कई राजाओं-नवाबों का अहम तोड़ दिया था बन्दा बैरागी ने

राजनीति का हिंदूकरण और हिंदुओं का सैनिकीकरण बन्दा बैरागी और गुरू गोविन्दसिंह जैसे महापुरूष हिंदुओं का और सिखों का सैनिकीकरण करने के पक्षधर थे। उन्हीं का चिंतन प्रबल होते-होते आगे चलकर वीर सावरकर जैसे लोगों की लेखनी से जब मथा गया तो उसी से यह अमृतवाक्य हमें प्राप्त हुआ कि ‘राजनीति का हिंदूकरण और हिंदुओं का सैनिकीकरण करो।’ सावरकर अपनी सभाओं में कहा करते थे-”1857 में जब प्रथम स्वाधीनता संग्राम हुआ था, तब से ब्रिटिश सरकार की नीति रही है कि सेना को राजनीति से दूर रखा जाए। हमारी नीति यह होनी चाहिए कि येन-केन-प्रकारेण भारतीय सेना में राजनीति का प्रवेश कराया जाए और एक बार यदि आप इस कार्य में सफल हो जाते हैं तो समझ लीजिए कि आपने स्वराज्य का युद्घ जीत लिया। अपरिहार्य कारणों से विवश होकर ब्रिटिश सरकार को आप पर भरोसा करके आपको हथियार और गोला बारूद सौंपने पड़ रहे हैं। पहले पिस्तौल रखने पर युवकों को जेल की एकांत कोठरियों में सडऩा पड़ता था, किंतु आज अंग्रेज आपके हाथ में राइफल, बंदूक, तोप, मशीनगन दे रहे हैं। पूर्ण प्रशिक्षित सैनिक और सेनानायक बनो। हजारों लोगों को प्राविधिक विशेषज्ञ बनाओ, जो कारखानों में पानी के जहाज, वायुयान, आग्नेयपास्त्र और गोला बारूद बना सकें। आबंध और संविदा की चिंता मत करो। उन कागजों के टुकड़ों का पृष्ठ भाग तो रिक्त है। समय आने पर आप उस पर नये आबंध और नयी संविदा लिख सकते हैं। ध्यान रहे, स्वराज्य आपके हाथ नहीं लगेगा, भले ही आप समूची धरती पर कागजी प्रस्ताव बिछा दें। परंतु यदि आपके कंधे पर रायफल होगी और उसी से आप प्रस्ताव पारित करेंगे तो निश्चय ही आप स्वराज्य प्राप्त कर लेंगे।”
(संदर्भ : ‘धनंजय कीर’ -वीर सावरकर-पृष्ठ 257)
सावरकर जी की यह बात चाहे किसी अन्य संदर्भ में कही गयी है लेकिन यह वीर बंदा बैरागी के व्यक्तित्व और कृतित्व पर भी पूर्णत: लागू होती है। वीर बन्दा बैरागी भी उस समय राष्ट्रवासियों को शस्त्रधारी बनकर संपूर्ण भारत से विदेशी शासक और शासन को उखाडऩे का भागीरथ प्रयास कर रहा था। पूरा हिंदू समाज उस योद्घा के आवाहन पर उसके साथ खड़ा था।
चालीस हजार बलिदानियों का जत्था
यही कारण है कि खफीखां जैसे निष्पक्ष मुस्लिम इतिहासकार ने भी उसके पास 40,000 की सेना के होने का तथ्य स्वीकार किया है, एक प्रकार से यह सेना न होकर आत्म बलिदानियों का ऐसा जत्था था जो नि:स्वार्थ भाव से राष्ट्र की स्वतंत्रता के लिए पंक्तिबद्घ होकर आ खड़ा हुआ था। हिंदुओं ने पूर्व में भी ऐसा कितनी ही बार किया था जब पेट भक्ति के लिए नही देशभक्ति के लिए उन्होंने अपने जत्थे तैयार किये थे। देशभक्ति और स्वतंत्रता प्रेमी भावना का इससे बढक़र कोई प्रमाण नहीं हो सकता।
ऐसा जंगी नेता भारतवर्ष में पहले कभी नहीं आया
भाई परमानंद जी का कहना है कि-”बन्दा बैरागी यद्यपि साधु था फिर भी ऐसा जंगी नेता भारतवर्ष में पहले कभी न उत्पन्न हुआ था। इस थोड़े समय में ही और इसके पश्चात कई वर्षों तक, और जहां कहीं भी युद्घ होता था उसमें विजय प्राय: बन्दा बैरागी की व्यक्तिगत वीरता के कारण होती थी। ज्यों ही थोड़ी देर के लिए वह अनुपस्थित होता, मुसलमान फिर उठ खड़े होते और सिख उनके आगे मारे-मारे फिरते। वह लौटता तो अवस्था तुरंत बदल जाती। यह काल मूर्खता का था, मुसलमानों की शक्ति अंधविश्वास था। बैरागी की उपस्थिति में यह धार्मिक विश्वास जिससे मुसलमान समझते थे कि इस संसार में उन्हें राज्य और परलोक में स्वर्ग मिलेगा, हिल जाता था।….इस सबसे बढक़र जो बात इसे मनुष्यों से उच्च बनाती है वह यह है कि इतनी विजय प्राप्त करते हुए भी इसने अपना साधुवेश नही छोड़ा। युद्घ में भी यह पृथक बैठा हुआ, ध्यान और भक्ति में लीन रहता था। केवल आवश्यकता पडऩे पर युद्घ में उपस्थित हो जाता था। जब राज करने का समय आया तो इसने समस्त राज्य अपने सरदारों में बांट दिया और आप संत का संत ही रहा। इस काल में भी जनक महाराज का कथन ठीक बैठता था, वह इस संसार में रहता हुआ भी इससे ऐसा पृथक था जैसे कमल पत्र जल में रहकर भी सूखा रहता है। पंजाब के हिंदुओं के लिए वह अवतार था।”
राजाओं का अहंकार तोड़ा
हर व्यक्ति का स्वभाव होता है कि वह अपने से छोटे रहे व्यक्ति के वर्चस्व को स्वीकार नहीं कर पाता है। उसका अहंकार आड़े आता है और उसे उस छोटे रहे व्यक्ति को छोटा ही दिखाता रहता है। घर में पिता अपने आप ही तो अपने पुत्र को योग्य बनाता है पर जब वह योग्य बन जाता है और पिता के कार्यों में हाथ बंटाने के लिए आगे आता है तो पिता को ही सर्वप्रथम ऐसा लगता है कि जैसे पुत्र अनाधिकार चेष्टा कर रहा है। इसलिए पुत्र को योग्य बनाने का सपना देखकर उसे अपना उत्तराधिकारी बनाने की इच्छा रखने वाला पिता भी अक्सर अहंकार का शिकार हो जाता है। वह पुत्र से ही विवाद करने लगता है।
यह बात राजनीति के क्षेत्र में तो और भी अधिक घृणित रूप में प्रकट होती है, वहां कोई भी राजा किसी ऐसे व्यक्ति को अपना नायक नही बनाना चाहता जो उससे छोटा रहा हो। शिवाजी को हिंदू समाज ने तो राजा मान लिया पर राजाओं ने उसे राजा नही माना। केवल इसलिए कि ये राजा लोग उसे अपने से छोटा मानते थे। यही बात बैरागी की थी। उसे राजा अपना नायक नहीं मान रहे थे-यह अलग बात है कि उस योद्घ को देश की हिंदू जनता अपना नायक और महानायक अवश्य मान रही थी।
कैलोर के राजा को किया परास्त
कैलोर का राजा अजमेर चंद था। वह गुरू गोविन्द सिंह के काल से ही अपनी राष्ट्रविरोधी मानसिकता और गतिविधियों के लिए जाना जाता था। अब गुरू गोविन्दसिंह जी तो नहीं रहे थे-परंतु बैरागी अवश्य था। बन्दा बैरागी अजमेर चंद को पहले एक बार सुधरने का अवसर देना चाहता था। इसलिए उसने अजमेर चंद के लिए पत्र लिखा कि पूर्व में जो कुछ हो गया वह तो हो गया पर अब सुधर जाओ।
अजमेर चंद पर इस पत्र का कोई प्रभाव नही पड़ा। क्योंकि वह उन्हीं राजाओं में से एक था जो बैरागी को केवल बैरागी ही मानते और जानते थे। अत: अन्य राजाओं की भांति इस राजा का अहंकार भी सिर चढक़र बोल रहा था।
उसने पत्र का उत्तर भी बड़ी अहंकार की शैली में दिया। इस पर बैरागी ने अजमेरचंद पर चढ़ाई कर दी। अजमेर चंद का साथ उन सभी राजाओं ने दिया जो बैरागी से घृणा करते थे। बैरागी की सेना ने बड़ी वीरता का प्रदर्शन किया। उसे भारी सैनिक क्षति भी उठानी पड़ी पर अंत में विजय बैरागी की ही हुई। इस विजय ने जहां बैरागी को स्थापित कर दिया, वहीं इन नरेशों की शक्ति भी क्षीण हो गयी। कई राजाओं ने युद्घ के उपरांत वैरागी से आकर मिल जाने में ही अपना कल्याण समझा। इसलिए उन्होंने दिल्ली को खिराज देना बंद कर दिया। संवत 1767 से मण्डी नरेश ने बैरागी की आधीनता स्वीकार कर ली। तब से ही बैरागी ने कलगी पहननी आरंभ की थी।
कुल्लू के राजा ने कर लिया कैद
बैरागी को कुल्लू के राजा ने किस प्रकार कैद किया और उसके उपरांत दिल्ली दरबार में कैसे अपनी प्रसन्नता प्रकट की थी? इस पर भाई परमानंद जी लिखते हैं :-”कहा जाता है कि मण्डी से बैरागी सैर के लिए कुल्लू गया। वहां के राजा ने इसे पकड़ लिया और यह समाचार दिल्ली सम्राट को लिख भेजा। इससे मुसलमानों के यहां शादियाने बजने लगे हिंदुओं के घरों में शोक होने लगा और पंथ रंडुआ हो गया। इसी एक घटना से देश का वातावरण परिवर्तित हो गया, मुसलमानों का साहस बढ़ गया। दिल्ली से सेनाएं रवाना हो गयीं। मुसलमान फिर सब जग के अधिकारी बन बैठे। सिख और हिंदू वैरागी का स्मरण कर रूदन करने लगे।”
इस घटना के पश्चात भी किसी प्रकार से बैरागी इस राजा के यहां से निकल भागने में सफल हो गया था। जिस प्रकार का वर्णन यहां से निकल भागने के विषय में किया गया है कि उसने भूतों से अपना पिंजड़ा मंगवाया वह तो हमारे लिए अविश्वसनीय है। पर यदि बैरागी किसी प्रकार यहां से निकला तो उसे भी उसकी वीरता और बौद्घिक चातुर्य का ही परिणाम माना जाना चाहिए।
सहारनपुर का मुस्लिम शासक भाग गया
बैरागी से प्रेेम करने वाले जितने लोग थे उसी अनुपात में शत्रुओं की संख्या भी कम नही थी। वह अपने हिंदू राज्य के अंतर्गत सहारनपुर को भी लाना चाहता था।
सहारनपुर का शासक उन दिनों अली मुहम्मद था। जब उसने बैरागी के आक्रमण की जानकारी प्राप्त की तो अपनी वीरता और अपने बाहुबल की डींगें मारने लगा। उसने बैरागी के विरूद्घ दीनी संघर्ष आरंभ कर दिया। पर जब भारत का शेर बैरागी स्वयं वहां दहाड़ता हुआ पहुंच गया तो अली मुहम्मद के पैरों तले की धरती खिसक गयी। वह मारे भय के थर-थर कांपने लगा। अली मुहम्मद का बैरागी के साथ संघर्ष करने का साहस भंग हो गया और वह युद्घ भूमि से भाग खड़ा हुआ। इसके उपरांत भी सेनाओं का संघर्ष हुआ, अली मुहम्मद का सरदार गालिब खां बड़ी वीरता से लड़ा। पर अंत में मारा गया। उसके मरते ही मुगल सेना में भगदड़ मच गयी। सहारनपुर में ऐसी लूट हुई कि कुछ भी शेष न रहा। बहुत से लोगों का वध किया गया।
नजीबाबाद और जलालाबाद में भी यही हुआ
बैरागी का पराक्रम सिर चढक़र बोल रहा था। उसके शौर्य के सूर्य से आंखें मिलाना उस समय किसी के वश की बात नहीं रही थी। उस पर हिंदुस्थान की स्वतंत्रता का भूत सवार था। इसलिए किसी भी संस्कृति नाशक को वह छोडऩा नहीं चाहता था। अत: उसने नजीबाबाद और जलालाबाद को भी अपने आधीन हो जाने का पत्र लिखा। वहां के मुस्लिम शासक शाहनवाज खां ने जब बैरागी की चेतावनी को अनदेखा करना चाहा तो उस पर बैरागी ने हमला कर दिया। नौता नामक स्थान पर युद्घ हुआ। मुहम्मद जफरूद्दीन नामक एक व्यक्ति ने इस युद्घ के विषय में लिखा है-”नगर के एक भाग में शेखजादों का वध किया गया। ज्वालापुर और साठोरा के राजाओं से बहुत सा धन भेंट में लिया। मुरादाबाद का इलाका लूटता हुआ वीर जलालाबाद जा पहुंचा। वहां के सरदार जलालखां ने ऐसा सामना किया कि सिख घबरा गये। सिख सीढिय़ां लेकर किले पर चढ़ते थे, पठान उन्हें ऊपर से धकेल देते थे।
खफी खां का मानना है कि इस हमले में बैरागी सेना के साथ न था। लोहगढ़ में यह समाचार सुनकर बैरागी क्रोध में भरा हुआ आया और नगर को जीत लिया।
बहादुरशाह भी घबराता था
उन दिनों बाबा बंदा बैरागी के विषय में यह चर्चा रहती थी कि उसने भूत, जिन्न आदि को अपने वश में कर लिया है और वे सब उसके संकेत पर नाचते हैं। इन बातों की सूचना जब तत्कालीन मुगल बादशाह बहादुरशाह को हुई तो वह बैरागी से अत्यंत भयभीत हो उठा। उसे लगा कि यदि बैरागी से कोई शत्रुता मोल ली गयी तो उसके जीवन के लिए भी संकट हो सकता है। लोग बहादुरशाह के पास बंदा बैरागी को पकड़वाने के लिए शिकायत लेकर जाते थे, पर वह कुछ भी करने की स्थिति में नहीं रह पाता था। लोगों के समक्ष अपनी असहायावस्था को स्वयं स्वीकार कर लेता था। जब बादशाह दक्षिण से लौटकर आया तो कुछ मुस्लिम सरदारों ने उसके आते ही वैरागी की शिकायतें करनी आरंभ कर दीं।
तब कहते हैं कि बादशाह ने एक तलवार निकालकर भूमि पर रख दी और कहा कि जिसमें साहस है वह इस तलवार को उठाकर विधर्मी (काफिर) का अंत कर दे। परंतु किसी ने भी वह तलवार नहीं उठायी। सबका साहस बैरागी के नाम पर भंग हो चुका था। हर व्यक्ति जानता था कि तलवार उठाने का परिणाम बैरागी से युद्घ करना है, और बैरागी से युद्घ करने का परिणाम अपनी मृत्यु को स्वयं निमंत्रण देना है। इसलिए सबने मौन की चादर ओढ़ ली।
अंत में लिया गया युद्घ का निर्णय
चुप रहने से काम चलने वाला नहीं था। तब बहादुरशाह ने सभी दरबारियों के विचार सुनकर निर्णय दिया कि असगर खां, समंद खां, असदुल्लाखान तथा नूरखां को एक बड़ी सेना देकर वीर बैरागी से युद्घ के लिए भेजा जाए। सभी ने इस प्रस्ताव को स्वीकृति प्रदान की। एक लाख की सेना के साथ इन तीनों ने वीर बैरागी से युद्घ के लिए प्रस्थान किया। इस युद्घ में बैरागी की सेना में कठिनता से 20,000 सैनिक ही रहे होंगे।
शाही सेना तरावड़ी की ओर आगे बढ़ी और उसने उस पर अधिकार स्थापित कर लिया। भाई परमानंद जी का कथन है कि-”सरस्वती नदी के किनारे सिखों की पराजय हुई। उन्होंने लोहगढ़ में आश्रय लिया। इतने में बैरागी भी आ पहुंचा। कोट आबू खां के समीप बड़ा भारी युद्घ हुआ। शाही सेना लगभग एक लाख थी। बैरागी के साथ उसका पांचवां भाग मुश्किल से था। इनकी ऐसी पराजय हुई कि बचना भी कठिन हो गया। सब भाग निकले। जिधर जिसका मुख था उधर ही वह चल दिया। बैरागी भी घोड़े को भगाये जाता था। मिर्जा बेग का पुत्र नवाब बेग उसका पीछा कर रहा था। भागते -भागते एक स्थान पर अग्नि दीख पड़ी। समझा कि वहां अवश्य ही कोई है। उधर को मुख किया। एक बाग में जा निकला। बाग का माली और उसकी मालिन आग ताप रहे थे। बैरागी वहां बैठा ही था कि घोड़ों की टाप सुनाई दी। इसने छिपने का कोई स्थान पूछा। एक कुंआ पास था। प्राण रक्षा के लिए उसमें उतर गया। पीछा करने वाले माली को धमकाने लगे। उसने बता दिया। बैरागी चुपके से निकला और खेतों में दौड़ता हुआ भाग गया। उसके पंाव और टंागें घावों से भर आयीं। रास्ते में एक झोंपड़ा दिखाई दिया। उसमें चला गया। रात थोड़े आराम से बीती। प्रात: ही झोंपड़ी का स्वामी आ गया। उसने चिल्लाना आरंभ किया। बैरागी ने झट से खंजर निकाला और उसका अंत कर दिया। वह आगे चल पड़ा और कुछ दिन के पश्चात लोहगढ़ जा पहुंचा।”
राजपूत पलटन ने दिया शत्रु का साथ
विपरीत काल में अपने भी साथ छोड़ जाते हैं, वैसे सयाने लोगों का कहना है कि विपरीत दिनों में ही अपने-पराये की जानकारी होती है। इसलिए विपरीत दिनों का आना कोई बुरी बात नही है। बैरागी पर भी विपरीत दिनों की मार पड़ रही थी और कई अपने लोग ही उसका साथ छोड़ रहे थे। सबसे दुखद बात यह थी कि जब वह लोहगढ़ आकर रूका तो पीछे से जहांदारशाह (शाहजादा) की सेना आ गयी। शाहाबाद के निकट दोनों पक्षों में युद्घ हुआ तो इस युद्घ में राजपूतों ने बैरागी का साथ नहीं दिया। उन्होंने शत्रु पक्ष का साथ दिया, जिससे शत्रु का पलड़ा भारी हो गया। शाहजादा ने लोहगढ़ का घेरा डाल दिया। यह घेरा लगभग एक मास तक चला बैरागी के उत्साहपूर्ण भाषणों के उपरांत भी उसकी सेना भूखी-प्यासी रहने के कारण विचलित होने लगी। उसका मनोबल टूटता ही जा रहा था। उसके कुछ सैनिकों ने बौद्घिक चातुर्य का परिचय दिया उनमें से कुछ मुसलमानी वेश बनाकर बाहर निकल आये, और बाहर से खाने की सामग्री लेकर भीतर चले गये।
एक दिन वीर बैरागी आधी रात में उठकर शत्रु सेना पर टूट पड़ा। इसे चमकौर का युद्घ कहा जाता है। बड़ा भारी युद्घ हुआ। सिखों ने बड़ी वीरता और साहस का परिचय दिया। मुस्लिम इतिहासकारों का मत है कि बैरागी ने इस युद्घ में गुलाब नामक एक व्यक्ति को अपने स्थान पर रखकर स्वयं निकल भागा। गुलाब पकड़ा गया। खानखाना ने बड़ी प्रसन्नता से बैरागी के पकड़े जाने का सुखद समाचार दिया पर जब पता चला कि वह व्यक्ति बैरागी नही गुलाब है तो बादशाह ने खानखाना को उसकी धृष्टता के लिए बहुत लताड़ा। तब बादशाह स्वयं बैरागी का अंत करने के लिए एक सेना के साथ चल दिया। परंतु लाहौर पहुंचने पर वह रोगग्रस्त हो गया और उसकी मृत्यु हो गयी। यह घटना 1713 ई. की है।
बादशाह की मृत्यु के उपरांत बैरागी को कुछ चैन मिला। क्योंकि मुगलिया सत्ता के लोग अपने उत्तराधिकार के परंपरागत युद्घ में व्यस्त हो गये। इस काल का सदुपयोग करते हुए बैरागी ने शक्ति संचय पर ध्यान दिया। क्योंकि उसे पता था कि दिल्ली में उत्तराधिकार का निर्णय होते ही उसी की ओर ध्यान दिया जाएगा।
(लेखक की पुस्तक प्राप्ति हेतु डायमण्ड पॉकेट बुक्स प्रा. लिमिटेड एक्स-30 ओखला इंडस्ट्रियल एरिया फेस-द्वितीय नई दिल्ली-110020, फोन नं. 011-40712100 पर संपर्क किया जा सकता है। (साहित्य सम्पादक)

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