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डॉ राकेश कुमार आर्य की लेखनी से

भारत में बच्चों की : दयनीय अवस्था

अब से लगभग तीन वर्ष पूर्व जब मैं राजस्थान के झालावाड़ जिले में प्रवास पर था तो वहां पर बच्चों के बारे में यह जानकर मुझे बहुत पीड़ा हुई कि बच्चों के अभिभावक ही उन्हें या तो पढऩे नहीं देते हैं या पढऩे से रोक लेते हैं। जिला बारां के एक विद्यालय के अध्यापक ओमप्रकाश सिंह ने मुझे बताया था कि यहां के अभिभावकों के सामने भी समस्या है और वह यह कि ये लोग वर्ष में 8 माह रोजगार की तलाश में इधर उधर भटकते हैं। ऐसे में बच्चों के लिए समस्या यह आती है कि उन्हें इनकी गैरमौजूदगी में किसका संरक्षण मिले? और कौन उन्हें विद्यालय में भेजे- तब यह लोग अपने बच्चों को अपने साथ ही ले जाते हैं। दूसरे कई बार ऐसा भी होता है कि बहुत छोटे बच्चे को खिलाने-पिलाने और उसकी उचित देखभाल करने के लिए ये लोग बड़े बच्चे को अपने साथ ले जाते हैं। जिससे उस बडे बच्चे की पढ़ाई छूट जाती है, इसलिए यह लोग अपने बच्चों के प्रति चाह कर भी उन्हें ऐसी परिस्थितियां नहीं दे पाते जिनमें उनका मानसिक, आत्मिक और शारीरिक विकास हो सके।

मैं श्री ओम प्रकाश सिंह की इस बात को सुनकर बड़ा दुखी हुआ और मैं सोच रहा था कि सरकार चाहे जितने उपाय कर ले लेकिन यदि ऐसी परिस्थितियां बनी रहीं तो इन बच्चों के स्वास्थ्य पर तो प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा ही साथ ही यह कभी भी अपना मानसिक और सामाजिक विकास नहीं कर पाएंगे। ऐसा नहीं है कि यह समस्या केवल राजस्थान के झालावाड़ या बारां जिले की ही हो, यह देश के अन्य जिलों की भी समस्या है, जहां लोग रोजगार की खोज में इधर-उधर भटकते हैं और उन्हें ऐसी परिस्थितियों में अपने बच्चों के लिए उचित शैक्षणिक परिवेश नहीं मिल पाता।

अब देश के बच्चों के बारे में उपलब्ध कुछ आंकडों पर थोड़ी सी चर्चा करते हैं। भारत में कुपोषण से प्रतिवर्ष दस लाख से अधिक बच्चों की मृत्यु हो जाती है। देश में 10 करोड़ बच्चे ऐसे हैं, जिन्हें अभी तक स्कूल जाने का सौभाग्य नहीं प्राप्त हुआ। सामाजिक, नैतिक समर्थन के अभाव में स्कूली बच्चों में आत्महत्या की प्रवृत्ति बढ़ रही है। समाज के लोग निर्धन वर्ग के बच्चों के प्रति जिस प्रकार की अनुदारता और असहिष्णुता का प्रदर्शन करते हैं, उससे इन बच्चों के भीतर एक अच्छे सामाजिक मनुष्य के संस्कार विकसित नहीं हो पाते। दूसरी, बात यह भी विचारणीय है कि हमारे देश में बड़ी शीघ्रता से एकल परिवार बसाने की प्रवृत्ति बढ़ती जा रही है, यह प्रवृत्ति भी बच्चों के लिए अभिशाप सिद्ध हो रही है।

‘सेव द चिल्ड्रन’ की ओर से ऐसे देशों की सूची जारी की गई है जहां बचपन खतरे में है। यह बहुत ही दुर्भाग्यपूर्ण तथ्य है कि भारत इस बारे में मयनमार, भूटान, श्रीलंका और मालदीव से भी पीछे 116वें स्थान पर है। यह सूचकांक बाल स्वास्थ्य, शिक्षा, मजदूरी, शादी, जन्म, और हिंसा समेत आठ पैमानों पर प्रदर्शन के आधार पर तैयार किया गया है। ‘चोरी हो गया बचपन’ अर्थात ‘स्टोलेन चाइल्डहुड’ शीर्षक वाली यह रिपोर्ट हमारे देश में बच्चों की स्थिति बताने के लिए पर्याप्त है कि हम अपने बचपन को किस प्रकार की घातक परिस्थितियां उपलब्ध करा रहे हैं और यह निश्चित है कि यह घातक परिस्थितियां हमारे देश के भविष्य पर प्रश्नचिन्ह लगा रही हैं।

हमारे देश से चीन आबादी में चाहे बड़ा हो परंतु बच्चों की दयनीय अवस्था में हमारे देश ने चीन को बहुत पीछे छोड़ दिया है। एक रिपोर्ट के अनुसार 4 वर्ष तक के बच्चों की वैश्विक आबादी का लगभग 20 प्रतिशत भाग भारत में रहता है। वर्ष 2011 की जनगणना रिपोर्ट में ऐसे बच्चों तथा उनकी स्थिति के बारे में कई गंभीर तथ्य सामने आए थे, लेकिन बीते 5 वर्षों के दौरान स्थिति सुधरने के स्थान पर हर मोर्चे पर दयनीय ही होती गई है। हम सुधार के स्थान पर दयनीयता की दलदल में फंसते जा रहे हैं, इस पर सरकार को सोचना चाहिए।

मुझे बड़ा दुख होता है कि जब टीवी चैनलों पर या समाचार पत्रों में हम तलाक जैसी समस्याओं पर तो अपनी गंभीरता दिखाने लगे हैं परंतु जो देश की वास्तविक समस्याएं हैं और जिन पर हमें वास्तव में इस समय चिंतन करना चाहिए उन पर हमारे पास चिंतन करने का समय नहीं है। ऐसे में बच्चों की होती जा रही दयनीय स्थिति का यह बिंदु ही विचारणीय बन जाता है।

हमारे देश में हर 4 बच्चों में से एक बच्चा स्कूल नहीं जाता इस पर कितने लोग हैं? कितने मुल्ले मौलवी, पादरी और पंडित हैं?- जो इस बात के प्रति गंभीर हों कि भारत के बच्चों को क्यों ऐसा परिवेश नहीं मिल पाता कि वह अपनी प्रारंभिक शिक्षा प्राप्त कर उच्च शिक्षा प्राप्ति के रास्ते की ओर बढ़ सके? देश में लगभग 10 करोड बच्चे ऐसे हैं जो अभी भी सामाजिक, आर्थिक स्थितियों के कारण स्कूल या तो जा नहीं पाते हैं या उन्हें कुछ समय बाद ही स्कूल छोडऩा पड़ जाता है। देश में लगभग एक करोड़ बच्चे ऐसे हैं जिन्हें पारिवारिक कारणों से ही स्कूल में पढ़ाई के साथ-साथ घर का काम भी करना पड़ता है। उन्हें जब हम कठिन कार्य या कठोर परिश्रम करते हुए देखते हैं तो मन दुखी हो जाता है। एक तरफ हम सामाजिक समरसता और सामाजिक उत्थान की बात करते हैं और दूसरी ओर हमारे ही देश में बचपन काम के बोझ तले पिसता जा रहा है। पता नहीं क्यों हमारा ह्रदय इस लुटते हुए, पिटते हुए और पिसते हुए बचपन को देखकर दुखी नहीं होता?

स्वास्थ्य सुविधाओं की अनुपलब्धता के कारण 6 वर्ष तक दो या तीन करोड़ बच्चे कुपोषण और कम वजन के शिकार हैं। ‘डिस्ट्रिक्ट इंफॉर्मेशन सिस्टम फॉर एजुकेशन’ अर्थात डाइस की रिपोर्ट 2015 के अनुसार भारत में सौ में से मात्र 32 बच्चे ही ऐसे हैं जो स्कूली शिक्षा पूरी कर पाते हैं। देश के केवल 2 प्रतिशत प्राथमिक विद्यालयों में ही 12वीं कक्षा तक पढ़ाई की सुविधा है। 4 या 5 वर्ष पूर्व बच्चों के लिए काम करने वाली एक संस्था ‘क्राई’ ने कहा था कि देश से बाल मजदूरी समाप्त करने के लिए अभी कम से कम 100 वर्ष का समय लगेगा। बात स्पष्ट है कि हमारे देश में सरकारी कार्यों की रफ्तार इतनी धीमी है कि वह अभी बाल मजदूरी जैसी कुप्रथा को समाप्त करने के लिए यदि इसी रफ्तार से चलते रहे तो वह अपने लक्ष्य में 100 वर्ष में जाकर सफल होंगे। इसका अभिप्राय है कि हमने अपने चिंतन का केंद्र अभी बच्चों को बाल मजदूरी से मुक्त कराने जैसी कुप्रथा को समाप्त करने पर नहीं लगाया है। वास्तव में यह दुख का विषय है कि चाहे हमारे देश में कितने ही बुद्धिजीवी क्यों ना हो और कितने ही समाज शास्त्री देश में बैठे हैं- परंतु उन्होंने सरकार के लिए कोई ऐसी योजना बनाकर नहीं दी और ना ही सरकार ने ऐसी योजना में किसी प्रकार की अभी तक अपनी ओर से रुचि दिखाई है- जिससे बच्चों का शोषण समाप्त हो सके।

2011 की जनगणना का आंकड़ा कहता है कि 5 से 14 वर्ष तक के बाल मजदूरों की संख्या देश में एक करोड़ से अधिक थी। अब तो यह डेढ़ करोड़ भी हो सकती है, क्योंकि समाज दयालु और सहृदय होने के स्थान पर क्रूर और निर्दयी अधिक होता जा रहा है। आज के सामाजिक परिवेश को यद्यपि की कुछ लोग सभ्य लोगों का समाज कहते हैं, परंतु यह सभ्य लोगों का समाज नहीं है। पढ़ी-लिखी महिलाएं भी आजकल बच्चों से क्रूरता से घरेलू कार्य लेती हैं। एक बार अपने घर में जब मैं सायंकाल प्रवेश कर रहा था तो मैंने देखा कि पड़ोसी घर से एक बच्चे के रोने की आवाज़ आ रही थी- वह तड़प कर रो रहा था। मैंने खिडक़ी से देखा तो माता-पिता दोनों ही उस 4 या 5 वर्ष के बच्चे की निर्ममता से पिटाई कर रहे थे। उन्होंने उसे एक स्तंभ से बांध रखा था और पीट रहे थे। वह दृश्य में भुलाए नहीं भूलता। जब उन लोगों की मुझ पर नजर पड़ी तो उन्होंने उसे खोलना आरंभ कर दिया। जो महिलाएं घर में नौकर रखती हैं उनकी क्रूरता को देखकर तो कई बार रोंगटे खड़े हो जाते हैं।

वास्तव में उनका ऐसा व्यवहार देखकर नहीं लगता कि यह किसी सहज, सरल और ममतामयी हृदय रखने वाली महिला का आचरण होगा। समाज पढ़े-लिखे सभ्य लोगों की ‘क्रूर सभ्यता’ की चपेट में है जिससे बचपन मिटता-पिसता जा रहा है। सचमुच देश के संवेदनशील लोगों के लिए यह बहुत ही सोचने समझने और विचारने का विषय है कि हम ऐसी परिस्थितियों का शिकार क्यों होते जा रहे हैं और हम कब तक ऐसी परिस्थितियों का शिकार होते रहेंगे? देश के चिंतनशील लोगों को इस विषय पर विचार करना चाहिए और देश को नई दिशा देने के लिए किसी ठोस रणनीति पर कार्य करना चाहिए। देश के कुछ हिस्से ऐसे भी हैं जहां कुल बच्चों की आबादी का आधा भाग बाल मजदूरी के नारकीय जीवन को भोग रहा है। 5 से 18 वर्ष के आयु वर्ग के लगभग तीन करोड तीस लाख बच्चे ऐसे हैं जो मजदूरी कर रहे हैं देश के सकल घरेलू उत्पाद में अर्थात जीडीपी में 18 वर्ष या उससे कम आयु वर्ग के बाल मजदूरों का योगदान 11 प्रतिशत है। भारत में हर 8 मिनट में एक बच्चे का अपहरण हो जाता है। यह उस देश के बारे में चौंकाने वाला तथ्य है जिसके बारे में विदेशी लेखकों ने यह कहा है कि यहां के लोग दूसरे के सोने को भी मिट्टी समझते हैं। कितने दुख की बात है कि दूसरे के सोने को भी मिट्टी समझने वाले लोग एक दूसरे के बच्चों का भी अपहरण कर रहे हैं और फिरौती मांग मांग कर अपना गुजारा करना उन्होनें अपनी आजीविका बना ली है। इसके बावजूद भी लोग अपने आप को सभ्य समाज का एक अंग होने की बात कहते हैं तो मैं कहता हूं कि यदि यह सभ्यता है तो असभ्यता क्या होगी? विदेशी शिक्षा और संस्कृति का ही चमत्कार है कि भारत ने अपने पुराने संस्कारों को छोड़ कर दूसरों के बच्चों के अपहरण को ही व्यापार बना लिया है। सोचने वाली बात है कि हम किधर जा रहे हैं? 

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