अन्याय, आरक्षण, आरक्षण विरोध: यह सब क्या है ?

देश में कुछ लोगों ने ऐसा परिवेश सृजित करने का कुत्सित प्रयास किया है कि देश का बहुसंख्यक समाज परस्पर एकता का प्रदर्शन न कर सके। ओवैसी ने संसद में अविश्वास प्रस्ताव पर बहस के समय दलित और अल्पसंख्यकों के साथ होने वाले अन्याय को उठाया, उससे ऐसा लगा कि जैसे अन्याय उन्हीं के साथ हो रहा है और शेष लोगों के साथ कोई अन्याय नहीं हो रहा है। जम्मू कश्मीर के विषय में फारूक अब्दुल्ला ने कहा कि उन्हें भी इंसाफ चाहिए। ओवैसी ने जिस चतुरता से अपनी बात रखी उससे उनकी सोच स्पष्ट होती है कि वह दलितों को हिंदू समाज से अलग कर देखना चाहते हैं, जबकि फारूक अब्दुल्ला के लिए कश्मीर से अलग कुछ नहीं है। उन्हें केवल कश्मीर के साथ नाइंसाफी होती दिखाई देती है। इसी प्रकार तेलुगूदेशम को केवल आंध्र प्रदेश के साथ अन्याय होता हुआ दिखता है।

देश के विषय में और थोड़ा सोचें तो किसी क्षेत्र, समुदाय, वर्ग या संप्रदाय के अनेकों ठेकेदार आपको मिलेंगे जो अपने अपने क्षेत्र, समुदाय, वर्ग या संप्रदाय के साथ होने वाले अन्याय का रोना आपके सामने रोने लगेंगे। आरक्षण समर्थक कहेंगे कि हमारे साथ अन्याय होता रहा है और आज भी हो रहा है, इसलिए हम सबसे अधिक पीडि़त हैं, उत्पीडि़त हैं। जबकि आरक्षण विरोधी कहेंगे कि हमारे साथ अन्याय हो रहा है और आरक्षण के नाम पर हमारी प्रतिभा कुंठित व अपमानित हो रही है। इसी प्रकार देश में अन्याय और अपमान की अपने-अपने ढंग से परिभाषा सब लोगों ने गढ़ ली है। अपने स्वार्थ को उन्होंने अपने आप न्याय अन्याय और मान-अपमान के साथ जोड़ लिया है। जिससे देश में अव्यवस्था फैल रही है और हम इस अव्यवस्था के चलते देश में अराजकता का परिवेश सृजित कर रहे हैं। इन सब के मध्य भारत माता के साथ होने वाले अन्याय और अपमान की चिंता किसी को नहीं है? फलस्वरुप कश्मीर शेष देश के लिए क्या दे सकता है और क्या उसे देना चाहिए?- इस बात पर कोई भी ‘फारूक अब्दुल्ला’ संसद या उससे बाहर कभी नहीं बोलेगा। मुसलमान और दलितों को देश के लिए क्या देना चाहिए इस पर कोई ‘ओवैसी’ नहीं बोलेगा। इसी प्रकार आरक्षण समर्थकों के अधिकारों को आरक्षण विरोधी कब तक खाते रहेंगे?- इस पर कोई नहीं बोलेगा और ना ही आरक्षण विरोधियों की प्रतिभा के हो रहे दोहन पर कैसे रोक लगे?- इस पर भी कोई नही बोलेगा। सबको अपने अपने अधिकारों की चिंता है। फलस्वरुप सब के सब देश के कंकाल को नोंच रहे हैं।

मेरे पास एक सेवानिव्रत अधिकारी की वाट्ट्सएप्प पर पोस्ट आती हैं जो सारी की सारी युद्ध की घोषणा कराती जान पड़ती हैं। सामाजिक विसंगतियों को हवा दे देकर एक वर्ग के विरुद्ध लोगों को भडक़ाने का प्रयास किया जाता है या वह आंकड़े दिए जाते हैं जो समाज को विकास की राह पर न ले जा कर विनाश की राह पर ले जाएंगे। आरक्षण समर्थकों ने वह आंकड़े जुटा लिए हैं जिनसे देश के जातीय स्वरूप को विकृत करने में सहायता मिल रही है और देश में एक दूसरे को नीचा दिखाने के लिए जातीय सेनाएं बनाई जा रही हैं और आरक्षण विरोधियों ने भी लंगर लंगोट कस लिए हैं। लगता है खूनी कुश्ती की तैयारियां देश में हो रही हैं।

क्या कोई मुझे बता सकता है कि ऐसा क्यों हो रहा है? हम अपने ही लोगों के विरुद्ध क्यों लामबंद होते जा रहे हैं? यह स्थिति हमारे लिए कितनी सुखद होगी या दुखद होगी- इस पर विचार करने की आवश्यकता है। आरक्षण समर्थकों के भीतर एक भी ऐसा योद्धा नहीं है जो समाज में उतर कर सामाजिक क्रांति का बिगुल फूंक सके और समाज को समतामूलक परिवेश देने का साहस कर सके, जातिविहीन समाज की स्थापना कर सके और वेद के सं गच्छध्वं सं वदध्वं सं वो मनांसि जानताम् के आधार पर लोगों को साथ लेकर चलने की प्रेरणा देकर स्वयं ही एक-दूसरे के अधिकारों का सम्मान करने के लिए प्रेरित कर सकें। इसी प्रकार आरक्षण विरोधियों में भी कोई ऐसा ऋषि नहीं है जिसका चिंतन सर्व मंगल कामना से प्रेरित हो और जो समाज में हो रहे जातीय संघर्ष कीचूलों को मजबूती दे सके। इस प्रकार समाज नेतृत्वविहीन है, इसीलिए छोटी-छोटी सभाओं में, समारोहों में, सार्वजनिक स्थानों पर लोग आपको या तो आरक्षण के विरोध में या समर्थन में तथ्यों के आधार पर बातें करते मिल जाएंगे। ये लोग समाज में जातीय संघर्ष की भावना को चुपचाप बढ़ाने का राष्ट्र विरोधी कार्य करते होते हैं, पर स्वयं को बहुत बड़ा चिंतक और जाति विशेष का विद्वान समझने की भूल करते हैं। इन्हें पता नहीं होता कि उनके इन कार्यों से भारत माता कितनी घायल होती है। इनके चिंतन में ऐसी समग्रता नहीं होती जो जातीविहीन समाज की स्थापना कर सके। सर्वजनहिताय और सर्वजनसुखाय का भाव नहीं होता।

यह जातीय आधार पर समाज का ध्रुवीकरण कर समाज की सामूहिक भावना की हत्या करते हैं और देश के विखंडन का मार्ग प्रशस्त करते हैं। संघर्ष से बचते हैं और आग लगाने को सहर्ष स्वीकार करते हैं। इसी भावना को ओवैसी जैसे लोग संसद में हवा देते हैं और वह हिंदू समाज को कमजोर करने के उद्देश्य से अपने साथ दलित की बात को जोड़ जाते हैं, जिससे कि दलितों की सहानुभूति उन्हें मिल सके। हमारी विखंडित सोच के चलते फारूक अब्दुल्ला केवल कश्मीर तक बोलते हैं और उन्हें अन्याय केवल कश्मीर के साथ होता दीखता है। अब ऐसे में यह समझ नहीं आता कि अन्याय यदि सबके साथ हो रहा है तो अन्याय कर कौन रहा है? निश्चित रूप से हम सब एक दूसरे के साथ अन्याय कर रहे हैं। अत: जितना संघर्ष इस बात के लिए किया जाता रहा है कि मेरे साथ यह अन्याय हुआ वह अन्याय हुआ, यदि थोड़ी सी उर्जा हम इस बात पर लगा दें कि मैं भी दूसरे के साथ अन्याय कर रहा हूं और आज से मैं ऐसा नहीं करूंगा, तो सारी व्यवस्था ठीक हो जाएगी। हम सुधरेंगे जग सुधरेगा -यह वही बात है। सारी समस्याओं का यही समाधान है और वेद ने हमें इसे बहुत पहले बताया भी है, वेद का आदेश है मनसा वाचा कर्मणा की समता स्थापित करो, जो विचारते हो उसे ही कहो और जो कहते हो उसे ही करो। सारी समस्या समाप्त हो जाएगी।

रात के अंधेरे में अपना निर्माण करो, सदचिंतन करो। इससे राष्ट्र निर्माण होगा। यह वैदिक आदर्श है- इस वैदिक आदर्श से व्यक्ति का चरित्र प्रबल होता था। आज इस आदर्श के विपरीत आचरण हो रहा है। रात के अंधेरे में लोग विध्वंस मचाते हैं, निंदनीय कृत्य करते हैं और प्रात: काल उठते ही सफेद कपड़े पहनकर समाज और राष्ट्र निर्माण का उपदेश देने लगते हैं। ऐसे वाहियात लोग तिरंगे में लिपटकर जा रहे हैं जिनका चरित्र दोगला है, जिनकी बातें दोगली और जिनका व्यक्तित्व दोगला रहा। जिन्होंने कितने ही अपराध या पाप कृत्य किए और कितनी ही महिला मित्र बनाईं। इसी प्रवृत्ति ने देश में अधिकारों की आग भडक़ाई है। देश के जिम्मेदार, समझदार और ईमानदार लोगों को आगे आना चाहिए और भारत की आत्मा की आवाज को सुनकर चलने के लिए देश का परिवेश बनाने का भागीरथ प्रयास करना चाहिए। जिस दिन यह देश अपने मूल चरित्र को समझ लेगा और सब सबके लिए जीना सीख जाएंगे उस दिन सबको पता चल जाएगा कि अन्याय मेरे साथ नहीं हो रहा बल्कि मेरे द्वारा दूसरे के साथ हो रहा है और जिस दिन यह समझ आ जाएगा उस दिन देश से अन्याय, अभाव और अज्ञान सब मिट जाएंगे। तब कानून नहीं होगा, तब केवल धर्म होगा। जी हां, वही धर्म जो हम सबकी रक्षा करता है और कर सकता है। अत: उसी के लिए जियो और उसी के लिए मरह्वो। 

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