गीता का अठारहवां अध्याय

अपने आपको मुझमें लगा, मेरा भक्त बन, मेरा पूजन कर, मुझे नमस्कार कर, ऐसा करने से तू मुझ तक पहुंच जाएगा। क्योंकि तू मेरा प्रिय है।
श्रीकृष्णजी ऐसा कहकर अर्जुन रूपी बालक को भगवान रूपी माता केदुग्धामृत का पान करने के लिए उसकी ओर बढऩे की प्रेरणा दे रहे हैं। इस विषय में महात्मा नारायण स्वामी जी महाराज ने बहुत सुंदर लिखा है-”छोटे बालक में जब घुटनों के बल चलने की शक्ति आ जाती है तो वह भूख लगने पर घिसटते-घिसटते माता तक पहुंच जाता है और पास पहुंचकर माता के मुख की ओर आशाभरी दृष्टि से देखता है। उस अबोध शिशु के देखने की मूक भाषा का अर्थ यह है कि माता तेरी छाती का दुग्धामृत पीने के लिए मुझमें जो शक्ति थी-मैंने व्यय कर दी। अब तेरे स्तनों तक तो मैं तभी पहुुंच सकता हूं, जब तू ही कृपा करके अपने हाथों का सहारा देकर मुझे अपनी छाती पर उठावेगी।”
बच्चा मां के पास में खड़ा हुआ है मूक।
गोद उठा के दुग्ध पिला लगी हुई है भूख।।
योगेश्वर श्रीकृष्ण जी कह रहे हैं कि तू मेरा पूजन कर, नमस्कार कर, तू मेरा प्रिय है-ऐसा कहकर वह भी अर्जुन को यही बता रहे हैं कि तू मासूम बनकर और अपनी व्याकुलता को बढ़ाकर अपना हाल बिगाडक़र बच्चे की भांति मेरी ओर आ तो सही, अर्थात ईश्वर की ओर चल तो सही-तुझे वह गले से ना लगा ले तो कहना। वह ईश्वर परम दयालु है, करूणा निधान है, उसकी करूणा होगी और तुझे वह कृपालु बनकर मां की तरह अपनी छाती से लगा लेगा क्योंकि तू उसका प्रिय है।
हर व्यक्ति यही भूले रहता है कि मैं ईश्वर का प्रिय हूं। हम दूसरों के सुखों से और वैभव से जल-जलकर राख होते रहते हैं, और ये सोचते रहते हैं कि ईश्वर तो दूसरों पर ही कृपालु है, वह मेरे लिए कृपालु नहीं है। हम सोचते रहते हैं कि वह ईश्वर हमारी ओर कभी देखेगा भी नहीं, हमारी सुनेगा भी नहीं। क्योंकि वह दूसरों की सुन रहा है और दूसरों की सुनने में ही वह व्यस्त है, हमारी ओर देखने की उसे फुर्सत कहां है? हम यह भूल जाते हैं कि हम स्वयं दूसरों की भांति उसे कितना अपनी ओर खींचते हैं, उसका कितना यजन-भजन करते हैं? कितना पुकारते हैं उसे? कितना उसे अपना हाल सुनाते हैं? दूसरों को देखने में और दूसरों की उन्नति से जलने में ही हम समय गुजार देते हैं। हमारी इसी सोच के कारण उससे हमारी दूरी बनी रहती है। योगेश्वर इसी दूरी को मिटा देने की शिक्षा हमें दे रहे हैं।
अपनी बात को और भी अधिक स्पष्ट करते हुए श्रीकृष्णजी आगे कह रहे हैं कि अर्जुन! तू सारे धर्मों को छोडक़र केवल मेरा आश्रय ले ले, मेरी शरण में आ जा। यदि तू ऐसा करेगा तो तेरा कल्याण हो जाएगा। अपने भीतर चातक की सी प्यास जगा और ‘पी, पी-पी, पी’ करते हुए अपनी भाषा में ईश्वर को पुकारना सीख। यदि तूने पपीहे की सी पुकार लगानी सीख ली अर्थात पपीहा जैसी प्रार्थना तेरी हो गयी तो यह निश्चित समझ कि तेरे सभी दु:खों का अन्त हो जाएगा। श्रीकृष्ण जी कहते हैं कि तू दु:खी मत हो, मैं तुझे सब पापों से मुक्त कर दूंगा। यहां पापों से मुक्त करने का अभिप्राय है कि तेरी बुद्घि को इतनी निर्मल और पवित्र कर दूंगा कि वह पाप वासनाओं से मुक्त हो जाएगी।
यह वही बात श्रीकृष्णजी ने पुन: कह दी है कि तू मेरी ओर बढ़ तो सही, तुझे धनाढ्य ना कर दूं तो कहना। तेरे पाप-ताप-सन्ताप का हरण न कर लूं तो कहना। कितने आत्मविश्वास से श्रीकृष्णजी अपने भगवान पर भरोसा कर रहे हैं कि तू उसकी ओर बढ़ तो सही वह तुझे सारी पापवासनाओं से मुक्त कर देगा। वास्तव में ईश्वर पर इतना भरोसा वही कर सकता है जो स्वयं भी भगवान का परमभक्त हो। जितनी प्रगाढ़ श्रद्घा होगी-भक्ति भी उतनी ही गहरी होगी। श्रीकृष्णजी स्वयं भगवान के गहरे भक्त थे, गहरे श्रद्घालु थे, उन्हें अनुभव था कि ईश्वर सचमुच बड़े दयालु हैं-तभी तो वह अपने अनुभव को अर्जुन के साथ सांझा कर रहे हैं और उसे बता रहे हैं कि वह ईश्वर परम कृपालु है, यदि तुझ पर उसकी कृपा हो गयी तो तेरे सारे पाप-ताप शिथिल हो जाएंगे अर्थात तू पापवृत्ति से निवृत्त होकर पुण्य कार्यों में और भक्ति में लग जाएगा।
डा. राधाकृष्णन जी लिखते हैं कि जब हम उसकी (ईश्वर की) ओर अभिमुख हो जाते हैं और उसे अपने सम्पूर्ण अस्तित्व में रम जाने देते हैं तब हमारी जिम्मेदारी समाप्त हो जाती है। यह उस भगवान के प्रति नि:शेष आत्मसमर्पण है, जो हमें संभाल लेता है और हमें हमारी अधिकतम संभावित पूर्णता तक ऊपर उठाता जाता है।”
श्रीकृष्ण जी ने अर्जुन को जहां यह गुह्य उपदेश देकर उसका मार्गदर्शन किया है-वहीं उसे यह कहकर सावधान भी किया है कि मेरे द्वारा उपदिष्ट इस गुह्य उपदेश को किसी ऐसे व्यक्ति को कभी मत देना जो तपस्वी नहीं है, भक्त नहीं है, ईश्वर की आज्ञा का यथावत पालन करने वाला नहीं है-जिसमें सेवाभाव नहीं है या जो मेरी निन्दा (ईशनिन्दक है) करता रहता है। श्रीकृष्णजी ने इस गुह्य ज्ञान को ऐसे लोगों से दूर रखने की सलाह अर्जुन को इसलिए दी है जो लोग तपस्वी नहीं होते, भक्त नहीं होते, सेवाभावी नहीं होते और ईश्वर निन्दक होते हैं-वे इस प्रकार के गुह्य ज्ञान का या तो उपहास करेंगे या फिर उसे मानने से ही इनकार कर देंगे। ईशनिन्दकों से ईश्वर भक्ति की बात करना कतई भी उचित नहीं है। ऐसे लोग चिकने घड़े हो चुके होते हैं-जिन पर पानी की एक बूंद भी रूकती नहीं है।
श्रीकृष्णजी का मानना है कि जो व्यक्ति ईश्वर सम्बन्धी मेरे इस परम रहस्य को मेरे भक्तों को सिखाता है और मेरे प्रति परमभक्ति रखता है, या करता है, वह अवश्य ही मुझ तक पहुंच जाता है। यहां पर ईश्वर तक पहुंचने का मार्ग श्रीकृष्णजी ने बताया है। वह बता रहे हैं कि ईश्वर तक पहुंचने के लिए ईश्वरीय ज्ञान को ईश्वर के भक्तों तक पहुंचाने का कार्य हाथ में लेना चाहिए। इसका अभिप्राय है कि ईश्वरीय वेद ज्ञान के प्रचार-प्रसार एवं विस्तार के लिए व्यक्ति को कार्य करना चाहिए। वेद के ज्ञान का प्रचार-प्रसार एवं विस्तार ईश्वर की भक्ति है। ऐसा करने से संसार का परिवेश भक्तिमय बनता है और लोगों में परस्पर सम्मैत्री, सद्भाव एवं सहयोग के भावों में वृद्घि होती है। क्योंकि जैसे -जैसे लोग वेद ज्ञान के रहस्य को समझने व जानने लगते हैं, वैसे-वैसे ही उन्हें यह बात भी समझ में आने लगती है कि हम सभी एक ही पिता की संतानें हैं। अत: हम सभी परस्पर वैसे ही मिल जुलकर रहें जैसे एक पिता की संतानें एक ही छत के नीचे मिल जुलकर रहती हैं। हम ना तो धरती को बांटें और ना ही इस आसमान को बांटें। हम इनको लेकर लड़ें-झगड़ें नहीं जो लोग ईश्वर के ऐसे वेद ज्ञान का प्रचार-प्रसार एवं विस्तार करते हैं वह ईश्वर के प्रति परमभक्ति रखने वाले होते हैं। उनकी अपनी भक्ति दिनानुदिन गहरी होती जाती है और वह ईश्वर के रंग में हर क्षण रंगे रहने के अभ्यासी होते जाते हैं। उनकी परमभक्ति गीताकार की दृष्टि में ऐसी दूसरी शर्त है जो उन्हें ईश्वर के मार्ग का पथिक बना, देती है। इस प्रकार ईश्वरीय ज्ञान का प्रचार-प्रसार करने वाला और उसके प्रति परमभक्ति रखने वाला ईश्वर को पा लेता है। उस तक अवश्य ही पहुंच जाता है।
परम भक्ति रखे ईश में करता हो गुणगान।
पा लेता वह ईश को-है वेदों का ज्ञान।।
ऐसे ईश्वर भक्तों के विषय में गीता की मान्यता है कि जो लोग मेरे वेद ज्ञान का प्रचार-प्रसार एवं विस्तार करते हैं-उनकी अपेक्षा मनुष्यों में मेरा कोई अधिक प्रिय कार्य करने वाला नहीं है अर्थात मुझे ऐसे लोग ही अधिक प्रिय हैं, ईश्वर ऐसे भक्तों पर विशेष कृपा करते हैं। उस व्यक्ति की अपेक्षा ईश्वर को कोई अन्य व्यक्ति प्रिय नहीं है।
क्रमश:

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