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डॉ राकेश कुमार आर्य की लेखनी से

भारत के चूंडावत सरदार और चीन

भारत की सेना प्राचीन काल से ही न्याय और सत्य के लिए लड़ती आई है। हमने कभी दूसरों के अधिकारों के अतिक्रमण के लिए युद्ध नहीं किए हैं बल्कि दूसरों की रक्षा के लिए और मानवता का परचम फहराने के लिए युद्ध का आयोजन किया है। जर, जोरू जमीन के लिए जो लोग लड़ते रहे हों, वे लड़ते रहे होंगे, लेकिन हमने नारी के सम्मान के लिए और अपने मातृभूमि की रक्षा के लिए युद्ध किए हैं। हमने धन को लात मारी है और इस सांसारिक भौतिक धन की अपेक्षा आत्मिक संसार के धन को संचित करने में रुचि दिखाई है। हर युद्ध में हमने इस बात पर ध्यान दिया है कि धर्म किसके साथ है ? जिसके साथ धर्म है उसी के साथ भारत है। महाभारत के युद्ध में दुर्योधन को इस बात का घमंड था कि उसके साथ 11 अक्षौहिणी सेना लड़ रही है, जबकि युद्धिष्ठिर के साथ केवल 7 अक्षौहिणी सेना ही लड़ रही है। उस समय युधिष्ठिर को केवल एक ही बात का संतोष था कि उसके साथ धर्म है और जिसके साथ धर्म है उसी के साथ जय है। श्री कृष्ण जी जैसे महा बुद्धिमान योगीराज के पद से विभूषित महान व्यक्तित्व के धनी उस महामानव ने अपनी उपस्थिति धर्म के साथ जोड़कर धर्मराज युधिष्ठिर की जय को और भी अधिक सुनिश्चित कर दिया था।
भारत ने महाभारत को ही नहीं जीता बल्कि इसने सिकंदर को भी जीता है और उसके पश्चात अन्य अनेक विदेशी आक्रमणकारियों की सेनाओं को पराजित कर उनके साथ होने वाले युद्ध को भी जीता है। इसका कारण केवल एक रहा है कि भारत धर्म की रक्षा के लिए लड़ा है। जो युद्ध में धर्म की रक्षा के लिए सात्विक भाव से उतरता है परमपिता परमेश्वर और संसार की सभी दिव्य शक्तियां उसी का समर्थन और सहयोग करती हैं। इन्हीं अदृश्य शक्तियों के बल पर भारत के वीर सैनिकों ने युद्ध क्षेत्र में उतर कर अपनी अद्भुत वीरता का परिचय देते हुए प्राण उत्सर्ग किए हैं और कितने ही शत्रुओं के शीशों को उतारकर मातृभूमि के प्रति अपने कर्तव्य का निर्वाह किया है।
इतिहास में ऐसे अनेक उदाहरण हैं जब भारत के मुट्ठी भर वीर सैनिकों ने शत्रु दल की बड़ी-बड़ी सेनाओं का विनाश किया है। यदि बात स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात की की जाए तो उसके पश्चात भी भारत ने 1962 में चीन के साथ जिस बहादुरी के साथ युद्ध किया था वह भी भारतीय सेना के इतिहास का एक स्वर्णिम पृष्ठ है। निसंदेह उस युद्ध में हमारी पराजय हुई थी परंतु जिन अल्प साधनों के साथ हमारी सेना युद्ध क्षेत्र में उतरी थी और उसके उपरांत भी एक एक इंच के लिए हमारे सैनिक लड़े थे, वह इतिहास अपने आप में कम रोमांचकारी नहीं है। यदि किसी और देश की सेना होती तो चीन जैसे दुर्दांत शत्रु से भय खाने लगती परंतु यह भारत के वीर योद्धा सैनिक ही हैं जो शत्रु चीन से भय नहीं खाकर उसे ही ही भयभीत करने की शक्ति रखते हैं।
अभी हमने इसका ताजा उदाहरण देखा है जब अरुणाचल प्रदेश के तवांग में भारत और चीन के सैनिकों के बीच हुई झड़प में भारत के सैनिकों ने चीन की सेना के सैनिकों को भागने के लिए मजबूर कर दिया । जिसके बाद चीन अब हमारी सीमाओं पर युद्ध की तैयारी करते हुए भारत को धमकाने का प्रयास कर रहा है। यद्यपि इस समय पूरा राष्ट्र अपनी सेना के बहादुर सैनिकों के साथ खड़ा है और इस बात के लिए गौरवान्वित हो रहा है कि हमारे वीर सैनिकों ने राष्ट्रभक्ति का परिचय देते हुए शत्रु के सैनिकों को सीमा से खदेड़ कर अपनी मातृभूमि की रक्षा करने का सराहनीय और अभिनंदनीय कार्य किया।
भारतीय सैनिकों की वीरता ने हमारे पड़ोसी देश पाकिस्तान में अलग ही हलचल मचा रखी है क्योंकि चीनी फौज को भारतीय सैनिकों ने बिना हथियारों के ही धूल चटा दी। पाकिस्तान के भीतर इस प्रकार की चर्चाएं तब और भी अधिक महत्वपूर्ण हो जाती हैं जब दुनिया में पाकिस्तान का पक्का और एकमात्र मित्र केवल चीन ही हो। चीनी कर्ज से पाकिस्तान की सारी अर्थव्यवस्था चल रही है, चीनी हथियारों के बल पर वह भारत से पांचवा युद्ध लड़ने का भ्रम पाले रखता है। वह भारत से कश्मीर को हड़पने और हर अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत को नीचा दिखाने के लिए भी चीन का सहारा लेता रहा है पर अब जब उसने भारत के वीर सैनिकों की वीरता को देखा है तो वह भी दांतो तले उंगली दबा गया है और भारतीय सैनिकों की इस प्रकार की अप्रतिम वीरता के लिए उनकी प्रशंसा कर रहा है।
पाकिस्तान की मीडिया इस झड़प को भारत-अमेरिका के बीच हुए युद्दाभ्यास को कारण बताया है और कहा है कि भारतीय सैनिकों ने ना केवल चीनी सैनिकों को रोका बल्कि भगा भी दिया। पाकिस्तानी लोगों का मानना है कि भारत तो इस प्रकार के युद्ध या झड़पों के सिलसिले में अपने को होने वाली हानि का विवरण दे देता है परंतु चीन कभी भी इस प्रकार की झड़पों पर कुछ बोलता नहीं है।
चीन के सैनिकों ने भारत की सीमा पर हमला तो कर दिया पर जब उन्हें भारत के सैनिकों ने मुंहतोड़ उत्तर दिया तो वह दुम दबाकर भागते हुए दिखाई दिए। हो सकता है कि हमला करने से पहले उनका मानना यह रहा हो कि भारत के सैनिक या तो उनका प्रतिकार नहीं करेंगे या उन्हें देखकर भाग जाएंगे पर जब उन्हें उल्टा अपने आप ही भागना पड़ा तो उन्हें पता चल गया कि भारत सचमुच 1962 का भारत नहीं है इसके सैनिक सूखे चने खाकर भी देश की धरती के लिए लड़ना जानते हैं।
इस घटना के बाद पाकिस्तान के लोग अपने शासकों को भी यह परामर्श देते हुए दिखाई दे रहे हैं कि वे पाक अधिकृत कश्मीर की बात छोड़ दें और इस समय भारत के साथ किसी भी प्रकार का पंगा ना लें। लोगों का मानना है कि यदि दो में से एक का चुनाव करना हो तो कश्मीर को भारत के साथ जाना चाहिए। लोगों का मानना है कि भारत एक शक्तिशाली देश है और वह कश्मीर की प्रत्येक प्रकार से रक्षा कर सकता है। पाकिस्तान को इस समय अपने आप को संभालने पर ध्यान देना चाहिए।

हमें यह ध्यान रखना हमारा देश वीर योद्धाओं का देश है। शक्तावत और चुंडावत सरदारों का उल्लेख इतिहास में आता है जो महाराणा अमर सिंह की सेना के अग्रिम मोर्चे पर लड़ने के लिए आपस में प्रतियोगिता के लिए सामने आ खड़े हुए थे। दोनों कहते थे कि अग्रिम मोर्चे का नेतृत्व हम करेंगे। तब महाराणा अमर सिंह ने उन दोनों को यह आदेश दिया कि उंटाला किले को जो भी पहले जीतकर आएगा वही आगे से सेना के अग्रिम मोर्चे का नेतृत्व किया करेगा। महाराणा अमरसिंह के आदेश को स्वीकार कर दोनों सैन्य दल अपनी वीरता को प्रमाणित करने के लिए निर्धारित किए गए दुर्ग पर प्रथम विजय प्राप्त करने की भावना से दौड़ पड़े।
दौड़ती हुई सेना अंततः उंटाला दुर्ग के निकट जा पहुंची। युद्ध आरंभ हो गया। किले के मुख्य द्वार को तोड़ने के लिए शक्तावत सैन्य दल के वीर सैनिकों और सरदारों ने प्रयास करना आरंभ किया। उधर चुंडावत सरदारों ने रस्सी के सहारे किले की दीवार को लांघने का प्रयास करना आरंभ किया। दोनों ही सैन्य दलों ने अपने प्राणों की बाजी लगाकर शर्त को जीतने का निश्चय कर लिया था। यही कारण था कि उन क्षणों में दोनों और सैन्य दलों के सैनिकों और सरदारों के लिए प्रण की कीमत के सामने प्राणों की कीमत कुछ भी नहीं रही थी। प्राण जाए पर वचन न जाई- की भावना से प्रेरित होकर उस समय प्रण का सम्मान रखने के लिए वे कुछ भी करने को तैयार थे।
उस किले के मुख्य द्वार पर नुकीले शूल अर्थात लोहे की कीलें लगी हुई थीं। जिसके कारण हाथी दरवाजों को तोड़ने में हिचक रहे थे। क्योंकि जब हाथी अपने मस्तक का बल दरवाजों पर लगाते थे तो उनके मस्तक में वह नुकीली कीलें चुभती थीं। जिससे वे पीछे हट जाते थे। यह बड़ी विषम स्थिति उत्पन्न हो गई थी। हाथी सैनिकों को निराश कर रहे थे और समय तेजी से हाथ से निकल रहा था । यदि चुंडावत सरदारों ने विजय प्राप्त कर ली तो हरावल दल के नेतृत्व करने की जिस इच्छा को शक्तावत सरदारों ने महाराणा के समक्ष प्रकट किया था, वह पूरी नहीं हो सकती थी। कहने का अभिप्राय है कि थोड़े समय में शीघ्र से शीघ्र महत्वपूर्ण निर्णय लेना था।
जब महत्वपूर्ण क्षण आते हैं तो महत्वपूर्ण बलिदान लेकर ही जाते हैं। और अब शक्तावत सरदारों के समक्ष भी कोई महत्वपूर्ण बलिदान देने के क्षण आ चुके थे। समय सोचने का नहीं था, कुछ कर दिखाने का था। फलस्वरूप सरदार बल्लू ने अपना सीना कीलों के सामने अड़ा दिया। बात स्पष्ट थी कि फाटक को पहले खोलने के लिए और किले में चुंडावतों से पहले प्रवेश करने की प्रतिस्पर्धा में प्राणों की बाजी लगाकर सरदार बल्लू ने पहले अपना बलिदान देने की तैयारी कर ली थी। कीलों के सामने छाती अड़ाकर खड़े होने का अर्थ था कि पीछे से हाथी आकर उनकी कमर में टक्कर मारेगा और शूल उनकी छाती में घुस जायेंगे, जिससे उनका बलिदान तो होगा पर दरवाजा टूट जाएगा। ऐसा ही हुआ भी। जब सरदार बल्लू इस प्रकार अपने आप को किलों के सामने खड़े कर रहे थे तब उन्होंने महावत को संकेत किया कि वह अपने हाथी को दौड़ता हुआ लेकर आए तो इस पर महावत ने ऐसा करने से इनकार किया, परंतु कठोर शब्दों में सरदार बल्लू ने महावत से फिर कहा कि जो कह रहा हूं ,वही करो। तब महावत ने अपने हाथी को संकेत किया और वह तेज गति से दौड़ता हुआ आया। आते ही उसने जोरदार टक्कर सरदार बल्लू की पीठ पर मारी, जिससे दरवाजा टूट गया, परंतु बल्लू का बलिदान भी हो गया। एक साथी के बिछुड़ जाने का गम किसी को नहीं था, प्रसन्नता इस बात की थी कि एक साथी के सर्वोत्कृष्ट बलिदान देने के बाद हम किले में प्रवेश करने में सफल हो गए हैं। साहस और शौर्य की पराकाष्ठा थी यह। हर कोई अपने साथी के इस बलिदान पर न केवल गौरव की अनुभूति कर रहा था बल्कि हृदय से नतमस्तक होकर उसे नमन भी कर रहा था।
पर यह क्या? उधर चुंडावत सरदारों ने जब देखा कि शक्तावत उनकी उनके लिए एक बहुत बड़ी चुनौती खड़ी कर चुके हैं और वे उनके हरावल के नेतृत्व करने के गौरवपूर्ण सम्मान को उनसे अब छीनने ही वाले हैं तो उन्होंने भी पराक्रम का एक अद्भुत उदाहरण प्रस्तुत करने का संकल्प ले लिया। जिस प्रकार बल्लू ने अपने आप को सर्वोत्कृष्ट बलिदान के लिए प्रस्तुत किया था उसी प्रकार चूंडावत सरदार जैतसिंह ने भी अपने आपको बलिदान के लिए सहर्ष समर्पित कर दिया। जैतसिंह ने अपने साथियों को यह आदेश दिया कि वह उनका सिर काटकर किले के भीतर फेंक दें, जिससे कि किले में पहले प्रवेश का गौरव उनको प्राप्त हो जाए। जैत सिंह के इस प्रकार के आदेश को सुनकर किसी भी सैनिक का यह साहस नहीं हुआ कि वह अपने सरदार का गला काटकर किले के भीतर फेंक दें। तब अनुपम शौर्य का उदाहरण प्रस्तुत करते हुए जैत सिंह ने स्वयं अपना सिर काट कर किले के भीतर फेंक दिया।
कहते हैं कि वीर और परमवीर में क्षणों का ही अंतर होता है और यह बात यहां पूर्णतया फलीभूत हो गई। शक्तावतों ने बल्लू के बलिदान के पश्चात यह मन बना लिया था कि अब वह किले में प्रवेश पाने के पश्चात मेवाड़ की सेना में हरावल का नेतृत्व करने के गौरवपूर्ण पद को प्राप्त कर लेंगे। परंतु भीतर जाकर जब उन्होंने देखा कि वहां पर चुंडावत सरदार जैतसिंह का कटा हुआ सिर पहले ही पड़ा हुआ था तो उसके शौर्य के समक्ष वह भी नतमस्तक हो गए। सरदार जैतसिंह के इस अनुपम बलिदान के पश्चात यह स्पष्ट हो गया कि हरावल का नेतृत्व करने का गौरवपूर्ण पद एक बार फिर चुंडावत सरदारों के पास ही रहेगा।
चीन को यह ध्यान रखना चाहिए कि यह देश आज भी चुंडावत सरदारों का ही देश है।

डॉ राकेश कुमार आर्य
संपादक उगता भारत

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