गीता का अठारहवां अध्याय

यहां पर श्रीकृष्णजी ने अपनी सुंदर शैली में यह स्पष्ट कर दिया है कि संसार के लोग मोहवश चाहे किसी काम को न कर सकें-परन्तु कर्मशील लोग संसार के सभी कार्यों को वैसे ही पूर्ण करते हैं-जैसी उनसे अपेक्षा की जाती है।
ईश्वर की शरण का गुह्म उपदेश
ईश्वर की शरण का गुह्म उपदेश करते हुए श्रीकृष्णजी अर्जुन से कह रहे हैं कि ‘हे अर्जुन! ईश्वर सब प्राणियों के हृदय प्रदेश में बैठा हुआ है। यदि कोई व्यक्ति ईश्वर को ढूंढना या खोजना चाहे तो वह उसे अपने हृदय प्रदेश में बड़ी सरलता से मिल सकता है।
हृदय के आकाश में बैठा है जगदीश।
विद्वज्जन वहीं खोजते कहते हैं मम ईश।।
वेद का भी यही मत है कि वह हृदय प्रदेश में ही खोजा जा सकता है, क्योंकि उसके मिलने का एकमात्र यही पवित्र स्थान है। हमारे हृदय प्रदेश में छिपा या वहां बैठा परमपिता परमेश्वर वहीं रहकर संसार के सब प्राणियों को इस प्रकार घुमा रहा है कि मानो वे किसी यंत्र पर चढ़े हुए हैं।
इस वर्णन के विषय में डा. राधाकृष्णन लिखते हैं कि-‘परमात्मा हमारा स्वेच्छापूर्वक सहयोग चाहता है, जिससे सौन्दर्य और अच्छाई का प्रसव पीड़ा के बिना प्रयासहीन रूप से जन्म हो जाए। जब हम परमात्मा के प्रकाश के लिए अपने अहंकार का त्याग कर देते हैं, उस प्रकाश के लिए पारदर्शक माध्यम बन जाते हैं, तब वह अपने कार्य के लिए हमारा उपयोग करता है।’
ईश्वर की शरण का गुह्म उपदेश करते हुए श्रीकृष्णजी आगे कहते हैं कि-‘ हे भारत! तू सर्वभाव से, अपने सम्पूर्ण अस्तित्व को समेटकर उसी की शरण में जा। उसी की कृपा से तुझे परमशान्ति और शाश्वत भाव प्राप्त होगा।’
शरण उसी की जायकर होता है कल्याण।
परमशान्ति मिलती हमें और मिले सम्मान।।
श्रीकृष्णजी पुन: मनुष्य को यह संकेत कर रहे हैं कि यदि तू वास्तव में अपना कल्याण चाहता है तो तुझे परमपिता परमात्मा की शरण में ही जाना होगा। उसके बिना कुछ भी सम्भव नहीं है, हमें अपना सम्पूर्ण अस्तित्व समेटकर अर्थात अपने अहंकार को एक ओर रखकर श्रद्घाभाव से परमपिता-परमेश्वर की शरण में जाना चाहिए, हमें उसकी शरण में जाने पर ही परमशान्ति और शाश्वतभाव प्राप्त होगा। यहां इस श्लोक में श्रीकृष्णजी ईश्वर के बारे में स्पष्ट कह रहे हैं कि ईश्वर ही विश्व का सृष्टिचक्र चला रहा है। इससे यह एक बार पुन: स्पष्ट हो जाता है कि श्रीकृष्णजी अपने आपको विश्व के सृष्टि चक्र को चलाने वाले ईश्वर से अलग मानते हैं।
श्रीकृष्णजी ने अर्जुन को आगे कहा कि परमपिता-परमेश्वर के सम्बन्ध में यह ज्ञान मैंने तुझे बताया, ऐसा ज्ञान जो सब रहस्यों से बड़ा रहस्य है। इस रहस्य के रहस्य को तू समझ और इस ज्ञान पर पूरी तरह विचार करके जैसा चाहे वैसा कर। ऐसा कहकर श्रीकृष्णजी ने संसार के लोगों को भी यह स्पष्ट कर दिया है कि यदि संसार के लोग अपना कल्याण चाहते हैं तो अपना सम्पूर्ण अस्तित्व मिटाकर या समेटकर उन्हें ईश्वर की शरण में जाना चाहिए। ईश्वर की शरण में जाने से ही उन्हें वास्तविक शान्ति उपलब्ध हो सकती है।
श्रीकृष्णजी अर्जुन से कहते हैं कि अब तू मेरे परम वचन को एक बार पुन: सुन ले। मेरा यह वचन $गुह्म, गुह्मयतर, गुह्मतम है। इसे समझना हर किसी के वश की बात नहीं है। श्रीकृष्णजी का आशय है कि तू मेरा परमप्रिय है, इसलिए अर्जुन मैं तुझे बतलाऊंगा कि तेरे लिए क्या हितकर है? योगीराज अपने प्रिय शिष्य अर्जुन को बता रहे हैं कि अर्जुन जो मैंने तुझे बताया या समझाया है इसे तू अंगीकार कर और अंगीकार करके इस पर अमल करने काभी प्रयास कर। संसार के लोगों से चूक यहीं होती है कि वे अपने गुरू से ज्ञान तो भरपूर ले लेते हैं और तोते की भांति उस ज्ञान को पूरी तरह रट भी लेते हैं-पर उसे हृदयंगम नहीं करते। जिससे उनके जीवन में कथनी और करनी में अन्तर रह जाता है। जब साधना पीछे रह जाए और भावना आगे बढ़ जाती है तो दोनों का अन्तर कथनी और करनी के अन्तर के रूप में प्रकट होता है।
इसे ऐसे समझा जा सकता है कि पाठ तो पढ़ा गया -‘सदा सत्य बोलो’-और व्यवहार में सदा सत्य बोलने का अभ्यास नहीं किया गया अर्थात सदा सत्य बोलने की साधना नहीं की गयी। इस प्रकार ‘सदा सत्य बोलना’ कहने के लिए तो रट लिया पर उसका अभ्यास या साधना न करने के कारण उसे व्यवहार में अपना नहीं सके। इससे कथनी और करनी में अन्तर आ जाता है। आज के संसार के लोग नैतिकता को एक छलावा या दिखावा या आडम्बर मानने लगे हैं, और कहते हैं कि मैं दिखावटी बातों में विश्वास नहीं करता, मैं बहुत व्यावहारिक (प्रैक्टीकल) हूं। ऐसा कहने वाले लोगों को यह कौन समझाये कि व्यावहारिक वही हो सकता है जो नैतिक बातें करता हो और उन्हें अपनाता भी हो। जो व्यक्ति व्यापार के गुणाभाग की और जोड़ घटाओ की बात करता हो-वह कभी भी व्यावहारिक नहीं हो सकता। उसके अन्तर में कतरनी चलती रहती है। श्रीकृष्णजी इस कतरनी को मिटा देना चाहते हैं और कतरनी को मिटाकर व्यक्ति जैसा भीतर है वैसा ही उसे बाहर दिखाने की शिक्षा देते हैं। गीता का व्यवहारवाद यही है। इसी व्यवहारवाद पर गीता व्यक्ति को जीवन की उत्कृष्टतम शैली में ढालने का प्रयास करती प्रतीत होती है। यदि गीता का यह व्यवहारवाद दुर्योधन जैसी दुष्टात्माएं उस समय अपनाए होतीं तो महाभारत का विनाशकारी युद्घ कभी होता ही नहीं। अत: गीता के इस व्यवहारवाद को ही श्रीकृष्णजी ने अर्जुन को यह कहकर स्पष्ट किया है कि यह गुह्म, गुह्मतर, गुह्मतम वचन है।
गीता के ज्ञान को अपनाने में जब से भारत ने आलस्य और प्रमाद बरतना आरम्भ किया और विदेशी सत्ताधीशों की शिक्षानीति को अपने लिए अपनाने की भूल की तभी से भारत दुर्दशा का शिकार हुआ है। देश की स्वतन्त्रता के पश्चात हमारे लिए यह आवश्यक था कि हम अपने गीता जैसे ग्रन्थों के प्रति श्रद्घा प्रकट करते और इन्हें अपने सामाजिक और राष्ट्रीय जीवन में अपनाकर राष्ट्र निर्माण के कार्य में सन्नद्घ होते तो उत्तम होता। गीता के इस ज्ञान में प्रसन्नता है, उल्लास है, उत्साह है, उमंग है, जीवन है, और आनन्द है। लोगों ने आनन्द को ही संभवत: ‘मजा’ कहा है। पर वे जिस मजा को मजा समझ रहे हैं-वह मजा नहीं वह तो सजा है। सजा को मजा मानना मूर्खता की निशानी है। वास्तविक मजा तो गीता के आनन्द में है। जिसमें उत्कृष्ट जीवनशैली और सार्थक जीवनबोध की गंगा-यमुना बहती हुई सर्वत्र जान पड़ती है। सारा संसार हमारी इस पवित्र ज्ञान गंगा में स्नान करने के लिए आज भी भागता हुआ भारत की ओर आ रहा है। हम उसे देख नहीं पाये हैं, या समझ नहीं पाये हैं-तो इसमें संसार का कोई दोष नहीं है-दोष हमारा है। अत: हमें ही अपने दोष दूर करने के लिए पुन: ‘भागीरथ प्रयास’ करने होंगे। क्रमश:

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