सत्यार्थ प्रकाश में इतिहास विर्मश ( एक से सातवें समुल्लास के आधार पर) अध्याय 27 ( क ) ईश्वर की प्रार्थना और हमारा जीवन

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ईश्वर की प्रार्थना और हमारा जीवन

स्वामी दयानंद जी महाराज ने ईश्वर जीव और प्रकृति के अस्तित्व को अजर और अमर स्वीकार किया। ऐसा करके उन्होंने वैदिक ऋषियों के साथ हमारा तारतम्य स्थापित किया। बीच में पौराणिक काल में आई विभिन्न मान्यताओं को स्वामी जी महाराज ने क्रांतिकारी ढंग से चुनौती देते हुए दूर करने का साहसिक प्रयास किया। स्वामी जी महाराज का एकेश्वरवाद का सिद्धांत भी पूर्णतया वैदिक दृष्टिकोण पर आधारित है। स्वामी जी महाराज ने अनेकेश्वरबाद की धारणा को चुनौती दी। भक्ति के नाम पर फैले हुए प्रत्येक प्रकार के पाखंड और आडंबर का उन्होंने भरपूर विरोध किया।
स्वामी दयानंद जी महाराज का क्रम, पुनर्जन्म और मोक्ष में विश्वास था । उनकी यह वैदिक अवधारणा थी कि कर्मों के अनुसार ही प्रत्येक जीव को फल प्राप्त होता है। जन्म मरण के बंधन से मुक्ति हो जाना ही मोक्ष है। स्वामी जी महाराज का सोलह संस्कारों में भी अटूट विश्वास था। उनका मानना था कि संस्कारों के द्वारा शारीरिक, मानसिक तथा आध्यात्मिक उन्नति को प्राप्त किया जा सकता है।
हिंदुओं की मूर्ति पूजा के बारे में उनकी स्पष्ट धारणा थी कि जब से मूर्ति पूजा का पाखंड हिंदू समाज में व्याप्त हुआ तब से ही आर्यों के पतन की कहानी का आरंभ हो गया। मूर्ति पूजा लोगों में जड़ता को पैदा करती है । उनके बौद्धिक विकास को बाधित करती है और आत्मोन्नति के मार्ग को कुंठित करती है। स्वामी दयानंद जी महाराज ने इस बात को भी गहराई से समझा कि यदि मूर्ति पूजा नहीं होती तो भारत कभी भी विदेशियों के शासन के अधीन नहीं आता। इसके अतिरिक्त वे यह भी मानते थे कि ईरान ,इराक, अफगानिस्तान, इंडोनेशिया, जावा, सुमात्रा, बोर्नियो, कंबोडिया ,तिब्बत ,श्रीलंका आदि सुदूर देशों तक फैला हुआ कभी का आर्यावर्त भी मूर्ति पूजा जैसे धार्मिक पाखंड के कारण ही हमसे दूर हो गया अर्थात भारत बार-बार खंडित हुआ।
अपनी इसी प्रकार की मान्यताओं के कारण स्वामी जी महाराज ने मूर्ति पूजा का जोरदार खंडन किया। अपने मिशन की सफलता के लिए स्वामी जी महाराज ने राजनीतिक क्रांति उत्पन्न करने पर अधिक ध्यान दिया। यही कारण था कि वे अपने प्रवास के समय राजा महाराजा या अधिकारीगण के यहां पर ही रुका करते थे। इस प्रकार स्वामी जी महाराज प्राचीन काल के आर्य आर्य भाषा और आर्यावर्त के पुजारी थे।

भारतीय राष्ट्रवाद की मूल चेतना

 स्वामी दयानंद जी महाराज ने सत्यार्थ प्रकाश के सातवें समुल्लास में वैदिक संस्कृति के एकेश्वरवाद को बड़ी विद्वता पूर्ण परंतु सरल भाषा में स्पष्ट किया है। वेदों की ओर लौटने का उनका आवाहन इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जाना चाहिए कि वेदों की ओर लौटते ही हमें अपनी भारतीय संस्कृति का यथार्थ ज्ञान हो जाता है। इसके साथ ही साथ भारतीय इतिहास में कैसे उतार-चढ़ाव आए हैं और किस प्रकार विपरीत विचारों के प्रवेश कर जाने से या अर्थ का अनर्थ करने वाले तथाकथित  विद्वानों के द्वारा अपनी  मनमानी व्याख्याऐं स्थापित करने से उन्होंने किस प्रकार वैदिक संस्कृति का अहित किया है ? यह भी स्पष्ट हो जाता है। 
भारतीय इतिहास और संस्कृति का और भारत के सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की मूल चेतना का विषय यदि कोई ढूंढना चाहता है तो वह केवल और केवल एकेश्वरवाद ही हो सकता है। इसी बात को स्वामी जी महाराज ने सत्यार्थ प्रकाश के 7 वें समुल्लास में स्पष्ट किया है, इसके साथ-साथ उन्होंने इस समुल्लास में ईश्वर के गुणों की विवेचना भी की है। इस समुल्लास के प्रारंभ में ही उन्होंने यह स्पष्ट कर दिया है कि मेरी यह मान्यता नहीं है कि ईश्वर अनेक हैं। उन्होंने इस समुल्लास के माध्यम से यह स्पष्ट किया है कि ईश्वर सर्व व्यापक, निराकार, सर्वशक्तिमान, सर्वाधार, अनुपम, अनादि आदि गुणों से युक्त है।
 संसार के जो लोग उस परमपिता परमेश्वर को इस रूप में न तो जानते हैं और न मानते हैं वे दुख उठाते हैं और जो नित्य उसका  इसी रूप में यजन भजन करते हैं ,वे सदा आनंद में रहते हैं। ऐसे लोगों की मानसिक भटकन की स्थिति समाप्त हो जाती है और उन्हें आत्मिक आनंद अनुभव होने लगता है। एक ईश्वर में विश्वास रखने वाले मनुष्य आत्म रस में डुबकी लगाते हैं और उसके अप्रतिम आनंद का रसास्वादन लेते हैं।

इस समुल्लास के माध्यम से स्वामी जी ने यह भी स्पष्ट किया है कि पृथ्वी जड़ देवता है। इसे कहीं भी आर्ष ग्रंथों में उपासनीय नहीं माना गया है। देवता शब्द का अर्थ ईश्वर से नहीं लगाना चाहिए। पृथ्वी आदि देवताओं का देव होने के कारण परम पिता परमेश्वर महादेव है। मनुष्य को चाहिए कि वह महादेव अर्थात परमपिता परमेश्वर की उपासना करें। जिसने इस संपूर्ण चराचर जगत का निर्माण किया है। इस चराचर जगत का निर्माण करने के बाद वह अपने आपको अदृश्य कर सर्वत्र व्याप्त हो गया है। प्रकृति के कण-कण में समाविष्ट वह परमपिता परमेश्वर जिसे सर्व व्यापक सत्ता के नाम से जाना जाता है, हमारे भीतर भी विराजमान है।

डॉ राकेश कुमार आर्य

मेरी यह पुस्तक डायमंड बुक्स नई दिल्ली के द्वारा प्रकाशित हुई है । जिसका अभी हाल ही में 5 अक्टूबर 2000 22 को विमोचन कार्य संपन्न हुआ था। इस पुस्तक में सत्यार्थ प्रकाश के पहले 7 अध्यायों का इतिहास के दृष्टिकोण से विश्लेषण किया गया है। पुस्तक में कुल 245 स्पष्ट हैं। पुस्तक का मूल्य ₹300 है।
प्रकाशक का दूरभाष नंबर : 011 – 407122000।

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