सत्य घटना : कर्मफल सिद्धांत के प्रमाण

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वैदक धर्म का मुख्य आधार कर्मफल का नियम है इसका तात्पर्य है की मनुष्य जैसा भी अच्छा या बुरा कर्म करता है एक न एक दिन उसका परिणाम अवश्य मिलता है , हरेक कर्म की तीन गतियां होती हैं क्रियमाण यानि जब हम कार्य करते हैं उनमे कुछ का तुरंत परिणाम मिल जाता लेकिन कुछ ऐसे कर्म होते हैं उनका परिणाम देर से मिलता है जैसे यदि आप आम का पेड़ लगाते हैं तो तुरंत आम नहीं मिलता और पकने बाद ही आम मिलता है इसी लिए जब किसी को उसके कर्म का परिणाम मिलता है तो हम कहते हैं कर्म का फल मिल गया कर्म करने से फल मिलने तक जो समय होता उसे कर्म की संचित स्थिति कहते हैं , लेकिन कुछ ऐसे भी कर्म होते हैं जिनका फल अगले जन्म में मिलता है इसे प्रारब्ध कहते है याद रखिये यह नियम सब पर लागु है चाहे वह किसी भी धर्म को मानता हो ,आस्तिक हो या नास्तिक हो
इसका एक सबूत हम दे चुके है कि हमारे दो भाइयों कि रेलवे में पक्की नौकरी मिल गयी थी , आप को पता होगा कि बच्चे को बचा लेने पर मजदूरों ने आशीर्वाद देते हुए कहा था हे द्वारका के नाथ इन गार्ड साहब के बच्चों की रक्षा करना इसके बारे में हम दो सत्य घटनाएं दे रहे हैं इनके साक्षी आज भी मौजूद हैं हम जिस जगह का वर्णन कर रहे हैं कोई भी जा कर पता कर सकता है
पहली घटना 1990 सन में दीवाली के दिन की हैं उस समय हमारे तीन बच्चे हो चुके थे पहला लड़का फिर एक पुत्री और तीसरा सबसे छोटा है उस समय हमारा छोटा भाई हमारी माता और अपनी पत्नी और दो बच्चों के साथ ललितपुर में देवगढ़ रोड पर खुशाल जैन के मकान में किराये से रहते थे यह मकान स्टेशन से बिलकुल नजदीक है हमारी पत्नी और तीन बच्चे अजमेर में पढ़ते थे दीवाली में सबकी छुट्टी थी इसलिए हम सबको लेकर अपनी माँ के पास दीवाली मनाने गए हुए थे , ललितपुर में मकानों की छतें लाल पत्थर की फरशिओं की होती है इस मकान में निचे हुए थे बायीं तरफ शौचालय और बैठक सहित एक कमरा था इसके साथ ऊपरी मंजिल के लिए पत्थर की छत्ती वाली सीढ़ी थी इसके आगे एक कमरे में दुकान थी ऊपर की मंजिल पर स्नान घर के सामने बड़ी छत थी इसी छत पर दो बड़े कमरे थे संयोग से उस दिन भी धनतेरस ही थी ,हम छत पर एक तखत पर बैठे थे
, हमारी और हमारे छोटे भाई की पत्नियां रसोई में त्यौहार के लिए गुझियां बना रहे थे , और बच्चे फुलझड़ियां जला कर छत पर इधर से उधर से उधर दौड़ रहे थे कभी बायीं छत से दायीं तरफ जाते ,तो कभी दायीं से बायीं छत पर दौड़ते थे , लेकिन मेरे भाई के बच्चे सीढ़ी से दूर रहते उन्हें मालूम था कि सीढ़ी के पास जाने से गिर सकते हैं यह बात हमारे बच्चों को पता नहीं थी तभी किसी बच्चे ने फुलझड़ी जलाई जिस से रंगीन फूल जैसी चंगरी निकली जलाने वाला बच्चा सीढ़ी के बायीं तरफ था और मेरे छोटे बच्चे से बोला छोटू इधर आओ लो यह फुलझड़ी पकड़ो , सुनते ही मेरा ढाई साल का बेटा छोटू (Nitesh )उसी तरफ भागा उसे बीच की सीढ़ी का धयान नहीं रहा , और नीचे जमीन पर चबूतरे पर गिर गया जहाँ खुशाल की दुकान थी ,
1-छोटू के गिरने के बाद क्या हुआ ?
जैसे ही छोटू सीढ़ी से एकदम से निचे गिरा तो मेरे छोटे भाई की लड़की हिमांशी जोर से चिल्लाई ताई छोटू नीचे गिर गया है ,जल्दी आओ ,हमने भी हिमांशी की आवाज सुनी और छत से सीढ़ियों पर नीचे की तरफ देखा लेकिन नीचे न छोटू के रोने की आवाज सुनाई दी और छोटू जमींन पर पड़ा हुआ दिखाईं दिया ,यह देख कर हमारी आँखों में अँधेरा सा छा गया और बड़ी अनहोनी की आशंका होने लगी ,लेकिन जब हमारी पत्नी के साथ कुछ और लोग आधी सीढ़ी उतरे ही थे कि खुशाल की माता जिसे लोग कल्लो कहते थे छोटू को गोदी में लिए ऊपर छत की तरफ चढ़ती हुई दिखाई दी और छोटू को हमारी पत्नी और हमारी माता जी को सौंप कर बोली ” तुम लोग बातों और काम में ऐसे लापरवाह हो गए कि बच्चा निचे गिर गया और तुम लोगों को पता भी नहीं चला ,यह तो भगवान की कृपा है की बच्चे को कुछ नहीं हुआ ,अगर कुछ हो गया होता तो लेने के देने लग जाते , कल्लो की यह बात सुन कर हमने छोटू को पास बिठाया और उसके सिर पूरे शरीर ध्यान से देखा न तो कोई जख्म था और न कहीं से खून निकला था , फिर हमने छोटू के हाथ ,पैर ,पीठ और सब जगह हाथों दबा दबा कर पूछा , छोटू बताओ क्या को दर्द होता है ? छोटू बोलै नहीं , फिर हमने छोटू से पूछा बताओ जब तुम गिर गए थे तो रोये क्यों नहीं और क्यों नहीं बुलाया ?तब छोटू ने कहा ? अगर हम रोते और चिल्लाते तो आप हमें डांटते इस लिए हम नहीं बोले .
यह बात सौ प्रतिशत सत्य है अगर कोई ललितपुर का रहने वाला हो वह स्वयं पता कर सकता इस घटना के साक्षी आज भी हैं
दूसरी घटना सन 2001 की है बड़े बड़े लडके यतीश का जन्म 2 जनवरी 1984 में हुआ था उन दिनों में हम भोपाल के कोलार रोड स्थित फ़ाईन एन्क्लेव सोसायटी के पहले ब्लॉक की तीसरी मंजिल पर रहते थे उस समय बसें कम चलती थी यतीश ने कॉमर्स के लिए सुल्तानिया रोड स्थित रिजवी कोचिंग क्लास में एडमिशन कर लिया था ,पहले तो वह बीमा कुञ्ज निवासी केतन केलकर के साथ जाया करता था केतन पिताजी रेलवे के डी आर एम् ऑफिस में क्लर्क थे सन 2000 में हमारे साले ने यतीश को ऐक लूना दिलवा दी जिस से आने जाने में आसानी जो जाये एक दिन यतीश और केतन अपनी अपनी गाड़ी से कोचिंग के लिए जारहे थे रास्ते में विधान सभा की तरफ चढ़ाई है यह दोनो जब चढ़ाई पर बढ़ रहे थे अचानक एक कार वाले ने ऐसी टक्कर मारी की यतीश गाडी से उछाल कर दूर गिरा और टक्कर से लूना का हेंडल और कई चीजे टूट गयीं और लूना दूर तक घिसट गयी यद्यपि लोगों ने कर वाले का नंबर ले लिया था जिस से दुर्घटना की ऍफ़ आई आर भी कर दी गयी थी , चूँकि लूना का इंश्योर था उसका पैसा भी मिल गया था लेकिन जिस दिन एक्सीडेंट हुआ था केतन अकेला हमारे घर तीसरी मंजिल पर आया और घबराते हुए बोला “अंकिल यतीश का बहुत बड़ा एक्सीडेंट हो गया है , हमने कहा यतीश कहाँ है और लूना कहाँ है केतन ने बताया कि गाडी को सुधरने को दे दी है यतीश थोड़ी देर में ही आ रहा है और बड़ा लड़का घर आया तो होने देखा की उसे एक खरोंच भी नहीं थी ,तब हमने केतन से पूछा कि तो कहा था कि यतीश का बड़ा एक्सीडेंट हो गया है और उसकी लूना बिलकुल बर्बाद हो गयी है , लेकिन ऐसा लगता है। की या तुमने झूठ बोला था या मजाक किया था , क्योंकि अगर एक्सीडेंट से लूना के टुकड़े हो गए थे तो उसी पर बैठे हुए यतीश जरा सी चोट क्यों नहीं लगी ? तब केतन ने कहा अंकिल यह बात बिलकुल सत्य है ,मुझे भी इसी बात पर आश्चर्य हो रहा है इतनी बड़ी दुर्घटना होने पर भी यतीश सकुशल कैसे बच गया , मुझे तो यही प्रतीत होता है कि जरूर किसी की सच्चे दिल से दिए गए आशीर्वाद ने ही यतीश को बचा लिया ”
हम यह दो सत्य घटनाएं इसलिए दे रहे हैं कि हमें बचपन में हमारी दादी यही सिखाया करती थीं कि बेटा याद रखना हमेशा भलाई बदला भला और बुराई का बदला बुरा होता है ,और सच्चे मन से दिए गए आशीर्वाद और अभिशाप को भगवान पूरा कर देते हैं , इसलिए हर हालत में भलाई के काम नहीं छोडो , न जाने कब तुम्हारा भला काम तुम्हारे संकट से बचा ले
मुझे विश्वास है की हमारे पाठक भी इस बात से सहमत होंगे
(इसी श्रंखला में अगला लेख हमारे राजनीतिक विचारों पर होगा।

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