गतांक से आगे………

हे अर्जुन! संसार से ऊंचा उठने के लिए राग-द्वेष आदि द्वन्द्वों से रहित होने की बड़ी भारी आवश्यकता है, क्योंकि ये ही वास्तव में मनुष्य के शत्रु हैं, जो उसको संसार में फंसाये रखते हैं, और भगवान के चरणों में ध्यान नहीं लगने देते हैं। इसलिए तू सम्पूर्ण द्वन्द्वों से रहित हो जा। यहां भगवान कृष्ण अर्जुन को निद्र्वन्द्व होने के लिए क्यों कह रहे हैं? कारण कि द्वन्द्वों से सम्मोह होता है, मूढ़ता में वृद्घि होती है, संसार में फसावट होती है। जब साधक निद्र्वन्द्व होता है तभी वह दृढ़ होकर भक्ति कर सकता है तथा निद्र्वन्द्व होने से साधक संसार के बंधनों से सरलता से मुक्त हो सकता है और निद्र्वन्द्व होने से सम्मोह और मूढ़ता भी चली जाती है। निद्र्वन्द्व होने से साधक कर्म करता हुआ भी बंधता नहीं है, उसकी साधना अथवा भक्ति दृढ़ होती चली जाती है। इसीलिए भगवान कृष्ण अर्जुन को निद्र्वन्द्व होने पर विशेष बल दे रहे हैं।

‘नित्यसत्त्वस्थ’ से अभिप्राय है-द्वन्द्वों से रहित होने का उपाय यह है कि जो नित्यनिरंतर परमात्मा है, तू उसी में निरंतर स्थित रह अर्थात उसी में रमण कर।

‘निर्योग क्षेम’ से अभिप्राय है-ध्यान रहे, अप्राप्त वस्तु की प्राप्ति का नाम ‘योग’ है और प्राप्त वस्तु की रक्षा का नाम ‘क्षेम’ है। हे अर्जुन! तू योग और क्षेम की इच्छा भी मत रख, क्योंकि जो केवल मेरे परायण होते हैं, उनके योग-क्षेम का वहन मैं स्वयं करता हूं। ‘आत्मवान्’ से अभिप्राय है-हे अर्जुन! तू केवल परमात्मा के परायण हो जा, एक परमात्मा प्राप्ति का ही लक्ष्य रख।

सर्वदा याद रखो,

”बैर ही जहर है।”


परोपकारी इंसान का तथा उस करूणानिधान का आभार अवश्य व्यक्त करें-

ऐसे नर बिरले मिलैं,

जो करते उपकार।

उनसे भी कम वे मिलें,

व्यक्त करें न आभार ।। 1171 ।।

व्याख्या:-जो दूसरों को आपत्ति से निकालते हैं, उन्हें आप्त-पुरूष कहते हैं। साधारण बोल-चाल में इन्हें सत्पुरूष अथवा परोपकारी पुरूष कहते हैं। इस संसार में मनुष्यों की बड़ी भीड़ दिखाई देती है, किंतु बड़ी भीड़ में विपदा के समय दूसरों का दु:ख दर्द हरने वाले लोग दुर्लभ ही मिलते हैं, उनकी संख्या बहुत कम है किंतु आश्चर्य की बात यह है कि किये गये उपकार को मानने वाले अथवा कृतज्ञता को ज्ञापित करने वालों की संख्या परोपकारी पुरूषों से भी कम है।

क्या कभी सोचा है? परमपिता परमात्मा ने हमें जो मानव शरीर दिया है वह समस्त सृष्टि में उस स्रष्टा की सर्वोत्कृष्ट सुंदरतम रचना है। इसे जीवित रखने के लिए अन्न, औषधि, वनस्प्ति, खनिज पदार्थ, जीविकोपार्जन के असंख्य संसाधन दिये। पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश दिये। कितना बड़ा दाता है वो? कितना बड़ा अभियंता और नियंता है वो? सारे ग्रह, उपग्रह सूर्य और नक्षत्र, उल्कापिण्ड अपार ऊर्जा के स्रोत दिये। जरा यह भी गम्भीरता से सोचिए कि हम तो भोजन के निवाले को केवल हलक तक ले जाने का श्रम करते हैं, यहां से आगे उसमें पाचक रस कौन मिलाता है? भोजन रस कौन बनाता है? भोजन रस से रक्त कौन बनाता है? रक्त से अस्थि, मज्जा, मांस कौन बनाता है? धमनी और शिराओं में रक्त परिभ्रमण को निर्बाध रूप से कौन चलाता है? हम तो सो जाते हैं हमारे हृदय की धडक़न को कौन चलाता है? सांस-प्रश्वास के क्रम को निरंतर कौन चलाता है? मस्तिष्क को सोचने अथवा चिन्तन करने की शक्ति कौन देता है? बुद्घि को सही निर्णय करने तथा पुण्य में रत होने की प्रेरणा कौन देता है? मन को संकल्प विकल्प में रत कौन रखता है? चित्त में ज्ञान, कर्म पूर्वप्रज्ञा (बुद्घि, वासना, स्मृति संस्कार) को कौन संजोयकर रखता है? आत्मा में अमृत तत्तव की प्यास किसकी प्रेरणा से रहती है? इत्यादि ऐसे यक्ष प्रश्न है जिनका उत्तर केवल मात्र वह स्रष्टा है, जिसने यह समस्त संसार रचाया है। क्या कभी उस स्रष्टा की इन अनंत अनुकम्पाओं के प्रति सच्चे मन से आभार व्यक्त करने के लिए समय निकाला है? इसका सकारात्मक उत्तर दो, चार प्रतिशत है अन्यथा नगण्य ही मिलेगा, ठीक इसी प्रकार इस संसार में किये हुए उपकार को मानने वाले तथा प्रतिकार में आभार व्यक्त करने वाले भी दो-चार प्रतिशत ही मिलेंगे अन्यथा नगण्य के बराबर है।

क्रमश: 

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