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भारतीय संस्कृति

भारत के सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का प्रतीक कुंभ का मेला

सारी दुनिया जानती और मानती है कि भारत एक सांस्कृतिक राष्ट्र है। अपनी अति विशिष्ट भौगोलीय स्थिति के कारण भारत सदा से विश्व के लिए उत्सुकता का केन्द्र रहा है। हिमाच्छादित पर्वतों से रेगिस्तान तक, कल-कल बहती सदानीरा नदियों से पठार तक, प्राकृतिक सौंदर्य से भरपूर घाटियों से विशाल समुन्द्र तक, अंडमान सरीखे टापुओं से विशाल मैदानों तक जहां पानी और बानी कोस-कोस पर बदलती है। फसले भिन्न हैं तो खानपान भी भिन्न है। मौसम भिन्न है तो पहनावे का भिन्न होना भी स्वाभाविक है। परिस्थितियां और परिवेश भिन्न तो कार्यशैली और परिणाम भी जुदा हैं। समय-समय पर अनेक धार्मिक विचार भी यहां उदित हुए।

संतों, महापुरुषों, समाज सुधारकों का प्रभाव यहां सदा से रहा है। इतिहास साक्षी है कि यहां विभिन्न शासक आये। लूटरों और आक्रांताओं ने भी मेरे भारत को निशाना बनाया। आपसी फूट ने भी अपना रंग दिखाया। आज भी सारे विश्व के लिए यह आश्चर्य का विषय है कि इतनी विविधताओं के बावजूद आखिर भारत अपनी सांस्कृतिक विरासत को संजोेकर कैसे रख सका। इकबाल ने भी अकारण नहीं कहा, ‘यूनान ओ मिस्र ओ रूमा सब मिट गए जहाँ से, अब तक मगर है बाक़ी नाम- ओ-निशाँ हमारा। कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी, सदियों रहा है दुश्मन दौर-ए-ज़माँ हमारा।
सांस्कृतिक राष्ट्र के रूप में भारत की शक्ति है- कश्मीर से कन्या कुमारी तक, कच्छ से कामरूप तक सम्पूर्ण राष्ट्र में जब कोई व्यक्ति प्रातः स्नान करते हुए मन ही मन पवित्र नदियों का स्मरण करता है, ‘गंगे! च यमुने! चौव गोदावरी! सरस्वति! नर्मदे! सिंधु! कावेरि! जलेैस्मिन् सन्निधिं कुरु।।’ वह अपने स्थान देवताओं का वंदन करते हुए भी देश के विभिन्न भागों में स्थापित प्रसिद्ध तीर्थों का महात्म्य गाता है, ‘अयोध्या मथुरा माया काशी कांची अवन्तिका। पुरी द्वारावती चैव सप्तैता मोक्षदायिका।

देश के विभिन्न भागों के लोग मेलों में मिलते थे। महामेलों के रूप में पूरी दुनिया में ख्यात कुम्भ अपने ही राष्ट्र के भिन्न परिस्थितियों में रह रहे बंधुओं से संवाद का अनूठा अवसर था। यातायात और संचार के उन्नत साधन न होते हुए भी कुम्भ में देश ओर दुनिया के विभिन्न भागों से नियमित रूप से लाखों लोग कुम्भ के अवसर पर एकत्र होते थे। दुनिया हैरान होती रही कि कि इतना बड़ा आयोजन कौन करता है मगर पवित्र नदियों के तट पर टेंट, तम्बू, घास फूस की कुटिया बनाकर रहने वाले इन कल्पवासियों के न भोजन का कोई ठिकाना, न अन्य सुविधाओं का मगर वे प्रसन्नचित्त रहते थे। बिना बुलाये, अपनी पूर्वजों की परम्परा का पालन उन्हें आनंद देता रहा। इसीलिए मेले मेल कराते रहे। संतों – महापुरुषों के मार्गदर्शन का सुख उपलब्ध कराते रहे। अपनी समस्याओं और समय की चुनौतियों पर विमर्श प्राप्त कर एक नई ऊर्जा लेकर घर लौटने वाले कुम्भ की सार्थकता के समर्थक रहे हैं। उनके अनुभवों ने अगली पीढी में अगले कुम्भ में भाग लेने का संकल्प जगाया। वह कोरी श्रद्धा और भक्ति नहीं बल्कि सदियों की परम्परा रूपी नदियों के प्रवाह में स्वयं को एक लहर के रूप में काल के प्रवाह से जोड़ना भी हैं।

आज हमारे ही कुछ तथाकथित बुद्धिजीवी कहते हैं कि संसदीय प्रणाली भारत को पश्चिम की देन है परंतु सत्य यह है कि हमने पूरी दुनिया को गणतंत्र की अवधारणा दी। सदियों से जारी कुम्भ में देश के विभिन्न भागों से आये विभिन्न मतों, विचारधाराओं के प्रतिनिधि सदियों से विमर्श और संवाद करते रहे हैं। उनकी संसद पवित्र नदी के तट पर साधना करने वालों की संसद थी जो शुद्ध अंतकरण से चिंतन करते थे। इसीलिए उनका प्रभाव था। आज की किसी संसद से उसकी तुलना संभव नहीं क्योंकि आज संसद प्रदूषित नदी की नगरी में है। जहां भ्रष्ट राजनीति के प्रतिनिधि गोल भवन में गोल-गोल वादे करते हुए केवल और केवल आत्मकेन्द्रित होकर दंभी व्यवहार करते है। इसीलिए वहां संवाद नहीं, बहस भी नहीं, अधिकांश हुडदंग होता हैं। कुम्भ वह आदि संसद है जहां साधन नहीं, साधना प्रधान थी। उसकी तुलना किसी पश्चिमी विचार से की ही नहीं जा सकती।

सांस्कृतिक आदान- प्रदान के अवसर कुम्भ को इसलिए भी कहा गया है क्योंकि हमारी संस्कृति बहुआयामी मगर विकासोन्मुख रही है। इसकी पुष्टि दुनिया के विभिन्न भागों सेे भारत आने वाले व्यापारी और यात्री करते हैं। तब से आज तक हमने अपनी कला और संस्कृति के लगभग सभी पक्षों को न केवल सहेज कर रखा बल्कि उसे और संवारा है। इसीलिए डॉ. एएल बाशम ‘भारत का सांस्कृतिक इतिहास’ में कहते है कि ‘सभ्यता के चार मुख्य उद्गम केंद्र पूर्व से पश्चिम की ओर बढ़ने पर, चीन, भारत, फर्टाइल क्रीसेंट तथा भूमध्य सागरीय प्रदेश, विशेषकर यूनान और रोम हैं, भारत को इसका सर्वाधिक श्रेय जाता है, क्योंकि इसने एशिया महादेश के अधिकांश प्रदेशों के सांस्कृतिक जीवन पर अपना गहरा प्रभाव डाला है। इसने प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से विश्व के अन्य भागों पर भी अपनी संस्कृति की गहरी छाप छोड़ी है।’ उनके अनुसार ‘किसी समाज में गहराई तक व्याप्त गुणों के समग्र रूप जैसे उनके सोचने, विचारने, कार्य करने, खान-पान, बोलने, नृत्य, गायन, साहित्य, कला, वास्तु, परम्पराओं आदि के माध्यम से संस्कृति से साक्षात्कार होता है।’

आज भी कुम्भ में सांस्कृतिक राष्ट्र और उसकी एकता से साक्षात्कार होता है। विभिन्न राज्यों के लोग अपनी- अपनी परम्पराओं का पालन करते हुए, अपनी कला, अपनी भाषा, अपनी विशिष्टता की छटा बिखेरते हैं। एक-दूसरे से अपरिचित होते हुए भी एक-दूसरे के सहयोगी होना हमारे गुणसूत्रों (डीएनए) में है। इसलिए जब यूनेस्को संयुक्तराष्ट्र के सांस्कृतिक निकाय की विश्व धरोहर समिति ने दक्षिण कोरिया के जेजू द्वीप पर हुए 12वें सत्र में कुंभ को अपनी मानवता की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत (intangible cultural heritage of humanity) की प्रतिनिधि सूची में शामिल करता है तो हमें कोई आश्चर्य नहीं होता।

यह सर्वविदित है कि आगामी 13 जनवरी 2025 से प्रयागराज में कुंभ आरंभ हो रहा है जो 26 फरवरी तक जारी रहेगा । इस विशेष आयोजन में देश-विदेश के करोड़ों लोगइसमें सहभागिता करने वाले हैं। अपनी सुविधा अनुसार हम सभी संगम स्नान लाभ और प्रयागराज में हो रहे कुंभ में देश के प्रख्यात संतों के दर्शन और उनके प्रवचनों का लाभ ले सकते हैं। सदियों से हो रहे महाकुंभ ही भारतीय संस्कृति से साक्षात्कार का अवसर है जो हर 12 वर्ष में प्रयागराज हरिद्वार उज्जैन और नासिक मेंआयोजित किया जाता है। विशेष यह है कि संगम नगरी प्रयागराज और गंगानगरी हरिद्वार में लगने वाले कुंभ मेले के बीच 3 वर्ष का अंतर होता है।

आओ सांस्कृतिक राष्ट्र के सजग सिपाही के रूप में हम अपने अपने तुच्छ स्वार्थो को तिरोहित करते हुए एकता में आबद्ध सुश्रृंखलित, तेजस्वी और सामर्थ्यवान बनें, जहां नवशक्ति के प्रबल जागरण से राष्ट्र की प्रत्येक धमनी में केवल और केवल ‘एकजुट भारत, सशक्त भारत, एक जननी भारत माता के पुत्र हम भारतीय’ की भावना प्रवाहित होती हो। अपनी भावी पीढ़ियों का उज्ज्वल भविष्य सुनिश्चित करने के लिए कुम्भ के संदेश का आत्मसात करें।

– डा. विनोद बब्बर

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