मनुष्य इतना क्रूर क्यों होता जा रहा है? कब थमेगा जीव-जंतुओं पर होने वाला अत्याचार ?

जीव-जंतुओं-पर-अत्याचार-animal-cruelty

ललित गर्ग

पशुओं के प्रति क्रूरता रोकथाम अधिनियम भारतीय संसद द्वारा 1960 में पारित एक अधिनियम है जिसका उद्देश्य पशुओं को दी जाने वाली अनावश्यक पीड़ा और कष्ट को रोकना है। पशुओं के साथ निर्दयता का अर्थ है मानव के अतिरिक्त अन्य पशुओं को नुकसान पहुँचाना या कष्ट देना।
उत्तर प्रदेश के बदायूं में चूहे को मारने के आरोप में एक युवक के खिलाफ मामला दर्ज होने की घटना मानव-समाज में साधारण होकर भी चौंका रही है। चौंका इसलिये रही है कि यह मनुष्य की संवेदनहीनता, बर्बरता एवं क्रूरता की मानसिकता को दर्शाती है। बेजुबानों के साथ निर्दयता का सिलसिला खत्म नहीं होना चिन्ताजनक है। ऐसी घटनाएं बार-बार होती हैं, कभी एक गाय को खाने के समान में विस्फोटक पदार्थ एवं एक हथिनी को कुछ लोगों के मनोरंजन के चलते बारूद से भरे अनानास खिलाना हो, एक चीते को पीट-पीट कर मार देना हो…ऐसी घटनाएं बार-बार सामने आती हैं। हाल ही में दिल्ली में एक गर्भवती कुतिया को एक कालेज के कुछ कर्मचारियों और छात्रों ने मिल कर बेहद बर्बरता से पीट-पीट कर मार डाला- ये घटनाएं क्रूरता की पराकाष्ठा हैं, जो मनुष्यता को शर्मसार करती हैं। बदायूं का यह ताजा मामला चूंकि अब कानून के कठघरे में है, इसलिए अब इसका फैसला कानूनी प्रक्रिया के तहत किया जाएगा। दरअसल, पशु क्रूरता निवारण अधिनियम का मकसद ही मनुष्य के ऐसे व्यवहारों पर लगाम लगाना है ।

विडम्बना है कि आज दुनिया में क्रूरता को लेकर कई आंदोलन चल रहे हैं। अनेक देशों में प्राणियों को बुरी तरह मारा जाता है। अरब देशों में मनोरंजन के लिये ऊंटों पर बच्चों को बांध कर दौड़ाना हो या प्रसाधन-सामग्री जुटाने के उद्देश्य से निरीह एवं बेजुबान प्राणियों का संहार किया जाना- ये मनुष्य की छीजती संवेदना एवं करूणा को दर्शाती हैं। हिंदुस्तान जैसा धर्म प्रधान देश भी इस समस्या से अछूता नहीं है। विलास की भावना की पूर्ति की पृष्ठभूमि में कितने प्राणियों की आह और करुण चीत्कार होती है? जितना ऐश्वर्य, विलास और भोग है, उसके साथ क्रूरता जुड़ी हुई है। विलास, ऐश्वर्य और भोग की प्रवृत्ति ने क्रूरता को बढ़ावा दिया है। आज दुनिया में करुणाशील लोगों की संख्या कम है, क्रूर लोगों की संख्या बढ़ रही है। इसका एक मुख्य कारण है- विलास की भावना का प्रबल बनना। बढ़ते हुए विलास के साधनों से भी यह समस्या उग्र बनी है।

पशुओं के साथ क्रूरता की घटनाएं बहुत ज्यादा हो रही हैं। सड़क पर रहने वाले जानवरों से लेकर पालतू पशुओं तक को क्रूरता झेलनी पड़ती है। दूध निकालकर गायों को भी यूं ही छोड़ दिया जाता है। भूखी-प्यासी गाएं कचरे में मुंह मारती नजर आती हैं। कुत्ते बहुत ज्यादा क्रूरता झेलते हैं। पाड़े, घोड़े, खच्चर, ऊंट, बैल, गधे जैसे जानवरों का इस्तेमाल माल की ढुलाई के लिए किया जाता है। इस दौरान उनके साथ बहुत ज्यादा क्रूरता होती है। पशुओं की तकलीफों को लेकर बिलकुल भी जागरूकता नहीं है। पशुओं के प्रति क्रूरता रोकने के लिए कानून सख्त होना चाहिए, जेल भी हो और साथ-साथ भारी जुर्माना भी हो, ताकि लोगों में डर पैदा हो।

इस लिहाज से देखें तो बदायूं की घटना में यह विचित्र था कि युवक ने पहले तो एक चूहे को मारने के लिए उसकी पूंछ को एक पत्थर से बांधा, फिर उसे एक नाले में फेंक दिया, जिससे चूहे की मौत तड़प-तड़प कर हो गयी। किसी पशु के प्रति इस तरह की क्रूरता का यह कोई अकेला उदाहरण नहीं है। आए दिन ऐसे मामले सामने आते रहते हैं। यह कैसी क्रूरता एवं असंवेदना पनप रही है? मनुष्य की क्रूरता से शोषण की समस्या गंभीर बनी है। जिसमें धर्म का संस्कार नहीं है, उसमें उतना ही ज्यादा असंतोष है, क्रूरता का भाव है। आज भी धन के लिए एक आदमी दूसरे आदमी की हत्या कर देता है। आदमी आदमी के प्रति संवेदनशील नहीं है, करुणाशील नहीं है। इसे हम विलास और क्रूरता कहें, भीतर की अतृप्ति या असंतोष कहें। जब तक भीतर तृप्त होने की बात समझ में नहीं आएगी, विलास और क्रूरता की समस्या समाहित नहीं हो पाएगी। अगर इस तरह जीव-जंतुओं को मारने में सचमुच कोई संतोष मिलता है तो क्या यह इस बात का सबूत नहीं है कि ऐसे व्यक्ति के भीतर संवेदना सूखती जा रही है या फिर उसने अपने मानवीय विवेक एवं करूणा को विकसित करने में उदासीनता बरती है।

पशुओं के प्रति क्रूरता रोकथाम अधिनियम भारतीय संसद द्वारा 1960 में पारित एक अधिनियम है जिसका उद्देश्य पशुओं को दी जाने वाली अनावश्यक पीड़ा और कष्ट को रोकना है। पशुओं के साथ निर्दयता का अर्थ है मानव के अतिरिक्त अन्य पशुओं को नुकसान पहुँचाना या कष्ट देना। एंजेल ट्रस्ट नाम की एक संस्था की ओर से दायर याचिका में कहा गया है कि मौजूदा समय में पशु क्रूरता अधिनियम के तहत सजा के प्रावधान बेहद हल्के हैं, उन्हें सख्त बनाये जाने की जरूरत है। वैसे कानून बनाने मात्र से इस समस्या पर विजय प्राप्त नहीं की जा सकती। इसके लिए जरूरी शुरुआत परिवार से करनी होगी। जब हम बाहर निकलते हैं, तो पशुओं के साथ क्रूरता की घटनाएं भी नजर आती हैं। कुछ लोग पशु-पक्षियों के साथ क्रूरतापूर्ण व्यवहार करते हैं। ऐसे लोगों को रोकें, पृथ्वी पर जितना हक हमारा है उतना ही उन निरीह प्राणियों का भी है। हमें समझना चाहिए कि जब हम किसी को जीवनदान नहीं दे सकते तो हमें उसे मारने का भी कोई हक नहीं बनता है।

मनुष्य की विवेक आधारित संवेदनशीलता ही मनुष्य को समूचे जीवन-जगत में खास बनाती है। ऐसे तमाम पशु-पक्षी रहे हैं, जो मानव सभ्यता के विकास क्रम में उसके सहायक के रूप में साथ रहे और कई स्तर पर बेहद उपयोगी साबित हुए। आदमी और जानवरों का रिश्ता बहुत पुराना है, मनुष्य का विकास भी क्रमागत तरीके से जानवरों से ही हुआ है, मगर इतनी लंबी विकास यात्रा के बाद मनुष्य फिर से जानवर बन रहा है और पशुओं पर जमकर अत्याचार कर रहा है। महज अपने मनोरंजन, लाभ, सुख एवं सौन्दर्य की खातिर बेजुबान जानवरों की जान लेने में भी नहीं चूक रहा है और अक्सर ही पशुओं पर बेरहमी से अत्याचार की खबरें सामने आती ही रहती हैं। यहां तक की जानवरों की रिहाइश तक को इंसान ने सुरक्षित नहीं छोड़ा है और जंगल पर अतिक्रमण किये हैं। अपने चंद फायदे के लिए वह निर्दयता करने में एवं निरीह जानवरों की जान लेने में भी नहीं चूकता है, जानवरों के अंगों के बेचकर फायदा कमाने की चाह में आदमी बेरहमी से उनका कत्ल भी निःसंकोच कर देता है। यानि ये अंतहीन सिलसिला है जिसका कोई अंत होता नहीं दिख रहा है। आदमी कहीं अपने चंद पैसों के लालच में तो कहीं सिर्फ मनोरंजन की खातिर इन बेजुबानों पर जमकर अत्याचार कर रहा है और उनकी जान तक लेने में गुरेज नहीं कर रहा है, ये जानते हुए भी कि इन पशुओं के बगैर उसके खुद के अस्तित्व पर भी खतरा हो जाएगा क्योंकि ये प्रकृति का चक्र है जिसमें हर किसी की अहमियत है और उसका रोल निर्धारित है, जाने कब आदमी इंसान बनेगा- ये बड़ा सवाल है जिसका उत्तर शायद ही कभी मिल पाए।

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