक रमेश धवाला सरीखे विधायक का तर्क प्रदेश का बजट बचाने में मदद करे, लेकिन जिस बजट से नागरिक यहां मुलाकात कर पाते हैं, शिमला में मुमकिन नहीं। फरियादियों के कदमों की आहट और उनके आने की सियासी कीमत कितनी है, यह तपोवन विधानसभा परिसर की नींव बताती है। भौगोलिक परीक्षण राजनीतिक सतह पर होने लगेंगे, तो सांस्कृतिक विषय गौण हो जाएंगे। भाजपा की पिछली सत्ता में जिलों को तोडक़र राजनीतिक वर्चस्व के नए केंद्र खोजे, लेकिन हिमाचल की असलियत में इसकी बुनियाद पर छेद नहीं हो सकते। ऐतिहासिक व सांस्कृतिक महत्त्व से हिमाचल का वर्तमान स्वरूप ही राजनीति के उद्गम बनाता रहा है। शिमला, मंडी और कांगड़ा मात्र भौगोलिक खंड नहीं, बल्कि प्रदेश की राजनीतिक स्थिरता के प्रतीक हैं। तपोवन को चंद पत्थरों से बनी इमारत न समझें, यहां की हर ईंट एक सियासी कहावत है और आने वाला वक्त इसे पढ़ता रहेगा।
तपोवन विधानसभा परिसर में हिमाचल की सभी धाराओं का मिलना होता है, तो यह पर्वत सरीखी कसौटी है जो हर नदी को बहना सिखाती है। देश की संसदीय परंपराओं के सफल होने का पैमाना कतई आर्थिक नफा-नुकसान नहीं है, बल्कि सदन की बहस का आचरण ही इसे ऊपर उठाता है। विडंबना यह रही कि हिमाचल में भी कुछ वर्षों से विधानसभा में बहस के बजाय बहिर्गमन की आदत परवान होती जा रही है। जरूरत संवाद और विषयों पर बहस बढ़ाने की है, न कि सिमटते सत्रों में वाकआउट करके प्रेस सम्मेलन करने की। माननीय विधायक अगर वाकआउट करें, तो खर्च का हिसाब लगाना वाजिब है, लेकिन सदन में सत्र के दिन बढ़ें तो लोकतांत्रिक प्रासंगिकता बढ़ती है। अत: तपोवन में विधानसभा का ताप बढ़ाने के लिए सत्र की अवधि में विस्तार की गुंजाइश हमेशा रहेगी।

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