गीता का सत्रहवां अध्याय

मनुष्य के पतन का कारण कामवासना होती है। बड़े-बड़े सन्त महात्मा और सम्राटों का आत्मिक पतन इसी कामवासना के कारण हो गया। जिसने काम को जीत लिया वह ‘जगजीत’ हो जाता है। सारा जग उसके चरणों में आ जाता है। ऐसे उदाहरण भी हमारे इतिहास में अनेकों हैं जिन्होंने कामवासना को जीतने का उल्लेखनीय और वन्दनीय कार्य कर दिखाया। आज के संसार में सर्वत्र कामवासना का बोलबाला है इसलिए लोगों को इस बात पर विश्वास नहीं होता कि भारत में कभी ऐसे लोग भी रहे होंगे जिन्होंने कामवासना को ही जीत लिया होगा। यदि भारत की ओर से अपने वैदिक साहित्य का और गीता जैसे पवित्र ग्रन्थों का विश्वस्तर पर प्रचार-प्रसार किया जाता तो भारत के विषय में विश्व के लोगों की बनी इस धारणा को समाप्त किया जा सकता था।
पश्चिमी जगत ने ‘काम’ को नियंत्रण से बाहर माना है, इसलिए वह काम के आधीन होकर कार्य करने का अभ्यासी रहा है, जबकि भारत ने काम को अपने नियंत्रण में रखकर कार्य करने का कीर्तिमान स्थापित किया है। यह है भारत की महानता का प्रमाण।
गीता कहती है कि हे संसार के लोगों! तुम अपने आपको काम के आधीन न रखकर शस्त्रों के आधीन रखकर चलने के अभ्यासी बनो। शास्त्रों का सत्य ज्ञान तुम्हें भ्रमित नहीं होने देगा और तुम महान से महानतर बनते जाओगे। गीता का यह भी कहना है कि यदि शास्त्रों के अनुसार जीवन जीने का मार्ग नहीं अपनाया तो पूर्णत्व की प्राप्ति करना असम्भव हो जाएगा। तब मनुष्य सर्वोच्च आध्यात्मिकता की स्थिति को प्राप्त नहीं कर सकेगा। कामना की हरी-हरी घास को चुगना पशु प्रवृत्ति है। कामना को छोड़ परमपिता परमात्मा के नाम रस के अमृत को पीना मानव के उत्कर्ष की निशानी है। मनुष्य ईश्वर का अमृत पुत्र है इसलिए उससे अपेक्षा की जाती है कि वह ऐसे कार्य करेगा जो उसके अनुकूल होंगे और उसकी गरिमा में वृद्घि करने वाले होंगे।
मनुष्य जंगलों में तो रहे पर जंगली बनकर (पशु) न रहे। जंगल में रहकर मंगल (आत्म कल्याण) की खोज करे और नाम रस के सोमरस को पीकर उसी में आनंदित रहे-इसी से मानवतावाद और संस्कृतिवाद को फैलाया जा सकता है। कामनाएं व्यक्ति को स्वच्छन्दी बनाती हैं उच्छ्रंखल और स्वेच्छाचारी बनाती हैं, जबकि शास्त्र उसे मर्यादित बनाते हैं और सबके लिए उपयोगी बनाते हैं। ‘गीता’ विश्व में स्वेच्छाचारिता और उच्छ्रंखला को फैलाने के विरूद्घ है। श्री कृष्णजी गीता का उपदेश अर्जुन को एक स्वेच्छाचारी और उच्छं्रखल विचार धारा के विनाश के लिए ही तो दे रहे हैं। वह नहीं चाहते कि दुर्योधन की यह विचार धारा वैश्विक संस्कृति के रूप में मान्यता प्राप्त करे। इसके विपरीत वह शास्त्रोक्त नीति और मर्यादा को ही वैश्विक संस्कृति का आधार बनाने के पक्षधर हैं। जिससे कि विश्व का और मानवता का कल्याण हो सके। यही कारण है कि श्रीकृष्ण जी अर्जुन को कामनाओं के जंजाल से निकालकर शास्त्रों के भीतर प्रवेश कराते हैं। जिससे कि अर्जुन कामनाओं के झाड़ झंखाड़ों को उखाडक़र शास्त्रोक्त धर्म की स्थापना करके मानवता का भला करने वाला हो जाए।
गीता के सत्रहवें अध्याय का आरम्भ ‘श्रद्घा’ से होता है। श्रद्घा के बिना शास्त्रों का ज्ञान प्राप्त करना सर्वथा असम्भव है। शास्त्रोक्त धर्म को श्रद्घा से ही पहचाना जा सकता है और श्रद्घा से उसे अपना व अपने जीवन का कल्याण किया जाना सम्भव है। अत: सत्रहवें अध्याय को आरम्भ करते हुए गीताकार अर्जुन के मुख से कहलवाता है कि हे कृष्ण! संसार में कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जो शास्त्रों के विधि विधान की व्यवस्था और उनके प्रतिपादित सिद्घान्तों की कोई चिन्ता नहीं करते हैं और ‘श्रद्घा’ से युक्त होकर यज्ञ करते हैं, अर्थात जीवन रूपी यज्ञ का संचालन करते हैं। ऐसे लोगों के विषय में मुझे बताइये किउनकी मानसिक स्थिति सतोगुणी होती है, राजसिक होती है या फिर तामसिक होती है?
अर्जुन को यहां पुन: एक गम्भीर प्रश्न ने घेर लिया है। वह ठीक कह रहा है कि संसार में ऐसे लोग भी होते हैं जिन्हें शास्त्रों से या शास्त्रोक्त व्यवस्थाओं से कोई लेना-देना नहीं होता-उनका उन्हें कोई विशेष ज्ञान नही होता पर फिर भी वे अपना कार्य जीवन-व्यवहार पूर्ण श्रद्घा के साथ एक यज्ञ की भांति सम्पन्न करते रहते हैं।
इस पर श्रीकृष्णजी ने भी अर्जुन को बड़ा सटीक उत्तर दिया। वह कहने लगे कि अर्जुन! संसार में प्राणिमात्र की श्रद्घा तीन प्रकार की होती है और यह भी ध्यान रखने वाली बात है कि श्रद्घा के ये तीन प्रकार प्राणिमात्र के स्वभाव से उत्पन्न होते हैं। श्रीकृष्ण जी बताने लगे हैं कि सात्विक स्वभाव वाले लोगों की श्रद्घा को सात्विकी श्रद्घा के रूप में जाना जाता है। जबकि राजसिक स्वभाव वालों की श्रद्घा को राजसिकी श्रद्घा के रूप में और तामसिक स्वभाव वालों की श्रद्घा को तामसिकी श्रद्घा के रूप में जाना जाता है।
मनुष्य में श्रद्घा स्वाभाविक रूप से होती है। इस प्रकार मनुष्य स्वभावत: श्रद्घामय है, श्रद्घा से भरा है। बिना श्रद्घा के यह संसार चल ही नहीं सकता। श्रद्घा के बिना कोई ज्ञान नहीं हो सकता। जब तक मनुष्य को ज्ञान नहीं, तब तक उसका जीवन व्यर्थ है। अत: जीवन को सार्थक बनाने के लिए श्रद्घा का होना बहुत आवश्यक है, हर मनुष्य अपने बड़ों के प्रति या किसी न किसी व्यक्ति या अपने इष्टदेव के प्रति श्रद्घा से स्वाभाविक रूप से भरा होता है। जिसकी जैसी श्रद्घा होती है-श्रीकृष्णजी का कथन है कि वह वैसा ही होता है। श्रीकृष्णजी कहते हैं कि सात्विक स्वभाव वाले व्यक्ति देवताओं की पूजा करते हैं, उनकी श्रद्घा अपने देवताओं के प्रति होती है। उसी श्रद्घा के सागर में वे गोते लगाते हैं और आनन्दानुभूति करते हैं। जबकि राजसिक स्वभाव वाले व्यक्ति संसार में यक्षों और राक्षसों की पूजा करते हैं, इसी प्रकार संसार में तामसिक प्रवृत्ति वाले व्यक्ति भूत-प्रेतों की पूजा करते हैं। श्रीकृष्ण जी ने यहां बहुत गम्भीर बात कह दी है। संसार के लोगों की यह प्रकृति होती है कि वे अपनी श्रद्घा को अपने ही ढंग से स्पष्ट या प्रकट करते रहते हैं। कई लोगों के लिए देवता श्रद्घा के केन्द्र होते हैं तो कइयों के लिए आतंकी भी श्रद्घा के केन्द्र होते हैं। बहुत से लोगों ने ओसामा बिन लादेन को भी अपना आदर्श माना और उसके प्रति अपनी श्रद्घा व्यक्त कर उसके ‘अधूरे कार्यों’ को पूर्ण करने का संकल्प लिया। ऐसे लोग संसार के लिए नि:संदेह हानिकारक होते हैं। इसके उपरान्त भी श्रद्घा इनकी श्रद्घा कुछ न कुछ गुल खिलाती ही रहती है। बड़े-बड़े तानाशाह क्रूर शासक संसार में आये, जिनका इतिहास ने भरपूर निन्दन ही किया, परंतु इस सबके उपरान्त भी संसार के क्रूरता समाप्त नहीं हुई। इसका कारण यही है कि क्रूर लोगों के भी अनुयायी संसार में होते हैं। इसी प्रकार संसार में कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जो अपनी तामसिक प्रवृत्ति के कारण भूत प्रेतों को पूजते घूमते हैं। आज भी निम्नश्रेणी के लोग ऐसे कार्य करते देखे जाते हैं। ये लोग वही होते हैं जो अज्ञानान्धकार में भटक रहे हैं। ये भूतप्रेतों को ही अपने वश में करने की साधना में लगे रहते हैं और इसी प्रकार के कार्यों में अपनी श्रद्घामयी ऊर्जा का अपव्यय करते रहते हैं।

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