द्वेष भाव के चलते इतिहास से मिटा दिए गए अनेक स्वर्णिम पृष्ठ —-डॉ राकेश कुमार आर्य

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महरौनी (ललितपुर)। महर्षि दयानंद सरस्वती योग संस्थान आर्य समाज महरौनी के तत्वावधान में विगत 2 वर्षों से वैदिक धर्म और संस्कृत के मर्म को युवा पीढ़ी तक पहुंचाने के उद्देश्य से प्रतिदिन मंत्री आर्य रत्न शिक्षक लखन लाल आर्य द्वारा आयोजित आर्यों का महाकुंभ में दिनांक 26 नवंबर 2022 को
“इतिहास का वह सच जो हमसे छुपा लिया गया” विषय पर अपने विचार व्यक्त करते हुए सुप्रसिद्ध लेखक और इतिहासकार डॉ राकेश कुमार आर्य ने कहा कि हम सबका यह दुर्भाग्य है कि भारत के इतिहास के अनेक ऐसे स्वर्णिम पृष्ठ हैं जो इतिहास से विलुप्त कर दिए गए हैं। डॉ आर्य ने ऐसे पृष्ठों की परत खोलते हुए कहा कि मेवाड़ के राणा संग्राम सिंह ने 100 से अधिक युद्ध लड़े थे, जिनमें से खानवा के युद्ध को अधिक प्रचारित किया गया है, जिसमें उनकी पराजय दिखाई जाती है। जबकि राणा सांगा द्वारा खंडार ,अहमदनगर, बाड़ी, गागरोन, बयाना, ईडर, खतौली जैसे युद्ध लड़े गए थे, जिनमें उनकी विदेशी आक्रमणकारियों पर निर्णायक जीत हुई थी। उनका उल्लेख कहीं नहीं किया जाता। इसी प्रकार हेमचंद्र विक्रमादित्य ने 22 अफगान युद्ध लड़े थे, जिनमें से 20 युद्ध को जीतने में सफल हुए थे, पर जीते हुए युद्धों का उल्लेख न करके जिस युद्ध में पराजित हुए उसका उल्लेख किया जाता है।
इतिहासकार डॉ आर्य ने लाचित बरफूकन जैसे उस योद्धा का भी उल्लेख किया जिसने आसाम में मुगलों के डेरे नहीं जमने दिए थे और अपना सर्वोत्कृष्ट बलिदान देकर सदा सदा के लिए अमर हो गया था। उनका उल्लेख भारत के राष्ट्रीय इतिहास में नहीं किया जाता । उन्होंने कहा कि हमारे योद्धाओं ने माना कि अपने बलिदान दिए तो इसका अभिप्राय यह नहीं है कि हमारा इतिहास केवल मर जाने वाले लोगों का ही इतिहास है बल्कि हमने बड़ी बड़ी संख्या में आक्रमणकारियों की सेनाओं का विनाश भी किया है। बलिदानों के साथ-साथ हमारे द्वारा शत्रुओं की सेनाओं के किए गए विनाश का भी उल्लेख इतिहास में गौरवशाली ढंग से होना चाहिए था, जो कि नहीं किया गया। ऐसा उल्लेख न करने के पीछे कारण केवल एक था कि भारत के हिंदू समाज के भीतर गर्व के नहीं बल्कि शर्म के भाव पनपने चाहिए।
डॉक्टर आर्य ने कहा कि मुगल शासक जहांगीर के शासनकाल में महाराणा प्रताप के बेटे महाराणा अमर सिंह ने 17 युद्ध जीते थे। जिनमें प्रत्येक बार मुगल सेना को पराजित होना पड़ा था। पर उनकी 1615 की तथाकथित उस अपमानजनक संधि को ही अधिक स्थान दिया गया है, जिसमें उन्होंने कुछ सीमा तक मुगल शासक की अधीनता स्वीकार कर ली थी। महाराणा वंश के बारे में हमें यह ज्ञात होना चाहिए कि 566 ई0 में अपनी स्थापना से लेकर और 1947 ई0 तक इस वंश के अनेक शासक ऐसे हुए जिन्होंने देश धर्म के लिए अनेक कष्ट सहे और देश की अप्रतिम सेवा की। इसके उपरांत भी देश की अप्रतिम सेवा करने वाले इस राजवंश की उपेक्षा करके मुगलों के उस राजवंश को अधिक महिमामंडित किया गया है जिसने इस देश को लूटा था।
डॉक्टर आर्य ने कहा कि ऐसे अनेक उदाहरण हैं जिनसे इतिहासकारों की भारत के गौरवपूर्ण अतीत के बारे में उपेक्षा पूर्ण प्रवृत्ति का पता चलता है । इतिहासकारों के इस प्रकार के द्वेषभाव के कारण ही हमारी आज की युवा पीढ़ी अपने इतिहास से पूर्णतया अपरिचित हो गई है। इसलिए “भारत को समझो” अभियान के अंतर्गत अब हमें अपने गौरवपूर्ण अतीत पर महत्वपूर्ण शोध करके राष्ट्र बोध को बलवती करना होगा।
इस अवसर पर श्रीमती दया आर्या,अनिल नरूला,प्रेम सचदेवा,डॉक्टर वेद प्रकाश शर्मा , रामकिशोर विश्वकर्मा शिक्षक, आराधना सिंह शिक्षिका , सुमन लता सेन आर्या शिक्षिका,अदिति आर्य, मुनि पुरुषोत्तम वानप्रस्थ सहित अनेक आर्यजनों ने भी अपने विचार व्यक्त किए और इस बात पर अफसोस व्यक्त किया कि भारत की कांग्रेसी सरकारों ने भारत के इतिहास को उजाड़ने में किसी प्रकार की कमी नहीं छोड़ी।
कार्यक्रम का संचालन “भारत को समझो” अभियान के राष्ट्रीय संयोजक आर्य रत्न शिक्षक लखन लाल आर्य द्वारा किया गया। श्री आर्य ने सभी उपस्थित जनों के अतिरिक्त युवा वर्ग से विशेष आह्वान किया कि वे “भारत को समझो” अभियान के साथ जुड़े और देश में एक वैचारिक क्रांति पैदा कर अपने पूर्वजों के व्यक्तित्व और कृतित्व से जन-जन को परिचित कराएं।

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