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डॉ राकेश कुमार आर्य की लेखनी से

हमारी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत और उसकी संभाल

“भारत को समझो” हम सबके लिए एक सांझा मिशन होना चाहिए। अपनी समृद्ध ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विरासत की ओर ध्यान देना हम सबका राष्ट्रीय दायित्व है। इस दायित्व की पूर्ति के लिए भारत को गहराई से समझना पड़ेगा। मिट्टी के एक-एक कण से पूछना पड़ेगा कि तेरा इतिहास क्या है ? तेरी सांस्कृतिक विरासत क्या है ? साधना की ऊंचाई पर पहुंचेंगे तो देश की मिट्टी का कण – कण बोलने व बताने लगेगा कि मेरा इतिहास क्या है और मेरी सांस्कृतिक विरासत क्या है ? कदम कदम पर हमें कुछ भेद भरे चेहरे और भेद भरे रहस्य दिखाई देने लगेंगे ?
हमने बहुत बड़ी गलती की है कि अपने राष्ट्र से, अपनी संस्कृति से ,अपने इतिहास से, अपने धर्म से और अपने वतन की मिट्टी से कभी संवाद नहीं किया। थोड़े से अर्थ परिवर्तन के साथ समझें तो किसी कवि ने कितना सुंदर कहा है :-

जिस्म और रूह का रिश्ता भी अजीब है,
ताजिंदगी साथ रहे पर तअर्रुफ न हो सका।

धन के चक्कर में हमने अपने चारों ओर शमशान की शांति का गहरा घेरा खड़ा कर लिया है। संवादहीनता इतनी अधिक बढ़ गई है कि अपने आप से भी हम संवादहीन हो गए हैं। इस घेरे के कारण हम निरंतर मृत्यु की ओर जा रहे हैं। एक ऐसे गहरे सन्नाटे की ओर जिसके परली ओर गहरी निराशा और मायूसी के अतिरिक्त कुछ नहीं है। उस ओर से जाने से अपने आपको हमें रोकना होगा। बात अपने आप से ही शुरू करनी होगी और रहस्यों के तालों को खोलते – खोलते धीरे-धीरे सारी वसुधा को अपना परिवार मानना होगा।
इतिहास को हमने भारत के धर्म और संस्कृति की कालकोठरी बनाकर रख दिया है। जिसमें ये दोनों चीजें दम घुट घुटकर मरने के लिए अभिशप्त छोड़ दी गई हैं। स्वाधीनता के बाद अपेक्षा की जाती थी कि देश का नेतृत्व इतिहास को खुली हवाओं के हवाले करेगा, पर ऐसा हुआ नहीं। कालकोठरी में हमारे कितने ही वीर योद्धा, कितने ही संस्कृतिनायक, कितने ही धर्म नायक, कितने ही महावीर, शूरवीर, धर्मवीर आज तक कैद हैं। जिस देश में राजा सगर के तथाकथित साठ हजार पुत्रों ( वास्तव में ये राजा सगर के पुत्र न होकर 60 हजार सैनिक थे, पर सैनिकों को भी राजा अपना पुत्रवत स्नेह ही देता है, इसलिए इन्हें रूढ़ीगत अर्थों में राजा सगर के 60 हजार ‘पुत्र’ कह दिया जाता है ।) की आत्मा की शांति के लिए भगीरथ जैसे सुपुत्र पैदा हुए हों, उस देश के इतिहास नायकों के साथ इतना बड़ा अन्याय होता चलता रहे और देश के जनमानस में थोड़ी सी भी अकुलाहट या बेचैनी ना हो तो समझा जाएगा कि देश से ‘भागीरथ परंपरा’ समाप्त हो चुकी है।
तब क्या यह माना जाए कि हम सचमुच एक मरती हुई कौम हैं, और क्या यह भी माना जाए कि अब हमारे भीतर जिजीविषा, जिज्ञासा और राष्ट्रप्रेम की भावना मर चुकी है?
पश्चिम के लोगों ने हमारे चारों ओर लाकर भौतिकवाद की चकाचौंध को खड़ा कर दिया है और हम उस चकाचौंध में चुंधियाकर पथभ्रष्ट और धर्म भ्रष्ट हो चुके हैं। हम चकाचौंध के दीवाने होकर धन कमाने में लगे हुए हैं और वह हमारे वास्तविक धन अर्थात हमारी आध्यात्मिक चेतना को लूटकर समाप्त कर आज भी अपना नंगा नाच भारत भूमि पर कर रहे हैं। हमने 1947 में समझ लिया कि दुश्मन देश से विदा हो चुका है , पर सच यह नहीं था। दुश्मन ने इसी देश की भूमि पर रहकर अपना रूप बदला और वह आज भी हमें अदृश्य हाथों के माध्यम से मार रहा है। कब जागेंगे हम ?

दुश्मन की गहरी चालों में भारत – माता अकुलाती है,
सो गये कहां मेरे लालों ! आवाहन के साथ बुलाती है।
भारत की मिट्टी से बात करो, ऐ देश – धर्म के दीवानो !
है भारत मां की गहरी पीड़ा, अपनों को सुनाई जाती है।।

आइए,गहरे राज और गहरे भेदों से भरा एक ताला खोलते हैं।
महाभारत के उद्योग पर्व और अनुशासन पर्व की साक्षी है कि महाभारत का युद्ध आज के अंग्रेजी मास के अनुसार 19 अक्टूबर 3102 ईसा पूर्व से आरंभ हुआ था और 5 नवंबर तक चला था। कृष्ण जी ने अगहन मास की अष्टमी तिथि को कर्ण से कहा था कि आप अब शांतनुनंदन भीष्म, द्रोणाचार्य और कृपाचार्य से जाकर कहिए कि यदि युद्ध अब अनिवार्य हो गया है तो इसे आज से 7 दिन बाद आने वाली अमावस्या से आरंभ कर दिया जाए।
इसी तिथि से युद्ध आरंभ हो गया था। इसके पश्चात भीष्म पितामह 10 दिन युद्ध करते रहे। युद्ध के दसवें दिन उनका अवसान हुआ। अतः 28 अक्टूबर को भीष्म पितामह का अवसान हुआ। इसके उपरांत भीष्म 8 दिन तक मृत्यु शैया पर पड़े रहे। तब युद्ध के उपरांत धर्मराज युधिष्ठिर अपने चारों भाइयों और श्री कृष्ण जी के साथ उनके पास युद्ध के समाप्त होने का समाचार लेकर पहुंचे। उस समय भीष्म पितामह ने कहा था कि अब आप जाकर अपने राजकाज को संभालो और अब से 50 दिन पश्चात तुम सब मेरे पास आना। उस समय सूर्य दक्षिणायन से उत्तरायण होना आरंभ होगा। तभी मैं अपने प्राण त्याग करूंगा।
भीष्म पितामह की आज्ञा का पालन करते हुए युधिष्ठिर अपने चारों बंधुओं सहित राजमहल में लौट आए और 50 दिन पूर्ण होने के पश्चात वह फिर अपने बंधुओं ,श्री कृष्ण जी, मंत्रियों, सेनापति और कुछ अन्य राजा महाराजाओं के साथ भीष्म पितामह के पास पहुंचे। तब भीष्म ने उन सबकी कुशल क्षेम लेकर और कुछ उपदेश देकर अपना प्राण त्याग किया।
इस प्रकार भीष्म पितामह है मृत्यु शैया पर 58 दिन रहे। यह घटना 25 दिसंबर को पूर्ण हुई थी घटित हुई थी। इतिहास की उछल कूद और भूल-भुलैया में हमने अंग्रेजों के अंग्रेजी मास जनवरी की 14 तारीख को मकर संक्रांति मनानी आरंभ कर दी जो कि 22 दिसंबर को मनाई जानी चाहिए। क्योंकि सूर्य उसी दिन दक्षिणायन से उत्तरायण होता है। पर उसकी विधिवत स्पष्ट जानकारी हमें 25 दिसंबर से होती है। 25 दिसंबर का दिन बड़ा इसलिए है कि उस दिन महाभारत कालीन विश्व का सबसे बड़ा आदमी संसार से विदा हुआ था। जिसे धर्मराज युधिष्ठिर ने उस समय राष्ट्रपिता कहा था। हम तभी से बड़ा दिन मनाते आ रहे हैं।
अपनी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को सहेजने ,सवारने और सुधारने का यह सही समय है । इसलिए ‘बड़े दिन’ के बारे में भ्रांत धारणाओं को समाप्त कर इसे अपनी ऐतिहासिक समृद्ध विरासत के साथ जोड़ना समय की आवश्यकता है।

डॉ राकेश कुमार आर्य
( लेखक सुप्रसिद्ध इतिहासकार एवं “भारत को समझो” अभियान समिति के राष्ट्रीय प्रणेता हैं।)

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