गीता का सत्रहवां अध्याय

श्रीकृष्ण जी कह रहे हैं कि संसार में कई लोग ऐसे भी होते हैं जो कि दम्भी और अहंकारी होते हैं। ऐसे लोग अन्धश्रद्घा वाले होते हैं और शारीरिक कष्ट उठाने को ही मान लेते हैं कि इसी प्रकार भगवान की प्राप्ति हो जाएगी। यद्यपि ऐसे कठोर तपों का शास्त्रों में कहीं भी उल्लेख नहीं है। कई लोग आपको संसार में ऐसे मिल जाएंगे जो अपने चारों ओर अग्नि जला लेते हैं और बीच में स्वयं बैठ जाते हैं। उसे वे तपना कहते हैं। इसी को ऐसे लोग घोर तपस्या मान लेते हैं। इसी प्रकार कुछ लोग संसार में ऐसे भी होते हैं जो कि पानी के बीच एक पैर पर खड़े होकर भजन करते हैं। वे इसी को तपस्या मानते हैं। इसी प्रकार के सारे कार्यों को श्रीकृष्णजी दम्भी और अहंकारी लोगों की सोच बता रहे हैं। क्योंकि ऐसी किसी साधना या तपस्या का कोई उल्लेख शास्त्रों में नहीं है।
श्रीकृष्णजी ने ऐसा कहकर इन दम्भी और पाखण्डी लोगों की ऐसी तपस्या पर प्रतिबन्ध लगा दिया है। श्रीकृष्णजी कहते हैं कि अर्जुन जो लोग अपनी अज्ञानता और मूर्खता के कारण अपने शरीर को इस प्रकार कष्ट देते हैं और अपने शरीर में विद्यमान पंच महाभूतों के समूह को अनावश्यक ही कष्ट देते हैं, और अपने शरीर में स्थित आत्मतत्व और परमात्म तत्व की घोर उपेक्षा करते हैं-उन्हें तू आसुरी बुद्घि वाला समझ।
श्रीकृष्णजी कहते हैं कि संसार में जिस प्रकार श्रद्घा तीन प्रकार की होती है-वैसे ही आहार भी तीन प्रकार का ही होता है सात्विक, राजसिक और तामसिक। जैसी जिसकी श्रद्घा होती है उसे वैसा ही भोजन भी प्रिय लगने लगता है। जिसका जैसा भोजन होता है उसकी वैसी ही श्रद्घा बन जाती है। सात्विक श्रद्घा वाला व्यक्ति सात्विक भोजन ही लेगा वह तामसिक भोजन ले ही नहीं सकता। इसी प्रकार तामसिक श्रद्घा वाला व्यक्ति तामसिक भोजन ही पसंद करता है वह सात्विक भेाजन को बिना स्वाद का कहकर ठुकरा देता है।
त्रिविध आहार क्या है?
योगेश्वर श्रीकृष्णजी कहते हैं कि जो भोजन, आयु, सात्विक वृत्ति, बल, आरोग्य-सुख और उल्लास को बढ़ाते हैं जो रसीले स्निग्ध, शरीर को स्थिर करने वाले, रूचिकर होते हैं, वे सात्विक वृत्ति वाले लोगों को प्रिय होते हैं।
ऐसे भोजन में सात्विक वृत्ति वाले लोगों की स्वाभाविक श्रद्घा होती है अर्थात यह उनका स्वाभाविक भोजन होता है। जिससे सात्विक वृत्ति वाले लोग अधिक स्वस्थ और चिरायु मिलते हैं। दीर्घजीवी होते हैं। उनकी ऊर्जा, क्रोधादि दोषों में कम से कम व्यय होती है। जिससे वे स्वस्थ चित्त और प्रसन्नचित मिलते हैं। आगे श्रीकृष्णजी कह रहे हैं कि जो भोजन कटु अर्थात चटपटे, खट्टे नमकीन, बहुत गर्म, तीखे रूखे और जलन उत्पन्न करने वाले होते हैं-वे मनुष्य शरीर में जाकर दु:ख शोक और रोग को उत्पन्न करते हैं, और ऐसे भोजन राजसिक वृत्ति वालों को प्रिय होते हैं।
संसार में राजसिक प्रवृत्ति वाले लोग ऐसा ही भोजन करते देखे जाते हैं। इससे ये लोग दु:ख शोक और रोग के भंवर में फंस जाते हैं और इनमें फंसकर ही जीवन को नष्ट कर लेते हैं। भोजन को जब से व्यक्ति ने नमकीन, चटपटा, तीख और जलन उत्पन्न करने वाला बनाकर खाना आरम्भ किया है तब से ही संसार में दु:ख शोक और रोग की वृद्घि हुई है। उससे पूर्व जब लोग भारत के ऋषियों की भांति सात्विक भोजन को ग्रहण किया करते थे तब सर्वत्र सात्विकता का ही परिवेश होता था और मानव समाज दु:ख शोक व रोग से मुक्त रहा करता था।
इस प्रकार आज के मानव समाज को दु:ख शोक व रोग से मुक्त होने के लिए भारत की सात्विक भोजन परम्परा का ही अनुसरण करना चाहिए।
आगे योगीराज कह रहे हैं कि जो भोजन देर का पड़ा हुआ हो, नीरस हो, सड़ गया हो, बासी हो, जूठा हो, गन्दा हो ऐसा भोजन तामस वृत्ति वालों को प्रिय होता है। ये लोग आज भी मलीन बस्तियों में देखे जाते हैं। इनकी प्रवृत्ति तामस होती है। ये अज्ञानान्धकार के घोर कुहासे में भटकते फिरते हैं। इनकी सोच के कारण संसार में अज्ञानता फैलती और बढ़ती है, साथ ही कितने ही प्रकार के रोग-शोकों में वृद्घि होती है। हमारे शास्त्रों में शुद्घ और सात्विक भोजन को ही व्यक्ति के लिए अच्छा माना गया है। इसका कारण यही है कि सात्विक आहार ही व्यक्ति को सार्थक जीवन जीने का बोध कराता है।
क्या हैं त्रिविध यज्ञ?
यज्ञ पर गीता ने विशेष बल दिया है। पूर्व अध्यायों में भी इस पर प्रकाश डाला गया है। गीता के सत्रहवें अध्याय में श्रीकृष्णजी ने एक बार पुन: यज्ञों की चर्चा की है। वह कहते हैं कि जो व्यक्ति संसार में यज्ञ करने को अपना कत्र्तव्य मानकर और यज्ञफल की आकांक्षा छोडक़र यज्ञ करते हैं उन लोगों का ऐसा यज्ञ सात्विक यज्ञ कहलाता है। ऐसे लोग अपने मन का समाधान करके अर्थात मन को एकाग्र करके याज्ञिक कार्य सम्पन्न करते हैं।
श्रीकृष्णजी की इस बात का अभिप्राय है कि यज्ञ तभी सात्विक रह पाता है जब आप उसमें कोई निहित स्वार्थ नहीं देखते हैं और उसे यज्ञफल की आकांक्षा से मुक्त कर ‘सर्वजन हिताय और सर्वजन सुखाय’ की सर्वोत्तम भावना से प्रेरित होकर करते हो। ऐसी सर्वोत्तम भावना मन की एकाग्रता से बनती है। जिसका मन एकाग्र हो गया-समझो वह यज्ञ के योग्य हो गया और यज्ञ उसके योग्य हो गया। वर्तमान में संसार के लोग केवल स्वार्थ में डूबे हुए हैं और उनके यज्ञ भी स्वार्थ प्रेरित हो गये हैं। यही कारण है कि लोग दिखाने के लिए तो बहुत यज्ञादि करते हैं-परन्तु उनके परिणाम उन्हें मनोनुकूल प्राप्त नहीं होते। इसका अभिप्राय है कि उनके यज्ञ में सात्विक भाव नहीं है।
योगेश्वर श्रीकृष्णजी कहते हैं कि -”हे भरतकुल में श्रेष्ठ अर्जुन! संसार में कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जो अपने यज्ञ कर्म को भी किसी फल की आसक्ति से प्रेरित होकर या फल को लक्ष्य में रखकर करते हैं, ऐसे लोग दम्भ के लिए और लोगों को अपना वैभव-ऐश्वर्य प्रदर्शित करने के लिए ऐसा करते हैं। ऐसे लोगों की इस प्रकार की प्रवृत्ति को राजसिक यज्ञ कहा जाता है।”
संसार में संसार के लोग ऐषणाओं में फंसे रहते हैं। इन ऐषणाओं से बाहर निकलना हर किसी के वश की बात नहीं होती। बड़ी कठिनता से लोग इन पर अपना नियंत्रण स्थापित कर पाते हैं। राजसिक प्रवृत्ति के लोगों से तो बहुत कम अपेक्षा की जा सकती है कि वे ऐषणाओं को जीत सकते हैं। राजसिक प्रवृत्ति के लोग अपने राजसिक वैभव और ऐश्वर्य में आकण्ठ डूबे रहते हैं। वे अपने वैभव और ऐश्वर्य का दूसरों पर दबदबा बनाने के लिए उसका झूठा प्रदर्शन करते हैं और यज्ञ जैसे पवित्र कार्य को भी इसी झूठे प्रदर्शन में फंसाकर रख देते हैं। श्रीकृष्णजी ऐसे यज्ञ को राजसिक यज्ञ कहते हैं। क्रमश:

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