सत्यार्थ प्रकाश में इतिहास विर्मश ( एक से सातवें समुल्लास के आधार पर) अध्याय 29 क आत्मा – परमात्मा, जीव और भाषा

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आत्मा – परमात्मा, जीव और भाषा

संसार के सारे ऐश्वर्य बहुत ही फीके हैं ,अपेक्षाकृत परमपिता परमेश्वर के आनंद को पाने के। भारत के ऋषि पूर्वज आध्यात्मिक आनंद की अनुभूति करते थे और परम पिता परमेश्वर के सानिध्य में रहकर जीवन को जीने की उत्कृष्ट कला में पारंगत थे। संसार की सभी इच्छाओं से मुक्त होकर वे शुद्ध, बुद्ध, मुक्त परमपिता परमेश्वर को पाने और पाकर उसी में मग्न रहने को ही जीवन का लक्ष्य मानते थे।

पाकर अपने ईश को, मगन रहो सुबह शाम।
दुर्लभ यह संयोग है, हृदय में है धाम।।

महर्षि याज्ञवल्क्य भी अपनी पत्नी मैत्रेयी से कहते हैं कि “हे मैत्रेयि! जो परमेश्वर आत्मा अर्थात् जीव में स्थित और जीवात्मा से भिन्न है; जिस को मूढ़ जीवात्मा नहीं जानता कि वह परमात्मा मेरे में व्यापक है; जिस परमेश्वर का जीवात्मा शरीर अर्थात् जैसे शरीर में जीव रहता है वैसे ही जीव में परमेश्वर व्यापक है । जीवात्मा से भिन्न रहकर जीव के पाप पुण्यों का साक्षी होकर उन के फल जीवों को देकर नियम में रखता है वही अविनाशीस्वरूप तेरा भी अन्तर्यामी आत्मा अर्थात् तेरे भीतर व्यापक है; उस को तू जान। क्या कोई इत्यादि वचनों का अन्यथा अर्थ कर सकता है ?”

भारत का सांस्कृतिक मूल्य

आत्म साक्षात्कार के माध्यम से जब मनुष्य अपने भीतर बैठे ब्रह्म को जान व समझ लेता है तो उसे इस बात का ज्ञान हो जाता है कि जो ब्रह्म मेरे भीतर विराजमान है, वही सर्वत्र विद्यमान है, व्याप्त है। इससे सभी भूतों में परमपिता परमेश्वर का प्रकाश होता दिखाई देता है। ऐसी दशा में संसार के प्रत्येक प्राणी को ईश्वर की एक मूर्ति माना जाता है। अलग-अलग योनियों के अलग-अलग चेहरे जो हमें दिखाई देते हैं, तब इनके भीतर उस परमात्मा का स्वरूप दिखाई देने लगता है और हमारी अनेक भ्रांतियों का निवारण हो जाता है। हम समझने लगते हैं कि यह सब चेहरे उस निराकार परमेश्वर का ही साकार रूप है।
तब कोई भी व्यक्ति किसी दूसरे जीव के प्रति हिंसा का विचार तक नहीं कर सकता। सभी भूतों में उस परमपिता परमेश्वर का प्रकाश देखना भारत का एक सांस्कृतिक मूल्य है। यह मूल्य उस समय इतिहास की धरोहर बन जाता है जब कोई भी राजा या उसका कोई भी सैनिक या शासक वर्ग का कोई भी व्यक्ति प्रजाजनों के अधिकारों पर कुठाराघात करने से पहले एक बार नहीं दस बार सोचता है। ऐसे राजा या शासक वर्ग के लोग मानव मात्र के प्रति ही नहीं बल्कि जीव मात्र के प्रति भी दया से भरे होते हैं। सर्वत्र परमपिता परमेश्वर को उपस्थित मानकर कोई भी राजा या उसका कोई अधिकारी या सैनिक किसी भी प्रकार के अहंकार में डूबकर यह नहीं सोच सकता कि उसे परमपिता परमेश्वर नहीं देख रहा। सर्वत्र व्यापक होने से परमपिता परमेश्वर सबको हर काल में देखता है। ऐसे भावों को रखकर कोई भी राजा कभी किसी प्रकार का पाप या अपराध नहीं कर सकता।

एक महत्वपूर्ण जानकारी

संसार में अनेक लोग ऐसे हैं जो ब्राह्मण ग्रंथों और आरण्यकों, उपनिषद आदि को भी वेद की संज्ञा दे दिया करते हैं। जबकि सच्चाई यह है कि ये वेद नहीं है। वेदों की व्याख्या में लिखे गए ग्रंथ हैं। उनका महत्व अथवा औचित्य वेदों की बातों का ही सरल भाषा में प्रचार प्रसार करना है। स्वामी दयानंद जी महाराज का यह भी मानना रहा है कि जब वेदों का पठन-पाठन गुरूकुलों में विधिवत आरंभ हो गया तो छोटे-छोटे विद्यार्थियों को समझाने के दृष्टिकोण से और अध्ययन की सुविधा के दृष्टिगत कुछ विद्वानों ने इन मंत्रों में अपने मत के अनुसार परिवर्तन किए। इन परिवर्तनों से ही वेदों की विभिन्न शाखाओं का विकास हुआ। भारत के सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के इतिहास के विषय में स्वामी दयानंद जी महाराज द्वारा दी गई यह जानकारी बहुत महत्वपूर्ण है। स्वामी दयानंद जी महाराज ने इस प्रकार की शाखाओं की कुल संख्या 1127 बताई है।
प्रत्येक मंत्र के आरंभ में ऋषि, देवता, छंद और स्वर लिखा होता है। इसमें से ऋषि एक ऐतिहासिक व्यक्ति का नाम होता है। जिसने उस मंत्र के अर्थ और ज्ञान का अपने समय में प्रचार प्रसार किया होता है। देवता से यह पता चलता है कि इस मंत्र में किस विषय का वर्णन किया जा रहा है। छंद और स्वर का ज्ञान उस मंत्र का सही ढंग से पाठ करने में हमारी सहायता करता है।
मंत्र के ऋषि के साथ उसकी प्रसिद्धि और विद्वता का स्तर जुड़ा होता है। वेद के किसी भी मंत्र से जब किसी विशेष ऋषि का नाम लिया जाता है तो सामान्यतया वह ऋषि इतिहास में भी कहीं ना कहीं उल्लेखित होता हुआ देखा गया है। उसकी ऐतिहासिकता उसकी विद्वत्ता का और उसकी विद्वत्ता उसके ऐतिहासिक होने का प्रमाण है।
यह छोटी बात नहीं है कि उसने वेद के किसी मंत्र विशेष पर अपना एकाधिकार कर लिया। वेदों के किसी मंत्र विशेष पर किसी ऋषि विशेष का नाम होने से भारतीय समाज की उस परंपरा की प्रमाणिकता भी सिद्ध होती है जिसके अंतर्गत हम अपने कुल या वंश के पूर्वजों को पीढ़ियों तक सम्मान देने में गर्व और गौरव की अनुभूति करते हैं। किसी ऋषि के मंत्र को उसकी पीढ़ियां कंठस्थ कर अपने ऋषि पूर्वज को सम्मान प्रदान करती थीं । अपने ऋषि पूर्वजों के प्रति वह अपना सम्मान भाव उनके नाम को अपने गोत्र के रूप में स्वीकृति देकर भी करती देखी गई हैं। जब कोई मंत्र किसी विशेष ऋषि के साथ जुड़ जाता है तो उसकी पीढ़ियां भी उस मंत्र पर गर्व करती हैं।

एक वैज्ञानिक सत्य

भारत ऋषियों का देश है। ऋषियों की वैज्ञानिक और तार्किक बुद्धि पर भारत को गर्व है। क्योंकि उनकी बुद्धि से हमने इस संपूर्ण भूमंडल पर अपना यश फैलाया था। उनका वैज्ञानिक चिंतन और वैदिक ज्ञान हमारे अंत:करण को पवित्र  रखता है। अंतःकरण की पवित्रता हमारे कार्यों को पवित्र करती है और हमारे कार्यों की पवित्रता संपूर्ण धरा को पवित्र करती है। इस प्रकार इस पवित्रता का भारतीय सांस्कृतिक राष्ट्रवाद और इतिहास से अन्योन्याश्रित संबंध है। इस अन्योन्याश्रित संबंध ने भारत को उत्कृष्टता प्रदान की है। भारत की आभा को सारे भूमंडल पर आलोक प्रसृत करने में सहायता दी है।

परमेश्वर का इस जगत में व्यापक और जीव रूप होकर शरीर में प्रविष्ट होना एक वैज्ञानिक सत्य है। इस वैज्ञानिक सत्य को जब कोई भी व्यक्ति स्वीकार कर लेता है तो उसे परमेश्वर की सत्ता यत्र- तत्र- सर्वत्र विद्यमान दिखाई देती है। उसकी सत्ता की इस अनुभूति के चलते कोई भी व्यक्ति पाप नहीं कर सकता।
इस वैज्ञानिक सत्य को स्वामी दयानंद जी महाराज प्रत्येक मनुष्य के अंतर्मन में बैठा देना चाहते थे। यह केवल सिद्धांत की रक्षा की बात नहीं है, अपितु इस सिद्धांत के अपनाने से जीवन और जगत की कई प्रकार की जटिलताएं भी समाप्त हो जाती हैं। अध्यात्म जगत के कई प्रश्न समाप्त हो जाते हैं।

कर्म भोग सिद्धांत और इतिहास

कर्म भोग सिद्धांत भी देश की संस्कृति, राजनीति और इतिहास को प्रभावित करता है। कर्म करने में स्वतंत्रता और फल भोगने में परतंत्रता के भाव के चलते व्यक्ति दुष्कर्म करने से रुकता है। अपने आप को बचाता है। यदि कर्म करने में भी स्वतंत्र और फल भोगने में भी स्वतंत्र होने का सिद्धांत स्थापित कर दिया जाए तो सर्वत्र अशांति और अराजकता व्याप्त हो जाएगी। आज जिस नास्तिकता के भाव को हम देखते हैं, उसके पीछे व्यक्ति की यही सोच काम कर रही है कि वह कर्म करने में भी स्वतंत्र है और फल भोगने में भी स्वतंत्र है। मुल्ले- मौलवियों, पंडे – पुजारियों ने अपने इष्ट की उपासना करवाकर और कुछ लोगों से उनकी पाप की कमाई में से अधिक दान- पुण्य करवाकर जिस प्रकार उन्हें यह आश्वासन दिया है कि अब तुम्हारे सब पाप क्षमा हो गए , उससे भी कर्म की स्वतंत्रता के साथ-साथ फल भोगने की स्वतंत्रता का नास्तिक भाव संसार में बढ़ा है। इसी के चलते आज का संसार अशांति का दास बन चुका है।

डॉ राकेश कुमार आर्य

मेरी यह पुस्तक डायमंड बुक्स नई दिल्ली के द्वारा प्रकाशित हुई है । जिसका अभी हाल ही में 5 अक्टूबर 2000 22 को विमोचन कार्य संपन्न हुआ था। इस पुस्तक में सत्यार्थ प्रकाश के पहले 7 अध्यायों का इतिहास के दृष्टिकोण से विश्लेषण किया गया है। पुस्तक में कुल 245 स्पष्ट हैं। पुस्तक का मूल्य ₹300 है।
प्रकाशक का दूरभाष नंबर : 011 – 407122000।

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