रजोगुण और तमोगुण की तरह सत्त्वगुण में मलिनता नहीं है इसलिए भगवान कृष्ण ने गीता के चौदहवें अध्याय के छठे श्लोक में सत्त्वगुण को ‘अनामयम्’ कहा है अर्थात निर्विकार कहा है। निर्मल और निर्विकार होने के कारण यह परमात्मा तत्त्व का ज्ञान कराने में सहायक है। सत्त्वगुण की प्रधानतमा से ‘मन’ को सहजता से काबू में किया जा सकता है। इससे सरल तरीका मन को काबू में करने का कोई और हो नहीं सकता है।

सत्त्वगुण निर्मल और निर्विकार होने के करण प्रकाश करने वाला है। जैसे प्रकाश में वस्तुएं साफ-साफ दीखती हैं, ऐसे ही मन में सत्त्वगुण की अधिकता होने से रजोगुण और तमोगुण की वृत्तियां साफ-साफ दीखती हैं। रजोगुण और तमोगुण से उत्पन्न होने वाले-काम, क्रोध, लोभ मोह, मद, मात्सर्य आदि दोष भी साफ-साफ दिखाई देते हैं अर्थात इन सब विकारों का साफ-साफ ज्ञान होता है।

सत्त्वगुण की वृद्घि होने पर इंन्द्रियों में प्रकाश, चेतना हल्कापन अथवा स्फूत्र्ति विशेषता से प्रतीत होते हैं, जिससे प्रत्येक पारमार्थिक अथवा लौकिक विषय को समझने में बुद्घि पूरी तरह कार्य करती है और कार्य करते समय मन में अतुलित उत्साह बना रहता है। सत्त्वगुण के दो रूप हैं-शुद्घ सत्त्व, जिसमें उद्देश्य परमात्म प्राप्ति का होता है, और दूसरा है-मलिन सत्त्व, जिसमें उद्देश्य सांसारिक भोग और संग्रह का होता है।

शुद्घ सत्त्वगुण में परमात्मा प्राप्ति का उद्देश्य होने से परमात्मा की तरफ चलने में स्वाभाविक रूचि होती है। मलिन सत्त्वगुण में पदार्थों के संग्रह और सुख भोग का उद्देश्य होने से सांसारिक प्रवृत्तियों में रूचि होती है, जिससे मनुष्य बंध जाता है। जैसे सत्त्वगुण की वृद्घि में ही वैज्ञानिक नये-नये आविष्कार करता है, किंतु उसका

उद्देश्य परमात्मा की प्राप्ति न होने से वह अहंकार, मान-बड़ाई, धन आदि से संसार में बंध जाता है अर्थात उसे जन्ममरण के क्रम में आना पड़ता है।

सारांश यह है कि यदि मनुष्य रजोगुण और तमोगुण की दो बड़ी बाधाओं को पार करने के लिए शुद्घ सत्त्वगुण में अपने मन बुद्घि को स्थिर कर ले तो इस जीवन का उद्घार इसी जन्म में हो सकता है अर्थात उस अमृत तत्व को प्राप्त किया जा सकता है, मोक्षधाम प्राप्त हो सकता है। मनुष्य का आत्मोत्थान हो सकता है।

भगवान की भकित निद्र्वन्द्व और निष्काम भाव से करो |

ध्यान धरै निर्बैर हो,

कर भूलै सत्काम।

सफल हने साधक वही,

भक्ति करै निष्काम ।। 1170।।

व्याख्या :-हे मनुष्य! यदि परमपिता परमात्मा का ध्यान करना है, अर्थात उसकी भक्ति में तन्मय होना है, लीन होना है तो अपने चित्त को निर्बैर कर ले अर्थात राग-द्वेष से रहित कर ले। क्योंकि यदि मनुष्य राग-द्वेष में लिप्त रहेगा तो उसका ध्यान संसार की बातों में केन्द्रित रहेगा परमात्मा के चरणों में नहीं लगेगा। इसके अतिरिक्त

हे मनुष्य! यदि तेरे हाथों से कोई पुण्य कार्य हो जाए, तो उसे याद मत रख क्योंकि यदि किये गये पुण्य को याद रखोगे, तो मन में अहंकार का भाव उत्पन्न हो जाएगा। किये गये पुण्य कार्य को तो ऐसे भूल जाना चाहिए जैसे हवन में आहूति देकर भूल जाते हैं। संसार में सफल साधक अथवा भक्त वही है, जो भगवान की भक्ति

भगवद्बुद्घि और निष्काम भाव से करता है। ध्यान रहे, इस संसार में अनंत तरह के ब्रह्माण्ड हैं, अनंत तरह के भोग हैं और ऐसे ही अनंत तरह की कामनाएं हैं, परंतु कामनाओं का त्याग कर दें, निष्काम हो जाएं, अपने को कत्र्ता नहीं निमित्त समझें। इस संदर्भ में भगवान कृष्ण ने गीता के दूसरे अध्याय में 45वें श्लोक में निद्र्वन्द्व होने के लिए विशेष बल दिया है-‘निद्र्वन्द्वो नित्यसत्त्वस्थो निर्योगक्षेम आत्मवान्।’

क्रमश:

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